विज्ञान ‘चाँद’ को धरती पर ले आया पर धरती की ही गुत्थियाँ न सुलझा पाया

दो दिन पहले दो ख़बरें पढ़ीं। दोनों दिलचस्प। विज्ञान के दो दीगर पहलुओं से जुड़ी हुईं। साथ ही हमें सोचने पर मज़बूर करती हुईं भी। इनमें से एक ख़बर बताती है कि चाँद की मिट्‌टी पर पहला हक़ हमारा यानि हिन्दुस्तान का होगा। क्योंकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) को चाँद में पाई जाने वाली मिट्‌टी का पेटेंट मिल गया है।

ये मामला कुछ यूँ है कि चन्द्रयान-2 अभियान से पहले इसरो को कुछ परीक्षण करने थे। उसे चाँद के जैसी ही सतह पर रोबोट आदि उतारने थे। ताकि यह परखा जा सके कि सब ठीक है या नहीं। अब चूँकि चाँद पर तो परीक्षण के लिए जा नहीं सकते थे। कोई भारतीय भी चाँद पर नहीं गया जो अपने साथ वहाँ की मिट्‌टी लाया होता। अमेरिका के पास चाँद जैसी मिट्‌टी है। पर उससे वह हासिल करना महँगा पड़ रहा था।

लिहाज़ा भारतीय वैज्ञानिक सांकेतिक रूप से ही सही, चाँद को ज़मीन पर ले आए। उन्होंने सलेम (तमिलनाडु) के दो गाँवों- सीतमपुंडी और कुन्नमलाई के पत्थरों को पीसकर चाँद जैसी मिट्‌टी बना ली। क्योंकि ये पत्थर चाँद की सतह से मिलते-जुलते थे। फिर इस मिट्‌टी को बेंगलुरु में बनाई गई चाँद जैसी कृत्रिम सतह पर बिछाकर चन्द्रयान-2 अभियान से जुड़े परीक्षण किए गए। अब चाँद की इसी मिट्‌टी पर अगले 20 साल तक हिन्दुस्तान का अधिकार होगा। क्योंकि पेटेन्ट कानून में इस तरह का प्रावधान है।

मगर विज्ञान की इस सफलता पर हम सीना चौड़ा करें, उससे पहले दूसरी ख़बर। अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेन्सी- नासा (राष्ट्रीय वैमानिकी एवं अन्तरिक्ष प्रशासन) के वैज्ञानिक बीते दिनों पृथ्वी के दक्षिणी ध्रुव के एक कोने में स्थित अंटार्कटिका में परीक्षण कर रहे थे। उन्होंने गुब्बारे पर विकिरण संसूचक (रेडियो डिटेक्टर) लगा रखा था। मगर इससे जो ‘सूचना’ हासिल हुई, उससे वैज्ञानिकों का दिमाग़ अब तक चकराया हुआ है।

ब्रिटेन के अख़बार ‘डेली स्टार’ के मुताबिक वैज्ञानिकों को ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे वहाँ ब्रह्मांड-किरणें (कॉस्मिक-रेज़) उलट-पलट अवस्था में चल रही हैं। यानि अंग्रेजी भाषा के हिसाब से अपसाइड-डाउन। और सहज़ भाषा में कहें तो औंधी हो गईं हों। तिस पर ये भी कि यहाँ भौतिक शास्त्र के सामान्य नियम तक पूरी तरह लागू नहीं हो पा रहे हैं।

वैसे यह जानकारी पहली बार नहीं मिली है। बताते हैं कि 2006 और 2014 में भी वैज्ञानिकों को ऐसे संकेत मिले थे। लेकिन तब इन्हें ख़ारिज़ कर दिया गया था। हालाँकि अब इनको न सिर्फ़ गम्भीरता से लिया गया है बल्कि इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं।

मगर इन ख़बरों से क्या ऐसा नहीं लगता कि विज्ञान चाहे श्रेष्ठता का कितना भी दम भरे, ‘ब्रह्मांड की कारीगरी’ के सामने अक़्सर बौना रह जाता है। ऐसी न जाने कितनी गुत्थियाँ हैं अभी धरती पर ही, जिन तक विज्ञान की पहुँच भी न हुई हो शायद। सुलझाने की बात तो दूर!

——-

ऐसे छोटे-बड़े किस्सों की शक़्ल में कोई भी अपने अनुभवों/अहसासों को apnidigitaldiary@gmail.com पर लिखकर भेज सकता है। हिन्दी, अंग्रेजी या रोमन, किसी भी रूप में। ये किस्से फिलहाल फेसबुक पेज #अपनीडिजिटलडायरी पर प्रकाशित किए जा रहे हैं। अगर ये अच्छे लगें तो इन्हें साझा कर, ज़्यादा से ज़्यादा से लोगों तक पहुँचाने में, जो जितनी मदद कर सके, उसका उतना ही आभार।

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Apni Digital Diary

Share
Published by
Apni Digital Diary

Recent Posts

जनगणना हो रही है, जनसंख्या बढ़ रही है और आंध्र में आबादी बढ़ाने वालों को ‘इनाम’!

देश में जनगणना होने वाली है। मतलब जनसंख्या कितनी है और उसका स्वरूप कैसा है,… Read More

16 hours ago

एक यात्रा, दो मुस्लिम ड्राइवर और दोनों की सोच….सूरत-ए-हाल गौरतलब!

अभी एक तारीख को किसी जरूरी काम से भोपाल से पन्ना जाना हुआ। वहाँ ट्रेन… Read More

3 days ago

सेवा-तीर्थ में ‘भारतीय भाषाओं’ की सेवा नहीं हुई, आगे शायद ही हो!! वीडियो से समझिए!

भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर का उद्घाटन 13 फरवरी 2026 को हुआ। इसे… Read More

6 days ago

भ्रष्ट-आचार अब एक शिष्ट-विचार, इसे खत्म करना मुश्किल, दो उदाहरणों से समझिए कैसे?

‘भ्रष्ट’ का अर्थ है- जब कोई अपने धर्म (कर्तव्य-पथ) से दूर हट जाए और ‘आचार’… Read More

7 days ago

ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर ‘दफन’, और ‘गुलाम-सोच’ लिखती है- “सूरज डूब गया”!

ऐसी सूचना है कि अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर दिवालिया हो गई और उसका… Read More

1 week ago