आवारा की डायरी-3 : रिश्ते का मैलापन इश्किया बारिश में धोकर वे आगे बढ़ गए

दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश

अनन्या के हाथ ने जैसे ही अनन्य को छुआ उसे अपने जीवन के पहले प्रेम प्रसंग की याद आ गई, जिसे उसने जवानी की दहलीज में कदम रखते ही पाया था। गाँव की गलियों में मिली उस महबूबा से अनन्य ने अनन्या के लिए सम्बन्ध भले तोड़ लिए हों, लेकिन उस बिरहन की आह नश्तर की तरह अनन्य के सीने में चुभ रही थी। संजना से ठीक दो साल पहले वह यही कहकर अलग हुआ था कि मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता हूँ। तब वह कितना रोई-गिड़गिड़ाई थी, लेकिन अनन्य ने उसकी चीख-पुकार को अनसुना कर दिया था। करीब दो साल पहले यूँ ही हाथ पकड़कर लगभग घिसटते हुए संजना ने अनन्य से आखिरी शब्द कहे थे, जो आज भी उसके कानों में सोते-जागते- गूँजते थे।

उसने कहा था, “जिस लड़की के लिए तुम मुझे छोड़ रहे हो एक दिन वह तुम्हें छोड़कर चली जाएगी। तुम्हें लौटकर मेरे पास ही आना है। मैं तुम्हारा इंतजार करूँगी।” अनन्य के मन में अनन्या के स्पर्श मात्र से संजना और उसके आखिरी शब्द गाँव वाली मस्जिद की अजान की तरह गूँज उठे, “वह तुम्हें छोड़कर चली जाएगी…वह तुम्हें छोड़कर चली जाएगी”। अचानक उसे अपने बाएँ हाथ में करंट का झटका-सा महसूस हुआ और वो भूत से सीधा वर्तमान में आ गिरा। अनन्या ने बड़ी जोर से उसका दाहिना हाथ झटकारते हुए कहा, “अरे यार जब तुम मेरे साथ रहो, तो बस यहीं रहो। अब खड़े- खड़े क्या सोचने लगे, चलो न बाबा, देर हो रही है।”

अनन्य ने कहा, “तुम्हें पता है जानेमन प्रेमिकाओं का स्पर्श बड़ा जादुई होता है। वह झट से एक लोक से दूसरे लोक में पहुँचा देता है।” अनन्या ने हँसते हुए कहा, “तो बताओ मुझे अभी कौन से लोक से होकर आ रहे हो।” “कुछ नहीं, गाँव की गलियों से होकर आ रहा हूँ। वहाँ खो गया प्यार तुम्हारी आँखों में खोज रहा हूँ।” अनन्या को समझते देर न लगी कि वह संजना की बात कर रहा है, क्योंकि अनन्य ने उसके बारे में पहले ही उसे सब बता दिया था। अनन्या ने मनुआभान की टेकरी में बने जैन मन्दिर की ओर अनन्य को ले जाते हुए कहा, “तुम कभी यहाँ आए हो?” अनन्य ने कहा, “नहीं, आज पहली बार तुम्हारे साथ ही आया हूँ। सारा वक्त तो कॉलेज में तुम्हारे साथ बीता। आधा भोपाल तुम्हारे साथ नापा और आधा दोस्तों के साथ, क्योंकि असल में दोस्तों से चुराया गया समय ही प्रेमिकाओं का होता है।”

