समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश
देखो प्रिय वसंत
जरा बाहर आओ मधुमास की सुबह है
कन्नौज के इत्रों से अधिक महक रहा
जाने अनजाने फूलों का यह वितान
वसंत के अमृत अनुभव का आमंत्रण है।
झिझकती शीत और ग्रीष्म की उमगन
भीषण तप से पहले भ्रमरों का गुंजन
कोई अभ्यास नहीं यह पंचम स्वर, प्रिये
मिलन को विह्वल प्राणों की तड़पन है
——–
(नोट : #अपनीडिजिटलडायरी के शुरुआती और सुधी-सदस्यों में से एक हैं समीर। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि रखते हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ, व्यंग्य आदि भी लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराया करते हैं।)
अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More
कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More
शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More
भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More
जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More