आज़ादी का 75वां साल : तंत्र और जन के बीच अब भी एक डंडे का फ़ासला!

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 12/8/2021

और उस दिन ‘तंत्र’ की ‘जन’ से मुलाकात हो गई। पाठकों को लग सकता है कि भाई ‘तंत्र’ और ‘जन’ दोनों की मुलाकात का क्या चक्कर है? दोनों तो साथ ही रहते हैं – जनतंत्र।

जी नहीं, ऐसे लिखे हुए पर बिल्कुल न जाएँ। इसमें भारी धोखा है। ऐसा लिखा हुआ तो ख़ूब मिलेगा। कानूनों की किताबों में ख़ूब अच्छी-अच्छी बातें मिलेंगी, पर सब अच्छा-अच्छा होता है क्या? दरअसल, ‘जन’ और ‘तंत्र’ दोनों जनतंत्र नहीं, जन-तंत्र की तरह रहते आए हैं। जन और तंत्र के बीच एक बहुत बड़ा डैश है। सरकारी स्कूलों का मास्टर उसे समझाने के लिए डंडा कहता है। यही डंडा ‘तंत्र’ के पास है, ‘जन’ के पास नहीं। इसलिए दोनों साथ-साथ रहते हुए भी साथ नहीं हैं। एक डंडे का फ़ासला है दोनों के बीच। ‘जन’ जब मजबूरी में ‘तंत्र’ से मिलने के लिए उसके पास जाता है, कभी थाने में, कभी तहसील कार्यालय में, कभी कोर्ट-कचहरी में, तो इस एक डंडे के फ़ासले पर मिलता है।

पर अभी तो ‘तंत्र’ ही ‘जन’ से मिलने चला है। ऐसा कैसे? ‘तंत्र’ को क्या पड़ी कि अपनी कुर्सी छोड़कर ‘जन’ से मिलने चले जाए? होती है भाई, साल में कम से कम दो बार ‘तंत्र’ की ‘जन’ से मुलाकात होती है। वे दिन ही ऐसे होते हैं। उन दिनों ‘तंत्र’ बहुत भावुक हो जाता है। राष्ट्रभक्ति के गीत उसे रुलाने लगते हैं। उसे बापू याद आने लगते हैं। इसी भावुकतावश वह ‘जन’ से मिलने चला जाता है।

‘तंत्र’ आज फिर ‘जन’ से मिला है। इतना पुनीत मौका है तो व्यर्थ की बातें छोड़कर उनकी बात सुन लेते हैं।

“नमस्कार ‘जन’ महोदय, कैसे हों?” नमस्कार करते हुए भी एटीट्यूड तो वही है जो ‘तंत्र’ में होता है। जरूरी भी है। नहीं तो दो टके के ‘जन’ को सिर चढ़ने में समय नहीं लगता है।

“अरे सर। आज आप कैसे? हमारा अहोभाग्य। आप खुद मिलने चले आए।” जितना सम्भव हो, ‘जन’ झुकने की कोशिश में है। वैसे, 75 साल से झुकते-झुकते वह झुकने के अधिकतम स्तर पर तो पहुँच ही चुका है। फिर भी ‘तंत्र’ के दम्भ को सन्तुष्ट करने के लिए, कोशिश करते दिखना जरूरी है।

“अबे, पहली बार मिल रहे हैं क्या? याद ना आ रहा?” हल्की सी झिड़की लगाई ‘तंत्र’ ने,  जो न चाहते हुए भी तगड़ी हो गई। ऐसी कभी-कभार की सौजन्य मुलाकातों से आदतें थोड़ी बदलती हैं। इसलिए ‘अबे’ यकायक मुँह से निकल गया।

“सर माफी चाहूँगा, याद नहीं आ रहा। पर आप अचानक मिलने क्यों आए?” देखिए ‘जन’ का हरामीपना। अपनी छोटी-छोटी समस्याओं में याद ही नहीं रहता कि कुछ माह पहले ही तो ‘तंत्र’ उससे मिलने आया था। 26 जनवरी के आस-पास का ही समय होगा। साल में दो बार मिलते ही हैं ‘तंत्र’ महोदय, फिर भी भूल जाता है ‘जन’।