अनन्या ने कहा, “दो साल में कुछ ज्यादा ही बड़ी-बड़ी बातें नहीं करने लगे हो। बड़ा साहित्यिक जवाब दे रहे हो। ये बाल बड़े करके ज्यादा हीरो मत बनो। कुछ दिन और, फिर सब कटवा दूँगी। यहाँ मेरे साथ होकर भी उस गाँव की गँवार को याद कर रहे हो। इतने समय मुझसे दूर रहकर भी तुम्हें समझ में नहीं आया कि तुमको किसके साथ जीवनभर रहना है। मकरन्द सर ने तो मुझसे कहा था कि तुम बहुत बेताब हो, मुझसे मिलने के लिए और अब तक का सब भूलकर मेरे साथ जिन्दगी में आगे बढ़ना चाहते हो?” अनन्या यह सब कहते हुए बड़बड़ाए जा रही थी और अनन्य अपने मौन को साध रहा था। उसे मकरन्द सर ने समझाया था कि यदि अनन्या को अपनी जिन्दगी में वापस चाहते हो, तो उसके गुस्से को सोख लेना। जैसे अब तक सोखते चले आए हो। शायद इसीलिए उसने कोई प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं समझा। मकरन्द सर उन दोनों के यूनिवर्सिटी के एक बैच सीनियर थे, जिन्होंने दोनों का पैचअप करवाने की पहल खुद की थी। इसी पहल के बाद आपसी बातचीत और सहमति से दोनों ने मनुआभान की टेकरी पर मिलना तय किया था।

अब तक दोनों साथ चलते हुए बातें करते जैन मन्दिर की सीढ़ियों तक पहुँच गए थे। अनन्य ने कहा, “देवी हम मन्दिर के प्रांगण में प्रवेश कर चुके हैं, क्या आप वार्तालाप को विराम दे सकती हैं?” कभी-कभी वह शुद्ध हिन्दी में यूँ ही बातें करके अनन्या को हँसाने की कोशिश करता था। यह उसकी पुरानी आदत थी। इतना सुनते ही अनन्या के चेहरे पर एक छोटी सी मुस्कान खिल गई। मनुआभान की टेकरी का सुरम्य वातावरण और भोपाल की हरियाली भरी फिजा से छनकर आ रही ठंडी बयार के बीच जैन मंदिर का एकान्त उन्हें शान्ति महसूस करा रहा था।

जैन तीर्थंकरों और मुनियों को समर्पित उस मन्दिर से निकलते ही अनन्य बोला, “अब आगे की क्या योजना है सखी, आदेश करें। मैं आपके आदेश की प्रतीक्षा में हूँ।” लगभग उसी अन्दाज में जवाब देने हुए अनन्या बोली, “हम मन्दिर के पीछे वाले हिस्से में चलकर बैठेंगे प्राणनाथ। वहीं आपसे शेष वार्तालाप होगा।” “नहीं सखी, मैं अब तुमसे वार्तालाप का इच्छुक नहीं हूँ। मुझे इस एकान्त में सिवाय तुम्हारे अधरों के कुछ दिखाई नहीं दे रहा है।” अनन्या ने अनन्य के लम्बे बालों को पकड़़कर खींचते हुए कहा, “नहीं प्राणनाथ। यह एकान्त आपके प्रणय निवेदन को स्वीकरने हेतु नहीं, अपितु वार्तालाप के लिए मिला है। इसलिए आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखें।

उनकी बातचीत का यह अंदाज शायद आगे होने वाली गम्भीर चर्चा के पहले की भूमिका मात्र था। वे दोनों एक-दूसरे को थोड़ा सहज करने में लगे थे, ताकि अपने-अपने मन की बात खुलकर कर सकें। मन्दिर के पीछे टेकरी के आखिरी छोर पर पहाड़ के सीने में धँसी एक चट्टान की ओर इशारा करते हुए अनन्या बोली, “चलो, वहाँ बैठते हैं।” अनन्य बिना कुछ कहे टेकरी के दूसरे छोर पर दिख रहे एक छोटे से पेड़ की ओर चल दिया। जैसे-जैसे वह आगे कदम बढ़ा रहा था, उसे टेकरी में इधर-उधर बेतरतीब पड़ी चट्टानों की ओट में छिपे कुछ प्रेमी जोडे़ प्रेमालाप में मग्न दिखाई दे रहे थे। और खास बात तो यह थी कि उन् दोनों को देखकर वहाँ कोई भी जोड़ा असहज नहीं हो रहा था। जैसे भोपाल में उन दिनों यह खुलकर किया जाने वाला कोई नवाचार हो। हालाँकि अनन्य इससे सहज नहीं था।

