‘मायावी अम्बा और शैतान’ : अनुपयोगी, असहाय, ऐसी जिंदगी भी किस काम की?

ऋचा लखेड़ा, वरिष्ठ लेखक, दिल्ली

# भविष्यवाणियाँ #

उस जादूगरनी से मिलना उसकी अटल नियति थी। एक भविष्यवाणी। भले उसके भीतर हम कहीं छिपे थे लेकिन उस जादूगरनी के सम्मोहन को हमने भी महसूस किया था। हम उससे सम्मोहित थे। वैसे, उससे जुड़ी और भी कई भविष्यवाणियाँ थीं, जो सच होने वाली हैं। जैसे- जगहें बदलने की, तेजी से अपनी केंचुली उतार देने की, नया रूप धर लेने की, गिरने और फिर उठ खड़े होने की। उसकी किस्मत में ये भी तय ही था कि वह जादूगरनी उसे किशोरावस्था की तमाम दुविधाओं से खींचकर बाहर लाएगी। वह खुद भी तो इन दुविधाओं से, अपनी विचित्रताओं से आजादी चाहती थी।

वैसे उसके दोबारा आकार लेने की शुरुआत तभी हो गई थी, जब वह बेहोश थी। इसलिए जब उसे होश आया तो उसके जेहन में तरह-तरह की बेतरतीब यादें थीं। स्मृतियों के हर हिस्से में उसका रूप-स्वरूप अलग था। किसी रूप में उसके साथ बहुत बुरा हुआ था। किसी में उसके साथ कुछ भी बुरा नहीं हुआ। इतने से जीवन में ही अब तक सामने आए इन सभी स्वरूपों को उसने देखा। उन सभी में उसका अंश था। उसके उन सभी स्वरूपों को जोड़ दिया जाए, तो उनका योग उससे कहीं ज्यादा बैठता था। इस एहसास ने उसे डरा दिया। वह समझ नहीं पाई कि अगर उसके इतने स्वरूप हैं, तो उनमें से वह खुद असल में कौन है? क्या ये सब झूठ हैं? और इस वक्त वह जो है, वही सच है? या फिर इस समय भी उस पर कोई झूठा आवरण चढ़ा है? और आने वाले वक्त के लिए उसके जो स्वरूप कतार में खड़े हैं, उनमें से कोई उसका असल है?

हमने उससे बात करने की कोशिश की। वह भ्रमित दिखाई देती थी। उसकी आवाज हवा के नरम झोंके जैसी थी। हमने इतनी सुंदर ध्वनि इससे पहले कभी नहीं सुनी थी।

…. “कौन हो तुम?” – आखिर उसने हमसे पूछ ही लिया।

….“हम सभी तरह के हैं। कभी एकदम साधु जैसे। कभी इंसान की तरह। तो कभी बेहद नीच।” हमने उत्तर दिया।

….“मैं ही क्यों?” – उसका अगला सवाल था।

….“तुम्हारे भीतर दैवीय तत्त्व है। तुम्हें अपना सच पता है।”

….“कब से तुम लोग मेरे भीतर हो?”

….“जब से तुमने माँ के गर्भ में आकार लेना शुरू किया, तभी से।”

….“यह कैसे संभव है”- उसे यकीन नहीं हुआ।

…. “बहुत आसान था। तुम अपार संभावनाओं से भरी हुई थी। इसके बावजूद तुम्हारी त्वचा के नीचे और अस्थि मज्जा के भीतर अथाह खाली जगह थी। हमारे आसरे के लिए पर्याप्त से अधिक थी।” हमने जवाब दिया।

…. “तुम लोग मेरे भीतर कुंडली मारकर बैठे थे। निष्क्रिय थे। फिर भी मैं तुम्हारी मौजूदगी से होने वाली बेचैनी को महसूस कर पा रही थी। वे दु:स्वप्न और डरावने सपने, सभी क्या तुम्हारी मौजूदगी के कारण थे?” उसने हैरानी से पूछा।

…. “सभी नहीं, लेकिन ज्यादातर।” हमने उत्तर दिया।

…. “अब तुम लोग मुझसे क्या चाहते हो?” उसने पूछा।

…. “हमें स्वीकार कर लो और हमारे रूप में तुम्हें जो उपहार मिला है, उसका उपयोग करो।” हमने कहा।

…. “और क्या?” उसने फिर सवाल किया।

…. “खून का भरोसा और कुरबानी की जरूरत होगी।” हमने जवाब दिया।

…. “क्या तुम चेतावनी देते हो?”

