दीवार से ‘सटकार’ वाहन खड़ा न करें.. एक हिन्दी अखबार के दफ्तर के बाहर ऐसा लिखा है!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

अभी दो दिन पहले की बात है। एक बड़े अखबार के राष्ट्रीय राजनीतिक सम्पादक रहे वरिष्ठ पत्रकार (नाम जानबूझकर लिखने से परहेज किया है) से मिलने घर से निकला। उन्होंने शाम चार बजे के आस-पास मिलने का समय दिया था। साथ ही, कहा था कि पहले एक बार फोन कर लेना। उनकी यह हिदायत मुझे घर से निकलने के बाद ध्यान आई। लिहाजा, जहाँ तक भी पहुँचा, वहीं गाड़ी रोककर उन्हें फोन किया। बात हुई और उन्होंने बताया, “अभी थोड़ा व्यस्त हूँ। शाम साढ़े पाँच बजे तक आ जाना।” 

इस वक्त मेरे पास लगभग एक घण्टा था। घर वापस जाने का कोई मतलब नहीं था, क्योंकि जाना-आना ही हो पाता। तो क्या करता? जहाँ था, वहीं आस-पास घूमते-टहलते वक्त बिताने का सोचा। इसी दौरान एक बड़े हिन्दी अखबार के दफ्तर की बाउण्ड्री वॉल पर चस्पा एक कागज पर नजर गई। बाहर अपने वाहन पार्क करने वालों के लिए उसमें हिदायत लिखी थी, “दीवार से ‘सटकार’ वाहन खड़ा न करें।” उसे पढ़ने के बाद कुछ देर तक तो मुझे समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों लिखा है? 

फिर समझा कि शायद हिदायत यह होगी कि दीवार से ‘लगा कर, सटा कर’ वाहन खड़े न करें। निश्चित रूप से यही होगा। लेकिन मुद्दा ज्यादा अहम ये ध्यान में आया कि मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख हिन्दीभाषी राज्य का बड़ा हिन्दी अखबार ऐसी बचकानी गलती कैसे कर सकता है? इसमें माना जा सकता है कि टाइपिंग करते वक्त किसी से गलती हो गई होगी, तो भी सवाल यह है कि रोज बड़े-बड़े धुरन्दर सम्पादक वहीं से निकलते हैं। वहीं खड़े होकर सिगरेट पीते हैं। उनकी नजर कैसे नहीं पड़ी? 

इन सवालों का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। सिवाय इसके कि यह मामला विशुद्ध लापरवाही का ही है। किसी को अपनी भाषा के दुरुपयाेग या उसकी अवमानना जैसे मसलों की परवा ही नहीं है। बल्कि उनकी ज्यादा दिलचस्पी तो हिन्दी भाषा के नाम पर अन्य क्षेत्रीय भाषाओं वाले राज्यों में होने वाले विवादों में रहती है। उन विवादों में उनके लिए मिर्च-मसाला जाे होता है। बाजार में अखबार बेचने में इस तरह के मिर्च-मसाले से मदद मिलती है। और उसे ही भाषा की सेवा मान लिया जाता है!  

अलबत्ता, क्या यह बेहतर नहीं होता कि हम अपनी भाषा के उपयोग, उसके मान-सम्मान के प्रति सजग रहते। अपनी जिम्मेदारी और अपने सरोकार का परिचय देते हुए जहाँ भी गलत भाषायी वर्तनी लिखी गई, उसे उजागर करते। उसे सुधारने, सुधरवाने में मदद करते, मार्गदर्शन देते। तब शायद हम अपनी भाषा की बेहतर सेवा भी कर पाते और उसे देश-दुनिया के अन्य क्षेत्रों में सम्मान दिला पाते।

काश, ऐसा होता!!    

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