क्यों हमें ‘कुमारी’ अबू बाकेर और इस्लामिक कीर्तन परम्परा के बारे में जानना चाहिए?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 18/10/2020

अभी कुछ रोज पहले तक कर्नाटक (दक्षिण भारतीय) संगीत के एक बड़े गायक हुआ करते थे। नाम था, ‘कुमारी’ अबुबाकेर। जैसा नाम दिलचस्प, वैसा ही काम भी। वे ‘तमिल इस्लामिक कीर्तन’ परम्परा के आख़िरी स्तम्भ थे। ‘कुमारी’ अबुबाकेर के निधन के साथ वह स्तम्भ इसी महीने ढह गया। दुख की ही बात है कि भारतीय सांगीतिक संस्कृति के ऐसे बिरले नाम और परम्परा के धारक तथा साधक को न जीवनकाल में उनके हिस्से का सम्मान मिला, न निधन के बाद। आलम ये कि दक्खन के दो प्रमुख अख़बारों की वेबसाइट पर उनके निधन की छोटी सी सूचना तक नहीं मिली। गूगल पर खोजने जाएँ तो वहाँ भी कुछ ख़ास हाथ नहीं आता। यहाँ तक कि उनके निधन पर कर्नाटक संगीत के दो-चार गिने-चुने नामों ने ही अफ़सोस जताया और बस। जबकि वे इससे कहीं ज्यादा के हकदार थे। बहरहाल इसीलिए, निधन के इतने दिन बाद सही, ऐसी दुर्लभ शख़्सियत और परम्परा के नाम ‘शब्दांजलि’ तो बनती है।

‘कुमारी’ अबुबाकेर के बारे में जो थोड़ी जानकारी उपलब्ध हो सकी है, उसे जानने-समझने का  का सिलसिला ‘अन्त’ से शुरू करते हैं। सात अक्टूबर 2020 से, जब चेन्नई में अबुबाकेर ने अन्तिम साँस ली। उस वक्त तक वे 83 साल के हो चुके थे। इतिहासकार, फिल्मकार और लेखक कोम्बई एस अनवर कहते हैं, ‘अबुबाकेर उस पीढ़ी से ताल्लुक रखते थे, जो संगीत में मज़हब नहीं देखती थी। मुझे नहीं लगता कि उनकी परम्परा को ज़िन्दा रखने वाला एक भी व्यक्ति कहीं हो सकता है।’ दक्षिण भारतीय संगीतकार टीएम कृष्णा देश के बेहद जागरुक और सक्रिय संगीतकारों में गिने जाते हैं। ऐसे, जो संगीत और सांगीतिक परम्पराओं से गहरा सरोकार रखते हैं। उसके संरक्षण और संवर्धन की फिक्र करते हैं। उन्हें भी अफ़सोस है, ‘अबुबाकेर के बाद तमिल इस्लामिक कीर्तन गायन की विशिष्ट परम्परा को आगे बढ़ाने वाला मुझे तो कोई नहीं दिखता।’

अब इन्हीं दो जानकारों के हवाले से, इनसे मिली जानकारियों की मदद से तमिल इस्लामिक कीर्तन परम्परा को थोड़ा-बहुत समझने की कोशिश करते हैं। इसके लिए अनवर की ही बात पर फिर ग़ौर करें, ‘एक पीढ़ी, जो संगीत में मज़हब नहीं देखती थी। धर्म के आधार पर संगीत को बाँटती नहीं थी।’ संगीतकारों, गायकों, लेखकों आदि की उसी पीढ़ी से ताल्लुक रखने वाला अबुबाकेर की तरह एक नाम हुआ करता था, कासिम पुलावार वली (Sayyid Kaseem Pulavar Wali)। ये इस्लाम धर्म के संस्थापक मुहम्मद साहब के वंशजों में से एक थे। कहते हैं, इनके पुरखे इत्र बेचने पहली मर्तबा अरब से हिन्दुस्तान आए थे। फिर यहीं के होकर रह गए। कुछ उत्तर में तो कुछ दक्खन में। कासिम तमिल इस्लामिक साहित्य के बड़े रचनाकार भी थे। इन्होंने मुहम्मद साहब की प्रशंसा में भारतीय ‘भक्ति शैली’ में कई पदों की रचना की थी। उन पदों का गायन वैसे ही होता था, जैसे हिंदु धर्मावलम्बी भजन-कीर्तन करते हैं। इसीलिए आम बोलचाल में मुहम्मद साहब की प्रशंसा वाला भक्तिपद गायन ‘इस्लामिक कीर्तन’ कहलाने लगा।