फिर भी वह खुद को सहज करते हुए बोला, “चलो यहाँ से, मुझे यहाँ नहीं बैठना है।” लेकिन अनन्या उसकी बाँह पकड़़कर उसे लगभग घसीटते हुए दूर एक चट्टान तक ले गई, जिसकी ओर कुछ देर पहले उसने इशारा किया था। टेकरी के उस छोर पर पहुँचकर अनन्य ने भोपाल का नजारा देखते ही कहा, “ये हुई न बात। यहां से तो भोपाल कितना खूबसूरत दिख रहा है। तुम्हें पहले ही मुझे यहाँ तक ले आना चाहिए था।” अनन्य टेकरी से भोपाल को देखकर मंत्रमुग्ध होकर बेसुध-सा खड़ा था। उसकी बेसुधी को अनन्या के एक सवाल ने तोड़ा, “क्या तुमने मुझे माफ कर दिया अनन्य? क्या हम अब शादी कर सकते हैं?” लेकिन इन सवालों का अनन्य के पास कोई जवाब नहीं था अभी। वह चुप था कि तभी अनन्या का एक और सवाल, “तुम कुछ बोलोगे, या मौनी बाबा बने रहोगे?”

“मैं भोपाली फिजा की शांति को पी रहा हूँ।” यह कहते हुए अनन्य उसकी गोद को तकिया बनाकर पथरीली जमीन की चादर पर वहीं ढेर हो गया। अब वह अनन्या की आँखों में खुद को खोज रहा था। उसके मन में हजार सवाल थे। कहने को न जाने कितनी बातें थी, मगर समझ नहीं पा रहा था कि कहाँ से शुरुआत करे। उसने सिर्फ एक ही सवाल पूछा, “हमारे बीच किसी तीसरे की जगह थी क्या? आखिर तुमने मोहित के लिए मुझे क्यों छोड़ दिया?” सवाल सुनते ही अनन्या की आंखों से आँसूओं का झरना बह निकला। फिर थोड़ा सँभलकर वह बोली, “वह मेरी जिन्दगी की बड़ी भूल थी। तुम्हें जो महसूस हुआ, उसमें कुछ हद तक सच्चाई है। मैं इसके लिए दिल से तुमसे माफी माँगना चाहती हूँ। लेकिन अब मैं तुम्हारे सिवाय किसी और के बारे में सोच भी नहीं सकती। मुझे तुम्हारे साथ नई शुरुआत करनी है। हम जल्द से जल्द शादी करेंगे। बस, तुम अपने करियर को लेकर थोड़ा सीरियस हो जाओ। अखबार बदलो या शहर बदलो ! कुछ ऐसा करो कि अच्छी सैलरी पर पहुँचो, ताकि सालभर के अन्दर हम शादी कर सकें। मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूं कि अब से मोहित के साथ मेरा कोई ताल्लुक नहीं रहेगा। मैं तुम्हें उसके साथ कहीं भी दिखाई नहीं दूँगी।”

अनन्या कि बातें सुनते ही अनन्य का दिल जोरों से धड़क उठा। अब दोपहर के 12 बज रहे थे। धूप तेज हो चली थी। यह देखते हुए अनन्या ने किसी फिल्मी हीरोइन की तरह अपनी जुल्फों से अनन्य के चेहरे पर पड़ रही धूप को रोक रखा था। अनन्य बातें करते हुए कभी उसके गाल पर अपनी अँगुलियाँ फिरा रहा था, तो कभी उसकी जुल्फों से खेल रहा था। यह 14 जून 2010 की दोपहर थी, लेकिन अनन्य के लिए एक नया सवेरा। हालाँकि वह अनन्या के जवाब से सन्तुष्ट तो नहीं था, लेकिन अपने इस रिश्ते के बहीखाते का पिछला दो सालों के हिसाब को कंप्यूटर पर लिखे गैरजरूरी टेक्स्ट की तरह ‘डिलीट’ मारना चाहता था। उसने अनन्या की आँखों में देखते हुए अपने हाथों से उसके चेहरे को अपने करीब लाकर उसका माथा चूम लिया और बोला, “तुम जो कह रही हो, उस पर मुझे यकीन तो नहीं हो रहा है, लेकिन तुम्हारी हजार गलतियाँ भी अभी इस वक्त माफ करने का दिल हो रहा है।”

