टीम डायरी
अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बहुत दिलचस्प बात कही। उनके मुताबिक, “भारत के युवाओं ने अंतरिक्ष में नई उड़ान भरी है। यह बहुत बड़ी सफलता है। ‘स्काई रूट’ में काम करने वाले युवाओं की पूरी टीम की औसत उम्र 28 साल है।” यहाँ प्रधानमंत्री उन युवाओं की बात कर रहे थे, जिन्होंने हर तरह की चुनौतियों, प्रलोभनों, अवसरों को ठुकराते हुए सबसे पहले देश चुना। ये सभी प्रतिभाशाली युवा हैं। ये भी चाहते तो किसी न किसी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) या भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) से पढ़ाई करने के बाद किसी बहुराष्ट्रीय विदेश कम्पनी में नौकरी (गुलामी भी कह सकते हैं) कर सकते थे। विदेश जाकर करोड़ रुपए की कमाई, सुख-सुविधा की जिन्दगी बिता सकते थे। वहीं विदेश में बैठे-बैठे भारत और भारतीय व्यवस्था को गाली दे सकते थे। ऐसा देश के कई युवा कर ही रहे हैं।
लेकिन नहीं, इन लोगों ने ऐसा नहीं किया। इन्होंने विज्ञान और तकनीक में शिक्षा तथा दक्षता हासिल करने के लिए बाद देश को तवज्जो दी। जब तक भारत में ‘अंतरिक्ष’ निजी क्षेत्र के लिए नहीं खुला था, तब तक सरकारी एजेंसी (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन-इसरो) में काम किया। सरकार के तंत्र और ‘सरकारी’ सीमाओं, जटिलताओं के बीच ही रहते हुए। लेकिन जैसे ही ‘अंतरिक्ष’ निजी क्षेत्र के लिए खुला, इन्होंने अपने उपक्रम शुरू किए। अपने रास्ते बनाए और वह कर दिखाया, जिसकी देश इनसे अपेक्षा कर रहा था। शनिवार, 18 जुलाई को निजी क्षेत्र की अंतरिक्ष कंपनी ‘स्काई रूट’ का पहला रॉकेट विक्रम-1 अंतरिक्ष में पहुँचा और देश के नाम एक नई उपलब्धि दर्ज हुई। इस उपलब्धि के साथ ही यह पता चला कि स्काई रूट में काम करने वाले वैज्ञानिकों की औसत उम्र 28 साल है।
इसके बाद अब आते हैं, प्रधानमंत्री के बयान के दूसरे हिस्से पर, जो बेहद संक्षिप्त लेकिन सटीक था। उन्होंने निजी क्षेत्र के युवा वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए यह भी जोड़ दिया, “मैं 56 साल के युवाओं की बात नहीं कर रहा हूँ।” तो प्रश्न आया कि कौन हैं ये 56 साल के युवा, जिनकी ओर प्रधानमंत्री ने कटाक्षपूर्ण संकेत किया और क्यों? जवाब स्पष्ट था कि ये राजनैतिक पृष्ठभूमि के लोग हैं। इनमें एक तो देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल के ‘घोषित मालिक’ हैं। वे स्पष्टता के साथ घोषणा कर चुके हैं कि देश के युवाओं को ‘भारतीय सत्ता के खिलाफ खड़ा करना’ है। बीते साल 15 जनवरी को उन्होंने यह बयान दिया था, जिसके लिए उनके विरुद्ध अदालत में मामला भी दायर किया गया है। उनके साथ, इन दिनों एक सामाजिक और पर्यावरण कार्यकर्ता हैं, जिनकी उम्र 58-59 साल के करीब है। इनकी पृष्ठभूमि भी देश के सबसे पुराने राजनैतिक दल के साथ जुड़ी है। इनके पिता विधायक और मंत्री रहे हैं। वर्तमान में इन्हें इस दल का पूरा समर्थन भी मिल रहा है। ये देश के युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़काने में खुलकर मदद कर रहे हैं। ऐसे ही उत्तर प्रदेश के एक नेता हैं, उम्र है 53 साल। वह अपने राज्य में यही सब कर रहे हैं।