इस ‘इस्लामिक कीर्तन’ से जुड़ा एक रोचक किस्सा है, 1980 के दशक का। कासिम पुलावार वली की तरह ही काव्य रचनाएँ करने वाले एक और तमिल इस्लामिक साहित्यकार हुआ करते थे। उनका नाम था, उमारु पुलावार (Umaru Pulavar)। उन्होंने 17वीं सदी में ‘सीरा पुराणम’ (Seera Puranam) नाम से एक काव्य ग्रन्थ लिखा था। इसमें मोहम्मद साहब के इतिहास से जुड़े भक्तिपद हैं। तो, अबुबाकेर और कांग्रेस नेता तथा तमिल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का. मु. शेरिफ ने तय किया कि वे मुहम्मद साहब के जन्मदिवस के मौके पर अगले 10 दिन उन जगहों पर जाएँगे, जहाँ लोग मुहम्मद साहब के जीवन से जुड़े संगीतमय भक्तिपद सुनना चाहते हैं। इसका आग्रह करते हैं। उन स्थानों पर अबुबाकेर ‘इस्लामिक कीर्तन’ गाएँगे और शेरिफ उन भक्तिपदों से जुड़े किस्से लोगों को सुनाएँगे। यह आयोजन, ‘कधकलाबिशेगम’ यानि कथा-कला का संगम कहा गया। सो, सिलसिला शुरू हुआ और जब 10वें दिन थमा तो आसमान से बारिश की शक्ल में ऊपरवाले का आशीर्वाद मिला, ऐसा अनवर बताते हैं।

यहाँ एक बात और है, गौर करने की। अबुबाकेर और उनके जैसे ‘इस्लामिक कीर्तन’ गायकों के गायन में भक्ति भले इस्लामिक धर्मगुरुओं की थी, पर संगीत अरबी शैली का नहीं था। बजाय वे निपट दक्षिण भारतीय रागों पर आधारित गायन किया करते थे। जैसे- रेवती, काफ़ी, बागेश्री, चारुकेशी आदि। इनमें काफी, बागेश्री, चारुकेशी जैसे राग तो हिन्दुस्तानी (उत्तर भारतीय) संगीत में भी प्रचलित हैं। यही कारण था कि सुनने वालों को अबुबाकेर के गीत और साहित्य को समझने में भले कुछ दिक्कत हो, मगर उनके संगीत से जुड़ने में उन्हें देर नहीं लगती थी। ये संगीत अबुबाकेर ने दक्षिण के बड़े नामी संगीतकारों से सीखा था। शुरुआती 10 साल तक उन्होंने बालई मणि असन (Balai Mani Asan) से संगीत सीखा। इसके बाद भी जिन गुरुओं सांन्निध्य में रहे, वे अधिकांश या कहें कि लगभग सभी हिन्दु ही थे।

अब बात उनके अलहदा से लगते नाम की। अबुबाकेर का जन्म 1937 में तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के कंजमपुरम गाँव में हुआ था। यह गाँव केरल की सीमा से लगता है और उस समय त्रावणकोर रियासत का हिस्सा होता था। चूँकि अबुबाकेर कन्याकुमारी जिले से ताल्लुक रखते थे, इसलिए बहुत सम्भावना यही है कि उन्होंने अपने नाम के साथ इसी कारण ‘कुमारी’ लगाया हो। इससे उनका धर्मनिरपेक्ष व्यक्तित्त्व भी स्थापित होता है क्योंकि हिन्दु परम्परा में ‘कुमारी’ माँ भगवती का एक नाम कहा जाता है। कन्याकुमारी उन्हीं से जुड़ा एक स्थल भी तो है। अलबत्ता एक और शब्द है जो ‘कुमारी’ जैसा ही ध्वनित होता है। यह है, ‘क़ारी’। ये अरबी-फारसी भाषा में उन लोगों के लिए प्रयुक्त होता है, जो क़ुरान की आयतें गाया करते हैं। तिस पर ये भी दोनों में दिलचस्प समानता है कि जैसे ‘इस्लामिक कीर्तन’ करने वाले कोई ‘कुमारी’ अब शायद ही मिलें, उसी तरह क़ुरान की आयतें गाने वाले ‘क़ारी’ भी इन दिनों यदा-कदा ही मिलते हैं। संगीत पर दिन-ब-दिन मज़हबी कट्‌टरता जो हावी होती जा रही है।

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