क्या अमित शाह जल्द ही भारत के प्रधानमंत्री बन सकते हैं?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

राजनीति में बहुत सी सम्भावनाएँ संकेतों से पकड़नी पडृती हैं। हालाँकि, इस तरह से पकड़ में आने वाली सम्भावनाओं में से कुछ सही हो जाती हैं और कुछ कभी-कभी नहीं भी होतीं। बहरहाल, आज पाँच अगस्त की महत्त्वपूर्ण तारीख पर भी कुछ संकेत मिले। इनसे सम्भावना भरे प्रश्न को उभरने का अवसर मिला कि क्या अमित शाह जल्दी ही इस देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं? अलबत्ता, इस प्रश्न के जवाब से पहले यह देखते हैं कि यह तारीख महत्त्वपूर्ण क्यों है। दरअस्ल, पाँच अगस्त को देश में दो बड़ी घटनाएँ हुईं थीं। पहली- 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 और धारा-35ए को निष्क्रिय कर दिया गया था। इस संवैधानिक प्रावधान के जरिए जम्मू-कश्मीर को अपना अलग संविधान और अपना झंडा अपनाने सहित कई विशेष सुविााएँ मिली हुई थीं। वे सब एक झटके में छिन गईं। इसके साथ ही, जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग कर राज्य को दो केन्द्रशासित क्षेत्रों में भी बाँट दिया गया था। इतना सब होने पर भी जम्मू-कश्मीर में शान्ति बनी रही। अब तो चुनाव भी हो चुके हैं। केन्द्रशासित राज्यों की तरह वहाँ सरकार चल रही है। 

दूसरा- साल 2020 में इसी तारीख को भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण की शुरुआत के लिए शिलान्यास किया था। वह भी बन चुका है। और देश में अमन-चैन कायम है। जबकि इन दोनों घटनाओं के बारे में पहले धमकियाँ इस तरह की दी जा रही थीं कि ऐसा कुछ भी करने की कोशिश भी हुई तो देश जल उठेगा। हालात नहीं सँभल पाएँगे। लेकिन केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्त्व मे सभी धमकियाँ बेमानी साबित हुईं। इतना ही नहीं, उनके मार्गदर्शन में देश के पूर्वोत्तर में हालात काफी हद तक सामान्य हैं। सिर्फ मणिपुर की हिंसाग्रस्त स्थितियाँ ही अपवाद कही जा सकती हैं। यद्यपि वहाँ भी स्थिति अब नियंत्रण में आ रही है। देश के तमाम नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सली अब गिनती के बचे हैं। उम्मीद है कि अगले कुछ महीनों में यह समस्या भी खत्म हो जाएगी। ओर संयोग देखिए कि जब अमित शाह ने सबसे लम्बे समय तक भारत के गृह मंत्री रहने का कीर्तिमान बनाया, तो यह कारनामा भी पाँच अगस्त के नजदीक ही हुआ। शाह ने चार अगस्त 2025 को इस पद पर रहते हुए 2,258 दिन पूरे कर लिए। इस तरह वह अपनी ही पार्टी के लालकृष्ण आडवाणी से आगे निकल गए, जो लगातार 2,256 दिन इस पद पर थे।

मतलब पाँच अगस्त की तारीख अमित शाह के लिए अब तक ‘बड़ा दिन’ साबित हुआ है। इसीलिए, हर साल इस तारीख के आस-पास अटकलें लगाई जाने लगती हैं कि कहीं कुछ फिर ‘बड़ा’ तो नहीं होने वाला है। क्योंकि शाह ने इसी तारीख पर अब तक भारतीय जनता पार्टी के दो प्रमुख वैचारिक मुद्दों- राम मन्दिर और धारा-370 को सफलतापूर्वक निपटाया है। और अभी कम से कम दो मसले और बाकी हैं। पहला- समान नागरिक संहिता और दूसरा- एक देश, एक चुनाव। हालाँकि, मसले और भी हैं। जैसे- जगदीप धनखड़ के अचानक उप-राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिए जाने (या ले लिए जाने) के बाद उनकी जगह नए चेहरे को काबिज किया जाना है। आगामी नौ सितम्बर को इसके लिए चुनाव है। इसके अलावा, देशभर में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का मामला है और जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का भी। यानि, शाह के इर्द-गिर्द घूमने के लिए राजनीतिक घटनाक्रमों की कमी नहीं होने वाली है। 

तिस पर अटकलें यह भी हैं कि सितम्बर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब अपनी उम्र के 75 साल पूरे करेंगे तो क्या वह पद छोड़ देंगे? क्योंकि उन्होंने उम्र के इसी पैमाने पर अपनी ही पार्टी के कई दिग्गज नेताओं को सक्रिय राजनीति से बाहर किया है। तो क्या वह अब खुद इस आदर्श व्यवस्था का पालन करेंगे? और अगर करेंगे तो 2029 तक उनका बचा हुआ कार्यकाल कौन बतौर प्रधानमंत्री कौन पूरा करेगा? ऐसे तमाम प्रश्नों और परिस्थितियों के बीच पाँच अगस्त को ही एक संसद भवन में केन्द्र के सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (एनडीए) के सांसदों की एक बैठक होती है। उसमें भाग लेने के लिए जाते हुए सभी केन्द्रीय मंत्रियों की अगुवाई अमित शाह करते दिखते हैं। इससे जुड़ा एक वीडियो ऊपर है, देख सकते हैं। फिर उसी बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषण में अमित शाह की खास तारीफ करते हैं और कहते हैं, “वह (शाह) लालकृष्ण आडवाणी के बाद सबसे लम्बे समय तक देश की सेवा करने वाले गृह मंत्री बन गए हैं। उनका सफर अभी लम्बा है। यह तो बस शुरुआत है।” 

तो क्या अमित शाह के इस लम्बे सफर का अगला पड़ाव प्रधानमंत्री पद हो सकता है? ऐसी सम्भावना बनती है, तो नरेन्द्र मोदी का अगला पड़ाव क्या होगा? क्या भारत के राष्ट्रपति? इस बाबत #अपनीडिजिटलडायरी पर 10 फरवरी 2024 के एक लेख में अनुमानित स्थितियों का आकलन किया जा चुका है। और फिर सरकार में वरिष्ठता क्रम के हिसाब से फिलहाल नम्बर दो के पायदान पर खड़े राजनाथ सिंह भी तो हैं? वे कहाँ होंगे? क्या उपराष्ट्रपति? इन प्रश्नों का उत्तर आने वाला वक्त देगा। और जैसा पहले ही कहा- सियासी सम्भावनाएँ हैं, कभी सही होती हैं, कभी नहीं भी होतीं। इन्हें भाँप लेना किसी के लिए भी इतना आसान नहीं होता। 

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