त्यागना। इसे सामान्य भाषा में हमेशा के लिए किसी चीज को छोड़ देना कह देते हैं। जैसे दान देना भी त्याग है। वैसे, अक्सर हम धन त्यागने…
View More प्रश्न है, सदियाँ बीत जाने के बाद भी बुद्ध एक ही क्यों हुए भला?Tag: अपना पन्ना
योग क्या है, कभी सोचकर देखा क्या हमने?
बीते छह सालों की तरह इस सातवें साल भी 21 जून को दुनियाभर में ‘अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के आयोजन हुए। ख़ूब तस्वीरें दिखीं। तरह-तरह के आसन,…
View More योग क्या है, कभी सोचकर देखा क्या हमने?दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं…‘वा घर सबसे न्यारा’ ..
शोर में बहुधा एकांत छिन जाने का खतरा रहता है। पर कुछ शोर मन को बहुत भाते हैं। मसलन- चिड़ियों की चहचहाट, टिटहरी की चीख, मुंडेर पर…
View More दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं…‘वा घर सबसे न्यारा’ ..धर्म-पालन की तृष्णा भी कैसे दु:ख का कारण बन सकती है?
भगवान बुद्ध दुःख के कार्य-कारण बताते हैं। इसमें दुःख समुदाय, यह दूसरा आर्यसत्य है। दुःख है तो दुःख के कारण भी होते ही हैं। इन कारणों को…
View More धर्म-पालन की तृष्णा भी कैसे दु:ख का कारण बन सकती है?बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है…
देवास के जवाहर चौक में एक ही बड़ी सी दुकान थी झँवर सुपारी सेंटर। मंगरोली सुपारी वहीं मिलती थी, जिसे काटो तो नारियल जैसी लगती थी। घर में एक…
View More बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है…“अपने प्रकाशक खुद बनो”, बुद्ध के इस कथन का अर्थ क्या है?
भगवन बुद्ध ने दु:ख को पहला सत्य बताया। बड़े अद्भुत हैं बुद्ध। बहुत लम्बी-चौड़ी बात नहीं करते। एक शब्द में बता दिया कि समस्या क्या है। …
View More “अपने प्रकाशक खुद बनो”, बुद्ध के इस कथन का अर्थ क्या है?रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगा
रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है। चाहे नरम धूप हो या कड़क। सब देह को ही सहना है। धूप जब भीतर आत्मा तक छनकर…
View More रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगाबुद्ध की दृष्टि में दु:ख क्या है और आर्यसत्य कौन से हैं?
भगवान बुद्ध ने पंचवर्गीय भिक्षुओं को अपनी बात सुनने के लिए मना लिया। तथागत ने उन्हें समझाया। उनकी रुचि देख जो पहला उपदेश दिया वह…
View More बुद्ध की दृष्टि में दु:ख क्या है और आर्यसत्य कौन से हैं?बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं
अड़सठ घाट भीतर हैं। कहाँ जाना है? न गंगा, न यमुना, सुमिरन कर ले मेरे मना, मन चंगा तो कठौती में ही गंगा है। बीती जा रही है…
View More बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैंवैशाख पूर्णिमा, बुद्ध का पुनर्जन्म और धर्मचक्रप्रवर्तन
वन में वैशाख पूर्णिमा को जन्मा राजकुमार फिर वन की तरफ चल दिया। पुनः जन्म लेने हेतु। वह राजगृह के घने वनों में भटकता रहा।…
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