केरल का सबरीमला मन्दिर देश के बड़े और चर्चित हिन्दू धर्मस्थलों में से है।
टीम डायरी
धर्मस्थलों, खासकर हिन्दुओं के धार्मिक स्थानों में राजनैतिक तंत्र की दखलंदाजी से होने वाले ‘प्रदूषण’ की यह एक और बानगी है। केरल के सबरीमला मन्दिर से बड़ी मात्रा में सोने की चोरी किए जाने की जानकारी उजागर हुई है। इस सम्बन्ध में अदालती आदेश के बाद विशेष जाँच दल (एसआईटी) गठित किया गया है। उसने दो मामले दर्ज कर जाँच शुरू की है। इन मामलों के मुताबिक मन्दिर के द्वारपाल की मूर्तियों और गर्भगृह में की गई सोने की नक्काशी से सोना चुराया गया है। यही नहीं एसआईटी के अनुसार सोने की चोरी का मामला इन दो जगहों तक सीमित नहीं है। मन्दिर के अन्य स्थलों से भी सोना चोरी हुआ है, इसके प्रमाण हैं।
अब तक इस मामले में 10 लोगों को हिरासत में लिया गया है। इनमें भारतीय साम्यवादी पार्टी (मार्क्सवादी) के तीन नेता शामिल हैं। केरल में अभी इसी पार्टी के नेतृत्त्व वाले गठबंधन की सरकार है। एसआईटी ने पूर्व मंत्री के. सुरेन्द्रन से भी पूछताछ की है। जब सबरीमला मन्दिर से सोना चुराया गया, तब वही राज्य में देवस्वम मंत्री थे। यानि राज्य के देवस्थानों से सम्बन्धित विभाग के प्रमुख। हिरासत में लिए गए आरोपियों में एक नाम है उन्नीकृष्णन पोट्टी। वह कांग्रेस नेताओं से जुड़ा बताया जाता है। एक तस्वीर में वह पार्टी की शीर्ष नेता सोनिया गाँधी के साथ दिख रहा है। सत्ताधारी दल और कांग्रेस के नेतृत्त्व वाले विपक्षी गठबंधन के बीच इस पर आरोप-प्रत्यारोप जारी है।
हालाँकि यह कोई पहला मौका नहीं है, जब हिन्दू धर्मस्थलों की पवित्रता को भ्रष्ट राजनैतिक दखलंदाजी ने इस तरह से कलंकित किया हो। अभी कुछ समय पहले ही दो अदालती मामले चर्चा में आए थे। एक मामला वृन्दावन के श्री बाँके बिहारी मन्दिर का। वहाँ भ्रष्ट राजनैतिक तंत्र की व्यवस्था मन्दिर की स्थापित परम्पराओं में बाधा डालने की कोशिश करते हुए पाई गई थी। यही नहीं, श्री बॉके बिहारी के विश्राम के दौरान पैसे वालों के लिए विशेष पूजा-अर्चना का बन्दोबस्त करने का भी उस पर आरोप लगा। वहीं, दूसरे मामले में पुरी के श्री जगन्नाथ धाम मन्दिर की सम्पत्ति बेचने की कोशिश करने का भी भ्रष्ट राजनैतिक तंत्र से जुड़ी व्यवस्था पर आरोप लगा है।
इतना ही नहीं, आन्ध्र प्रदेश के तिरुपति बालाजी मन्दिर से जुड़ा विवाद भी याद दिलाना यहाँ प्रासंगिक है। वहाँ मन्दिर के प्रबन्धकों ने ‘शॉल घोटाले’ के तहत भगवान के खजाने में 54.95 करोड़ रुपए की चपत लगा दी। इससे पूर्व इन्हीं प्रबन्धकों पर आरोप लगा था कि उन्होंने मन्दिर के प्रसाद के रूप में बनाए जाने वाले लड्डुओं के लिए दूषित घी की आपूर्ति होने दी। उस घी में सुअर की चर्बी, गौवंश की चर्बी और मछली का तेल, आदि मिला हुआ था। इसी तरह उज्जैन, मध्य प्रदेश के महाकाल मन्दिर के प्रबन्धकों द्वारा ‘वीआईपी पर्ची’ घोटाला किए जाने का मामला भी प्रकाश में आ चुका है, जिसमें दर्शन के लिए 200 रुपए की पर्चियाँ 3,000 रुपए तक में बेची गईं।
कुल मिलाकर कहने का अर्थ है कि हिन्दू मन्दिरों को इस तरह भ्रष्टाचार का अड्डा बनाने वाली राजनैतिक दखलंदाजी से जितनी जल्दी हो मुक्ति पाने की जरूरत है। इसके लिए हिन्दू धर्मावलम्बियों को आगे आना होगा। आन्दोलन करना होगा। आवाज उठानी होगी। अन्यथा हमारे धर्मस्थल यूँ ही अपवित्र होते रहेंगे।
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