पर आज ‘तंत्र’ ने बुरा नहीं माना। बुरा मानने का अभी मौका नहीं है। बोला, “आज ‘तूफान से लाए हैं कश्ती निकालकर’ टाइप कुछ सुना तो अचानक भावुक हो गया। लगा कि तुमसे मिलने का वक्त फिर आ गया है। ऐसे गाने पता नहीं कौन लिख गया। कसम से, रुला देते हैं।” हाथ जेब में रखे रुमाल की ओर जाते-जाते रुक गया। आँखों को भी पता है कि कहाँ रोना है। अभी केवल कहने का वक्त है, रोने का नहीं। वैसे, भी ‘जन’ के सामने केवल कहने से ही काम चल जाता है।

“जी सर। प्रदीप जी लिख गए।” ज्ञान बघारने का मौका नहीं छोड़ता ‘जन’, व्हाट्स एप हो या सीधे ‘तंत्र’ से बातचीत। “वैसे सर, मुझे तो अभी बाढ़ के हालात देख-देखकर रोना आ रहा है। बेचारे कितने लोग बेघर हो गए, कितनी फसलें नष्ट हो गईं।” उसने बात जारी रखी।

“फिर वही तुच्छ बातें। भाई, ज़रा अपना स्तर बढ़ाओ। वो कौन-सा गीत था न! उसे सुनकर तो पंडितजी भी रो दिए थे। अपने वर्तमान प्रधानमंत्री साहब भी अभी किसी बड़ी बात पर रो दिए थे। देखो, बड़े लोग कैसी बड़ी-बड़ी बातों पर रोते हैं और तुम स्साला छोटी-छोटी चीजों का रोना रोते रहते हो कि सड़क खराब है। पानी गन्दा आ रहा है। कचरा गाड़ी नहीं आ रही। फसल खराब हो गई। काम-धन्धा नहीं है। इसीलिए हम ‘तंत्र’ लोगन को तुम ‘जन’ लोगन से मिलने की इच्छा नहीं होती।” भावुकता के साथ ‘तंत्र’ व्यावहारिकता का पुट डाल रहा है।

“पर सर, स्तर बढ़ाने के लिए अतिरिक्त चार पैरों की जरूरत पड़ती है। वे कहाँ से लाएँ?” यह बात ‘जन’ ने कटाक्ष में कही या असल में, ‘जन’ ही जाने। उसका इशारा कुर्सी की ओर है।ऐसा कहते हुए उसकी रीढ़ दो इंच ऊपर उठ गई है। हिम्मत भले ही अनजाने में की गई हो, रीढ़ की हड्‌डी को थोड़ा ऊँचा कर ही देती है।

इधर, चार पैरों का उल्लेख होते ही ‘तंत्र’ के चेहरे पर मलाई जैसी चमक आ गई। ‘तंत्र’ को बखूबी पता है इन चार पैरों की इस ताकत के बारे में। उसे न पता होगा, तो किसे होगा। ‘तंत्र’ और चार पैर अब एक-दूसरे के पूरक हो चुके हैं। पूरा ‘तंत्र’ इन चार पैरों पर चलता है। चार पैरों की महिमा ही है कि ‘तंत्र’ के दरवाज़े के बाहर चार पैर वाले स्टूल पर बैठे हुए चपरासी में भी ‘तंत्र’ की वही शक्ति आ जाती है, जो दरवाज़े के अन्दर बड़ी-सी कुर्सी पर बैठे किसी मंत्री या अफसर के पास होती है। भले ही मौके-बेमौकों पर भावुकतावश ‘तंत्र’ अपने दो पैरों पर ‘जन’ से मिलने चला आता हो, लेकिन ‘जन’ यह न मान ले कि ‘तंत्र’ अपने चार पैर कहीं छोड़कर उससे मिलने आया है। ये चार पैर उसकी मानसिकता के साथ चिपककर उसके साथ ही आते हैं। चिपकी हुई जोंक को याद कर लें। बस, उसी तरह।

आज़ादी के 75 साल का यही हिसाब है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है पूरे देश के लिए!!

ऊपर बैठे हमारे स्वतंत्रता सेनानी इस पर अक्सर आँसू बहाते हैं। खुशी के मान लेते हैं..!!
——
(ए. जयजीत देश के चर्चित ख़बरी व्यंग्यकार हैं। उन्होंने #अपनीडिजिटलडायरी के आग्रह पर ख़ास तौर पर अपने व्यंग्य लेख डायरी के पाठकों के उपलब्ध कराने पर सहमति दी है। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इसके लिए पूरी डायरी टीम उनकी आभारी है।)

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