पुतलों का दहन नहीं, मन और समाज की बुराइयों का संहार दशहरे का असली सन्देश!

रोहिणी जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

दशहरा सच्चे अर्थ में विजयादशमी तब बनेगा, जब हम अपने भीतर के अहंकार, वासना और लोभ को परास्त करेंगे। जब हम यह समझेंगे कि पुतलों का दहन नहीं, मन और समाज की बुराइयों का संहार ही दशहरे का असली सन्देश है। इसलिए जरूरी है कि हम धर्म पालन, सत्य और न्याय के लिए संघर्ष तथा मर्यादा, कर्तव्यनिष्ठा, आदि गुणों को पहचानें तथा समाज में अहंकार, हिंसा, वासना, जैसी सभी बुराइयों को मिटाने का साहस दिखाएँ। 

याद रखना चाहिए कि महाज्ञानी, शिवभक्त और शूरवीर रावण भी अपनी एक गलती-वासना और अहंकार-के कारण ही विनाश को प्राप्त हुआ था। आज के दौर में हमारे आस-पास, हमारे भीतर भी ऐसी तमाम बुराइयाँ मौजूद हैं। समाज में अपराध, बलात्कार, हत्या, दहेज हिंसा, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और नशे की लत जैसी बुराइयाँ लगातार बढ़ रही हैं। रिश्तों का पतन चिन्ता का विषय है। माँ-बाप, भाई-बहन, यहाँ तक कि बच्चों तक की हत्या की खबरें आए दिन आती रहती हैं। आज का इंसान ज्यादा पढ़ा-लिखा और आधुनिक है, लेकिन बुराइयाँ भी उतनी तेजी से पनप रही हैं। ऐसे में सोचिए भला कि हर बार दशहरे पर रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण के पुतलों को जलाने का क्या अर्थ है?

हर साल विजयादशमी के दौरान आँखों के सामने उत्सव का रोमांच दिखाई देता है। पटाखों की गड़गड़ाहट,आतिशबाजी की चमक और भीड़ का शोर इस पर्व को रंगीन उत्सव में बदल देता है। पर सवाल यह है कि क्या इस पूरे आयोजन का सन्देश- ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’- हमारे जीवन और समाज में कहीं उतर पाया? यह उत्सव-परम्परा हमें आत्ममन्थन और सामाजिक सुधार का अवसर देने के लिए शुरू हुई। दशहरा हमें याद दिलाता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः उसका नाश निश्चित है। मगर क्या हमने यह सन्देश आत्मसात किया?

आज के दौर का सबसे बड़ा संकट यह है कि समाज बुराइयों के प्रति संवेदनहीन होता जा रहा है। हर दिन अख़बारों में दुष्कर्म, हत्या और भ्रष्टाचार की खबरें छपती हैं, लेकिन हम उन्हें सामान्य मानकर टाल देते हैं। ऐसे ही हर साल दशहरे पर रावण, मेघनाद, कुम्भकर्ण के पुतले जलाने के बाद हम चैन से घर लौट आते हैं। मानो इतने भर से सभी बुराइयों का अन्त हो गया हो! लेकिन क्या केवल पुतले जलाने से बुराइयाँ खत्म हुईं? लिहाजा, हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन से कम-से-कम एक बुराई को अवश्य दूर करेंगे। दशहरे का सन्देश तभी सार्थक होगा, जब समाज सामूहिक रूप से भ्रष्टाचार, हिंसा, नशाखोरी, दहेज और महिला शोषण जैसी बुराइयों के खिलाफ खड़ा होगा।

दशहरा हमें अवसर देता है कि हम रुककर सोचें कि क्या हम अपने भीतर की बुराइयों को पहचान पा रहे हैं? क्या हम अपने जीवन से एक भी बुराई कम कर पाए हैं? क्या हम समाज को बेहतर बनाने के लिए कोई ठोस कदम उठा रहे हैं? यदि इन सवालों का जवाब ‘नहीं’ में है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि पुतला दहन केवल एक परम्परा बनकर रह गया है और इतने भर से दशहरे का कोई उद्देश्य पूर्ण नहीं हो रहा है। जब तक हमारे भीतर और समाज में मौजूद अहंकार, क्रोध, वासना, ईर्ष्या और लालच का दहन नहीं होगा, तब तक दशहरे की उत्सव-परम्परा निरुद्देश्य रहेगी। इसलिए यही समय है कि हम अपने भीतर की बुराइयों को परास्त करने का संकल्प लें। समाज से अपराध, छल-कपट और अन्याय-अधर्म को मिटाने का संकल्प लें, ताकि दशहरा वास्तव में विजयादशमी बन सके।

दशहरे की अनेकानेक शुभकामनाएँ।

———— 

(नोट : रोहिणी टीकमगढ़, मध्य प्रदेश के समाजसेवी एवं राजनेता पवन जैन ‘घुवारा’ के परिवार की सदस्य हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की पाठक हैं। डायरी को उनका लेख व्हाट्स एप के जरिए प्राप्त हुआ है।) 

———- 

रोहिणी के पिछले लेख 

1 – आज एआई और मशीन लर्निंग के दौर में संस्कृत भाषा फिर से चर्चा में क्यों है?

सोशल मीडिया पर शेयर करें
From Visitor

Share
Published by
From Visitor

Recent Posts

पर्यावरण दिवस, ईंधन बचाने की बातें और निजी कारों का ऐसा तमाम-जाम, दिलचस्प है न?

मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More

4 hours ago

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल, चीन से पाँच देशों की जासूसी, भारतीय भी सावधान रहें!

लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More

1 day ago

‘शिक्षक’ ने अपने कौड़ी के ज्ञान से ‘पत्रकार’ को दो कौड़ी का साबित कर दिया, देखिए वीडियो!

देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More

2 days ago

क्या हम भारतीयों को सार्वजनिक नियम-कायदे मानने की तमीज नहीं? अभी बहस तो यही है!

अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More

3 days ago

अपने हिस्से का योगदान दीजिए, वरना लू के थपेड़ों से रोज 3,400 लोग मरने लग जाएँगे!

एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More

4 days ago

इस लड़की ने दो लाख की नौकरी छोड़कर 60 हजार रुपए महीने में खुशी खरीदी है!

खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More

5 days ago