टीम डायरी
भारतीय जनता पार्टी के शासन वाले उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में आम तौर पर अन्य मामलों में ऐसा नहीं होता, जब ‘आस्था’ को किसी भी रूप से नुकसान पहुँचाने वाले लोग लम्बे समय तक कार्रवाई से बच निकलते रहें। मसलन- कोई ‘लव जिहाद’ के आरोप में पकड़ा जाए, या ‘धर्म’ के आधार पर दंगा भड़काने के आरोप में धरा जाए, या फिर ऐसे किन्हीं मिलते-जुलते आरोपों में पुलिस के हत्थे चढ़े, उस पर एक कार्रवाई तुरंत होती है। गैर-कानूनी रूप से बनाए गए (जो कि किसी न किसी नियम-कानून के आधार पर अधिकांश निर्माणों में हो सकता है) उसके प्रतिष्ठानों (घर, दुकान, आदि) पर बुलडोजर चल जाता है। फिर चाहे उस पर अदालत में शुरु भी क्याें न हुआ हो, या लंबित हो या फिर अदालतों ने ऐसी कार्रवाई के विरुद्ध सरकार को चेतावनी ही क्यों न दी हो। मगर ‘सरकार’ नहीं रुकती। वह ‘आस्था’ खण्डित करने वालों को एक बड़ी आर्थिक चोट’ तो पहुँचा ही देती है। तर्क यह होता है कि ऐसी कार्रवाई से इस तरह ही हरकत करने वालों में डर बैठता है और वे फिर ऐसा करने से पहले सौ बार सोचते हैं।
लिहाजा, इसी आधार पर सवाल स्वाभाविक है कि वे जिन्होंने भगवान श्रीराम के जन्मस्थल, उनके मन्दिर, उनके घर में चोरी की, जिन पर आरोप सही पाए गए, जिनकी गिरफ्तारी भी हो गई, उनके खिलाफ ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के परिसर में रहकर उन्होंने मर्यादाएँ भंग कीं। पूरी श्रद्धा से चढ़ावा चढ़ाने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को चोट पहुँचाई। भगवान के चढ़ावे में आए करोड़ों रुपयों की चोरी की, इसमें से कुछ रकम जाँच के दौरान बरामद भी हुई। इसी आधार पर आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया। मतलब, सब साफ-साफ नजर आ रहा है। चोरी साबित हुई है। इस चोरी की रकम से बने आरोपियों के बड़े-बड़े मकान, आदि दिख रहे हैं। इसी पैसे से खरीदी गईं उनकी बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ सड़कों पर दौड़ती नजर आ रही हैं। फिर भी न तो उनके मकान ढहाए गए, न ही उनकी गाड़ियों की जब्ती हुई, आखिर क्यों? क्या इसलिए कि ये लोग किसी न किसी रूप में भारतीय जनता पार्टी, और उसके मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन से जुड़े हुए हैं? या फिर इसलिए कि इनके खिलाफ ऐसी किसी कार्रवाई से खुद इस पार्टी और संगठन के बड़े नेता ही सवाल के घेरे में आ जाएँगे?
ऐसे सवाल भारतीय जनता पार्टी और उसकी उत्तर प्रदेश सरकार से पूछे जाने स्वाभाविक हैं। पूछे जाने ही ही चाहिए। क्योंकि खुद उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित विशेष जाँच दल की प्रारम्भिक रिपोर्ट में ‘श्री राम मन्दिर के चढ़ावे में चोरी’ की पुष्टि की गई है। श्री राम मन्दिर न्यास के काम-काज के तौर-तरीकों में गम्भीर खामियाँ भी पाई गईं। मसलन- दान के पैसों की गिनती के दौरान कैमरों को ढँक देना। उन कैमरों का रिकॉर्ड 180 दिनों के बजाय 45 दिनों में ही नष्ट करना। चोरी की शिकायत करने वालों को ही न्यास के वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर देना। चोरी करने वालों की ओर, सब कुछ पता होने के बावजूद आँखें मूँद कर बैठे रहना। और न्यास के वरिष्ठ पदाधिकारियों के बीच अहम् का टकराव होने जैसी स्थितियाँ होना। यह सब परत-दर-परत सामने आ चुका है, आता जा रहा है। न्यास के कुछ वरिष्ठ अधिकारी इसी आधार पर इस्तीफा भी दे चुके हैं। लेकिन क्या इन वरिष्ठ अधिकारियों के इस्तीफे और छोटे कर्मचारियों की गिरफ्तारी पर ही बात खत्म हो जाएगी? या ऐसी कोई पुख्ता कार्रवाई भी होगी, जो एक नजीर बने और दोबारा फिर ऐसा काम करने के बारे में कोई सोचे भी नहीं?
भारतीय जनता पार्टी, उसकी सरकार, उसके मूल संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, और श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास सभी को मिलकर इन सवालों के जवाब देने होंगे। अन्यथा तय मानिए कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम इन सभी को कभी माफ नहीं करेंगे। आज नहीं तो कल वे खुद अपने न्याय के जरिए बताएँगे कि उनकी अयोध्या में इस तरह का अमर्यादित आचरण करने वालों को आज, इस कलियुग में माफ नहीं किया जाता। वैसे अंत में, एक बात और। वह है, ‘न्यास’ शब्द का अर्थ। हिन्दी के इस शब्द के कई अर्थों में दो महत्त्वपूर्ण हैं। एक, ‘भरोसा’, और दूसरा, ‘स्थापन करना’। अफसोस कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास इन दोनों अर्थों को निरर्थक करता दिख रहा है इस वक्त।