…. “क्या किसी को प्रोत्साहित करना, चेतावनी देना है?”

…. “ऐसे उपहार का क्या अर्थ, जिसे मैंने माँगा ही नहीं। मैने न उसे समझना आरंभ किया और न ही उपयोग किया। अगर मैं आगे भी उसका उपयोग नहीं करती, तो क्या होगा?” उसने पूछा।

…. “चमत्कारिक दैवीय शक्ति से संपन्न बने रहने की भी समय-सीमा होती है। यदि तुम अपने इस उपहार को बरबाद कर देती हो तो ऐसा नहीं कि कोई आफत आ जाएगी। या कोई स्वर्णिम अवसर छूट जाएगा। लेकिन ऐसा कर के तुम किसी बेकार छिलके की तरह निरर्थक जीवन जीती रहोगी। असहाय, अनुपयोगी। ऐसी जिंदगी भी किस काम की?”, हमने उत्तर दिया।

उसके मस्तिष्क पटल में अनगिनत विचार उमड़-घुमड़ आए। तमाम तरह के सवाल उठने लगे। उनके उत्तर भी आने-जाने लगे। महीन, बेतरतीब। एक पल में वे आकार लेते और अगले ही क्षण छिन्न-भिन्न हो जाते।

दूसरे शब्दों में कहें तो उसके दिमाग में विचारों की खिचड़ी हर तरफ फैली थी। मस्तिष्क पटल पर संवेदनाओं का तूफान उठा हुआ था। जैसे तीव्र ज्वार-भाटे में समुद्री लहरें अपने किनारों से टकराती हैं, वैसे ही उसके विचार उसके दिमाग की दीवारों से टकराने लगे। सिर की नसें फटने लगीं। वह अभी जहाँ, जिस हाल में खड़ी थी उसका भी होश खो बैठी। स्मृतियों ने खींचकर उसे उसके अतीत में धकेल दिया। वह उस दिन में जा पहुँची, जब कई हफ्तों तक बादलों से ढँके रहने के बाद उस रोज आसमान पर सूरज पूरी तीव्रता से चमका था। और उस विनाशकारी दिन में सूरज के तेज प्रकाश के बीच पूरे कस्बे ने सफेदी की चादर ओढ़ ली थी।

#MayaviAmbaAurShaitan
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(नोट :  यह श्रृंखला एनडीटीवी की पत्रकार और लेखक ऋचा लखेड़ा की ‘प्रभात प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्तक ‘मायावी अंबा और शैतान’ पर आधारित है। इस पुस्तक में ऋचा ने हिन्दुस्तान के कई अन्दरूनी इलाक़ों में आज भी व्याप्त कुरीति ‘डायन’ प्रथा को प्रभावी तरीक़े से उकेरा है। ऐसे सामाजिक मसलों से #अपनीडिजिटलडायरी का सरोकार है। इसीलिए प्रकाशक से पूर्व अनुमति लेकर #‘डायरी’ पर यह श्रृंखला चलाई जा रही है। पुस्तक पर पूरा कॉपीराइट लेखक और प्रकाशक का है। इसे किसी भी रूप में इस्तेमाल करना कानूनी कार्यवाही को बुलावा दे सकता है।) 
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पुस्तक की पिछली 10 कड़ियाँ 

40 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : खून से लथपथ ठोस बर्फीले गोले में तब्दील हो गई वह
39 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह कुछ और सोच पाता कि उसका भेजा उड़ गया
38- मायावी अम्बा और शैतान : वे तो मारने ही आए थे, बात करने नहीं
37 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : तुम्हारे लोग मारे जाते हैं, तो उसके जिम्मेदार तुम होगे
36 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’: ऐसा दूध-मक्खन रोज खाने मिले तो डॉक्टर की जरूरत नहीं
35- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : इत्तिफाक पर कमजोर सोच वाले लोग भरोसा करते हैं
34- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : जो गैरजिम्मेदार, वह कमजोर कड़ी
33- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह वापस लौटेगी, डायनें बदला जरूर लेती हैं
32- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह अचरज में थी कि क्या उसकी मौत ऐसे होनी लिखी है?
31- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : अब वह खुद भैंस बन गई थी

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Neelesh Dwivedi

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