आखिर में इन नेताओं का मकसद? सिर्फ सत्ता तक पहुँचना। हालाँकि, अभी निश्चित रूप से यह जो मुद्दे उठा रहे हैं, वह युवाओं और अन्य वर्गों के हितों के लगते हैं। लेकिन राजनीति और संसदीय लोकतंत्र का इतिहास गवाह है कि जब तक कोई दल सड़कों पर है, विपक्ष में है, तभी तक वह जनता के हित की बातें करता है। अलबत्ता, कुछ चुनिंदा घटनाओं को छोड़ दें, तो सड़कों पर प्रदर्शन करते हुए लाठियाँ तो तब भी विपक्षी नेता नहीं खाते। पुलिस की लाठियाँ आम जनता को ही खानी पड़ती हैं। ये लोग पीछे से सिर्फ उस जनता को लाठियाँ खाने के लिए उकसाते भर हैं। और जब ऐसे प्रदर्शनों के बलबूते सत्ता तक पहुँच जाते हैं, तो सबसे पहले उसी जनता को भूलकर वही सब काम करने लगते हैं, जिनके खिलाफ कुछ समय पहले तक आवाज उठाते हुए, पिछली शासन-व्यवस्था को गरिया रहे थे।
ज्यादा पुराना नहीं, 10-15 साल पीछे का उदाहरण याद कीजिए। दिल्ली में एक आन्दोलन तत्कालीन ‘केन्द्र सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ’ हुआ था। इस आन्दोलन से एक नया राजनैतिक दल उभरा। उसने ईमानदारी का लबादा ओढ़ा और दिल्ली में सरकार बनाई। करीब 15 साल चलाई भी और उसी ईमानदारी के खोल में घुसकर खूब भ्रष्टाचार किया। आज यह दल पंजाब में यही सब कर रहा है और मजे की बात है कि इस दल के मुखिया भी ‘56 साल के युवा’ की श्रेणी में गिने जा सकते हैं, क्योंकि इनकी उम्र अभी 57 के आस-पास है। दिल्ली में मौजूदा केन्द्र सरकार के खिलाफ चल रहे आन्दोलन की आग में घी डालने का काम यह भी भरपूर कर रहे हैं।
खैर, दूसरा उदाहरण! दिल्ली के उसी 10-15 साल पुराने आन्दोलन में एक मुद्दा कालेधन का था। उस मुद्दे को माहौल में उछालकर तब के प्रमुख विपक्षी दल ने केन्द्र में सरकार बनाई। आज इस दल की सरकार को 12 साल से ज्यादा हो चुके हैं। इस सरकार के मुखिया और प्रधानमंत्री एक पैसे का हिसाब भी जनता को नहीं दे पाए कि कितना काला धन देश में वापस लाया गया या बाहर जाने से रोका गया है। और तो और देश के सबसे पुराने दल के मालिक ‘56 साल के कथित युवा’ नेता जो संसद में जिम्मेदार पद पर होते हुए भी बेहूदा हरकतें करने से नहीं चूकते, उन्हीं की सरकारें ऐसे तमाम काण्ड करने में लिप्त रही हैं, जिनके खिलाफ आज वह युवाओं को भड़का रहे हैं।
कहने का मतलब क्या? यही कि युवाओं को आज यह समझने की जरूरत है कि नेताओं के हाथ की कठपुतली बनने से उनका भविष्य नहीं सँवरने वाला। राजनेताओं को सिर्फ अपने मकसद से मतलब होता है। जनता उनके लिए सिर्फ सत्ता तक पहुँचने का माध्यम है, इससे अधिक कुछ नहीं। उनके लिए हमारी हैसियत सिर्फ एक मत (वोट) है। इस एक मत की बदौलत जैसे ही वे सत्ता तक पहुँचते हैं, हम उनके लिए भेड़-बकरियों से भी गए-गुजरे हो जाते हैं। ‘सरकार’ बनने के बाद वे सब भूलकर, हमारे बलिदान, हमारे मत को भुलाकर बदले में हमें वही दुष्परिणाम देते हैं, जिनसे पीछा छुड़ाने की उम्मीद में हमने उनके लिए लाठियाँ खाई होती हैं। इसलिए जागिए और अपना रास्ता चुनिए। नेताओं के लिए सड़कों पर लाठियाँ खाने का नहीं, आसमान की ऊँचाई छूने का। देश को ऊपर ले जाने का।