उसने आगे कहता रहा, “मैं नहीं जानता कि तुम्हारे मन में इस वक्त क्या चल रहा है? तुम्हारा उस मोहित के साथ क्या रिश्ता है? तुमने बीते दो साल मुझसे मुँह क्यों मोड़ रखा था? मैं बस मकरन्द सर के कहने पर हमारे रिश्ते को एक आखिरी मौका देना चाहता हूँ, ताकि मेरे अन्दर कोई कसक न रहे कि मैंने इसे बचाने की कोई कोशिश नहीं की। लेकिन तुम बस मेरी एक बात याद रखना मेरी जान कि अब मेरे दिल की गलियों में तुम्हारा यह तीसरा और आखिरी आगमन है। बीते चार सालों में तुम दो बार मुझसे दूर हुई। मगर मेरा आत्मसम्मान और स्वाभिमान इश्क के आगे हमेशा फीका पड़ गया। न जाने क्या है कि तुम्हारे साथ मुझे जो महसूस होता है, तुमसे अलग होकर जिस कदर मैं बेचैन हो जाता हूँ, तुम्हारे बिना मेरी जो हालत होती है, यह सब मुझे कभी संजना से दूर रहकर भी महसूस नहीं हुआ। शायद इसीलिए मैंने उसे छोड़ते हुए जरा-सी झिझक भी महसूस नहीं की। उसके आँसू मुझे फरेबी लग रहे थे। फिर भी यह एक सच्चाई है कि संजना मुझसे अलग होकर भी अलग नहीं हो सकी है।” 

इतना कहकर वह चुप हो रह और प्रेम अपनी चुप्पियाँ तोड़कर मुखर हो गया। इतना कि घड़ी की सुईयों पर उनकी नज़र तक नहीं पड़ी। मध्यम रफ्तार से लुढ़कता हुआ दिन दोपहर के ठीक एक बजे के पड़ाव पर पहुँच चुका था कि तभी मौसम ने करवट बदली। जून की तपने वाली दोपहर से धूप गायब हो गई। बादल गहरा गए। आसमान से धीरे-धीरे बूँदें टपकने लगी। बारिश की बूँदें पड़ते ही वे आलिंगन से मुक्त हो गए। उन्हें एहसास हुआ कि बारिश तेज हो सकती है। अनन्या ने आसमान की तरफ ताकते हुए कहा भी, “लगता है, मानसून आ गया है। खबरों में भी था कि 14 से 16 जून के बीच मानसून दस्तक देगा। हमें यहाँ से निकलना चाहिए।” और वे दोनों उठकर खड़े हो गए। साथ-साथ कदम बढ़ाते हुए वे अब आसमान से बरस रही इश्किया बूँदों में भीग रहे थे। दोनों अपने रिश्ते का मैलापन इसी बारिश में धोकर शाश्वत प्रेम की श्वेत चादर ओढ़े मनुआभान की टेकरी से निकल रहे थे…।

क्रमश:…

#आवाराकीडायरी #aawarakiidiary

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नोट : यह ‘आवारा की डायरी’ नामक अप्रकाशित उस पुस्तक के स्मृति शेष अंश हैं, जिसकी पांडुलिपि तकनीकी खामियों से सालों पहले लैपटॉप से उड़ गई। अब स्मृतियों के जखीरे से यादों को कुरेद- कुरेदकर कड़ी-दर-कड़ी उसे फिर से जीवित करने का यह प्रयास मात्र है।  

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पिछली कड़ियाँ

3 – आवारा की डायरी-2 : जिन्दगी में मोहब्बत का साइक्लोन फिर दस्तक दे चुका था!
2 – आवारा की डायरी-1 : जख्म पर तुम्हारी यादों के फाहे रख दिए हैं
1- आवारा की डायरी : प्रेम हर जख्म का सबसे बड़ा मरहम है! 

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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक नामी अखबारों में कार्यरत रहे। लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। करीब 15 साल शहर–शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। वहीं से अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। कभी लेख, कभी कविता की सूरत में। अपने लिखे हुए को #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक पहुँचें।) 

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