सांकेतिक तस्वीर
जीनत जैदी, दिल्ली
दिल्ली, मुम्बई, भोपाल, इन्दौर जैसे शहरों और गुजरात जैसे राज्यों में आजकल ‘डांडिया-नाइट’ और ‘गरबा-नाइट’ का चलन जोरों पर है। इस तरह के कार्यक्रमों में कोई भी भाग ले सकता है और गरबा खेल सकता है। लेकिन जैसा कि हमने अभी कहा की ‘गरबा-नाइट’ या ‘डांडिया-नाइट’ का चलन है, तो क्या गरबा या डांडिया सिर्फ रात में ही खेले जा सकते हैं? क्या ये किसी फिल्मी धुनों पर ही किया जा सकता है? ये सवाल मेरे जैसे कई लोगों के दिमाग में अक्सर उठते रहते हैं। इन्हीं के असर से मैंने इस बारे में कुछ जानने की कोशिश की।
मेरी कोशिश से मुझे जो पता लगा, वह ये कि गरबा वास्तव में ‘गर्भदीप’ शब्द का अपभ्रंश है। यानि बिगड़ा स्वरूप। जो आम-बोल चल के प्रभाव से ऐसा हुआ है। ‘गर्भदीप’ का आशय उस दीये से है, जिसे नवरात्रि में नौ दिन तक सनातन परम्परा के अनुसार उज्ज्वलित किया जाता है। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान के तमाम इलाकों में यह उत्सव खास तरीके से मनाया जाता है। इसमें नवरात्रि शुरू होने पर एक दीपक को मटके में रखते हैं और उसे सजाते हैं। यह दीपक नौ दिनों तक अनवरत जलता रहता है। अखण्ड ज्योति के रूप में।
इसी को ‘गर्भदीप’ कहा जाता है। इसमें दीया तो जीवन-ज्योति का प्रतीक है, मटका माँ के गर्भ का और नवरात्रि के नौ दिन गर्भावस्था के नौ महीनों का। इन प्रतीकों में यह सन्देश छिपा है कि प्रकृति के हर जीव का मूल माँ के गर्भ से बँधा है। वह शक्ति स्वरूपा अलग-अलग रूपों से पहले गर्भ में और फिर जन्म से मृत्यु तक हम सभी का पालन-पोषण करती है। इसी सोच के आधार पर ‘गर्भदीप’ के चारों तरफ गरबा-डांडिया करते हुए मातृ-शक्ति की आराधना करने की लोक-परम्परा पनपी है। मूल रूप से यह लोकनृत्य लोकधुनों पर किया जाता है।
कहने का अर्थ यह कि अगर परम्परा के मूल में जाएँ तो स्पष्ट हो जाता है कि मातृशक्ति की आराधना के एक स्वरूप गरबा-डांडिया को रात की चमक-दमक में खेला जाना जरूरी नहीं है। इसे न ही फिल्मी धुनों पर खेला जाना आवश्यक है। उस स्थिति में आराधना का मूल स्वरूप भंग हो जाता है। बजाय मौज-मस्ती वाला रूप सामने ठहर जाता है। गरबा-डांडिया का व्यावसायिक स्वरूप वास्तव में यही कर रहा है, जो ठीक नहीं।
इसीलिए मेरा मानना है कि गरबा-डांडिया के व्यावसायीकरण और फिल्मीकरण पर जितनी जल्दी हो सके, रोक लगानी चाहिए। इसके मूल रूवरूप को वापस लाने की कोशिशें की जानी चाहिए। ताकि न तो हमारी संस्कृति का क्षरण हो और न ही किसी की धार्मिक आस्था को चोट पहुँचे। यही आज समय की माँग है।
जय हिन्द
——-
(ज़ीनत #अपनीडिजिटलडायरी के सजग पाठक और नियमित लेखकों में से है। दिल्ली से ही 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब उच्च शिक्षा के लिए कदम बढ़ा चुकी हैं। इस उम्र में ही अपने लेखों के जरिए बड़े मसले उठाती है। अच्छी कविताएँ लिखती है। लेखन में स्वाभाविक रुचि है और इसी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं)
——-
ज़ीनत के पिछले 10 लेख
36 – इस दशहरे पर रावण संग ‘शूर्पणखा’ भी जलेगी…इन्दौर में, जो एक सीख दे जाएगी!
35 – मेरे जीवन का उद्देश्य क्या? मैंने सोचा तो मुझे मिला!
34- जो हम हैं, वही बने रहें, उसे ही पसन्द करने लगें… दुनिया के फ़रेब से ख़ुद बाहर आ जाएँगे!
33- क्या ज़मीन का एक टुकड़ा औलाद को माँ-बाप की जान लेने तक नीचे गिरा सकता है?
32 – इंसान इतना कमज़ोर कैसे हो रहा है कि इस आसानी से अपनी ज़िन्दगी ख़त्म कर ले?
31 – कल स्कूल आएगी क्या? ये सफर अब ख़त्म हुआ!
30 – कैंसर दिवस : आज सबसे बड़ा कैंसर ‘मोबाइल पर मुफ़्त इन्टरनेट’ है, इसका इलाज़ ढूँढ़ें!
29 – choose wisely, whatever we are doing will help us in our future or not
28 – चन्द पैसों के अपनों का खून… क्या ये शर्म से डूब मरने की बात नहीं है?
27 – भारत का 78वाँ स्वतंत्रता दिवस : क्या महिलाओं के लिए देश वाक़ई आज़ाद है?
मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More
लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More
देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More
अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More
एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More
खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More