आज ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ है। इस बार का विश्व, स्वास्थ्य और दिवस सब हर बार से अलग है। कोरोना महामारी ने विश्व के स्वास्थ्य को जकड़ रखा है। स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान पर खेलकर मानवता की सेवा कर रहे हैं। इंसानी ज़िन्दगियों को ‘देवदूतों’ की तरह बचाने में जुटे हैं। इन ‘देवदूतों’ काे आज हमारा सहयोग चाहिए। और वह हम कैसे कर सकते हैं, ये आज के ‘दिवस’ पर सीखने-समझने का मौका है। सहयोग की मिसाल टैक्सास (अमेरिका) के अल्बर्ट कोनर ने पेश की है।
लेकिन कोनर के बारे में जानने से पहले कुछ ऐसी ख़बरों पर ग़ौर किया जा सकता है, जो स्वास्थ्यकर्मियों के संघर्ष को समर्पित हैं। जैसे- मध्य प्रदेश के भोपाल में जेपी अस्पताल के चिकित्सक हैं सचिन नायक। उन्होंने बीते सात दिन से अपनी कार काे ही घर बना लिया है। घरवालों को संक्रमण न फैले, इसलिए घर नहीं जा रहे। जोधपुर, राजस्थान के मथुरादास माथुर अस्पताल में कोरोना नोडल अधिकारी हैं, डॉक्टर बीएस परिहार। बीते बुधवार उनकी बेटी का 10वाँ जन्मदिन था। इस मौके पर वे घर आए। मगर बाहर दरवाजे से ही बेटी काे केक काटता हुआ देखकर और आशीर्वाद देकर वापस अपने काम पर लौट गए।
रायपुर, छत्तीसगढ़ के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में 60 डॉक्टरों, नर्सों आदि की टीम कोरोना मरीज़ों की देखभाल जाँच वग़ैरह का काम कर रही है। यह टीम बीते कई दिनों से अस्पताल में ही रह रही है। खाना-पीना, सोना सब वहीं। ऐसे ही जयपुर,राजस्थान के सवाई मानसिंह (एसएमएस) अस्पताल के नर्सिंग प्रभारी राममूर्ति मीणा। इसी 30 मार्च को करौली से राणोली गाँव में उनकी माँ का निधन हो गया। लेकिन वे अपना काम छोड़कर नहीं गए। वीडियो कॉल से माँ की अंत्येष्टि में शामिल होकर उन्होंने बेटे का फ़र्ज़ निभाया।
इसी तरह चीन के डॉक्टर पेन यिन हुआ। महज़ 29 साल के थे। कुछ दिनों में शादी होने वाली थी। लेकिन जब वुहान शहर में कोरोना महामारी फैली तो शादी टाल दी। मरीजों की सेवा में जुट गए। सेवा करते-करते ही उनकी 20 फरवरी को संक्रमण से मौत हो गई। इटली के मिलान में भी 67 साल के डॉक्टर रॉबर्टो स्टेला 10 मार्च को आख़िरी साँस लेने तक कोरोना के मरीज़ों का इलाज़ करते रहे। ऐसे और भी बहुत हैं।
दुनियाभर से ऐसी न जाने कितनी कहानियाँ लगातार सामने आ रही हैं। ये बताती हैं कि इस वक़्त विश्व में 13 लाख से ज़्यादा लोग कोरोना से संक्रमित हैं। इनके इलाज़ के लिए दुनिया के लगभग सभी देशों में उपकरणों, दवाओं और सुरक्षा परिधानों की कमी हो रही है। फिर भी लाखों-लाख स्वास्थ्यकर्मी इस कमी को नज़रन्दाज़ कर अपने काम में लगे हैं। वे संक्रमित हो रहे हैं। उनकी जान जा रही है। लगभग 100 के आस-पास तो चिकित्सक ही मौत का शिकार हो चुके हैं। मगर काम जारी है।
इसीलिए ऐसे ‘देवदूतों’ का सहयोग करने के लिहाज़ से अल्बर्ट कोनर एक नज़ीर बन जाते हैं। उनकी पत्नी को स्तन कैंसर है। अभी हाल ही में उनकी कीमोथैरेपी हुई। इस दौरान कोनर पत्नी के साथ रहना चाहते थे। लेकिन कोरोना संक्रमण के प्रसार को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें पत्नी के साथ रहने की इजाज़त नहीं दी। उन्होंने भी मामले की नज़ाकत को समझा। वे बिना किसी प्रतिरोध के अस्पताल के बाहर कार पार्किंग में जा बैठे। ऐसी जगह जहाँ से पत्नी का वॉर्ड दिख रहा था।
वहीं बैठे-बैठे कोनर ने एक तख़्ती पर लिखकर पत्नी को सन्देश दिया, ”मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता। मगर मैं यहीं हूँ।” साथ ही अस्पताल स्टाफ के लिए ‘शुक्रिया’ के दो शब्द और दुनिया के सामने ‘स्वास्थ्यकर्मियों से सहयोग की मिसाल’ भी उन्होंने यहीं से पेश की।… (नीलेश द्विवेदी)
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