डायरी के एक पाठक की अपने भतीजे के नाम पाती, 12/9/2020
प्रिय ईशू
तुम कुछ ही दिनों बाद इस समय जिनेवा में सम्भवत: अपनी कक्षा में रहोगे। यह भगवद्कृपा है कि उच्च शिक्षा के लिए तुम्हें एक अच्छे विश्वविद्यालय में अध्ययन का अवसर मिला है। तुम अपनी पढ़ाई अच्छे से करोगे, इसमें मुझे सन्देह नहीं। पर मैं तुम्हारा ध्यान एक दीगर बात की ओर आकर्षित करना चाहूँगा। वह है, अध्ययन के अतिरिक्त ज्ञानार्जन की। अपने प्रवास के दौरान तुम यूरोप में भारत के प्रतिनिधि रहोगे। स्थानीय नागरिक तुम्हारे हर व्यवहार और गतिविधि से भारतीयों के सम्बन्ध में राय बनाएँगे। इसलिए एक जिज्ञासु विद्यार्थी के रूप में तुम्हारे ऊपर बड़ी जिम्मेदारी होगी।
औपचारिक शिक्षा से इतर तुम वहाँ बहुत सी अन्य बातें सीखोगे। उस ज्ञान को ठीक से आत्मसात करने के लिए तुम्हारे पास सही आधार होना चाहिए और ज्ञान का आधार तो मनुष्य स्वयं ही होता है। लेकिन यदि स्वयं का अर्थ तुम अपनी बुद्धिमत्ता या उपलब्धियों के आधार पर मानोगे तो वह संकीर्ण अहंकार होगा। यह अन्तत: तुम्हें छोटा सिद्ध करेगा। तब तुम खुलेपन से विराट ज्ञान को ग्रहण नहीं कर पाओगे। इसलिए तुम्हारा आधार अपना धर्म, सांस्कृतिक मूल्य और इतिहास होना चाहिए। उसे आधार बनाने पर तुम हमेशा नए ज्ञान को उसकी रचनात्मकता के साथ आत्मसात कर सकोगे।
तुम्हें अपने देश और संस्कृति के प्रति कृतज्ञता का भाव भी वहाँ कभी विस्मृत नहीं होना चाहिए। बल्कि उस पर हमेशा गर्व होना चाहिए। वह तुम्हारे व्यवहार में झलकना चाहिए। तुम्हें ध्यान रहना चाहिए कि हमारा भारत मात्र एक देश नहीं है। वह दुनिया की प्राचीनतम और जीवन्त सभ्यता है। महान भारतीय परम्परा में वैज्ञानिक उपलब्धियाँ, वास्तुकला, संगीत, नृत्य, साहित्य, दर्शन, अध्यात्म विज्ञान आदि के ऐसे सोपान हैं, जिनसे विश्व के सर्वोतम मनीषियों ने प्रेरणा ली है। और तुम वहाँ ऐसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि हो। तुम्हें भारतीय दृष्टिकोण की वृहद् समग्रता और सूक्ष्मतम मनोविज्ञान के अनुपम योग का अनुभव तुलनात्मक रूप से खंडित मानस वाले अत्यंत प्रवाहशील यूरोपीय लोगों से मिलकर होगा जरूर। लेकिन तुम उस आभासी रूप पर ही टिक मत जाना, वरन् गहराई तक जाकर उसकी यथार्थता का और उसके पीछे विद्यमान कारणों का अन्वेषण करना। नीर-क्षीर विवेक इस्तेमाल करना।
यूरोप में तुम एक नितांत नए वातावरण में होगे। वहाँ की अनजान संस्कृति तुम्हें कई जगह चमत्कृत कर सकती है। अपने तर्क, प्रभावोत्पादक चमक-दमक, विकास और ताकत का प्रभाव दिखला सकती है। उसके अनुरूप, उसके रंग-रूप में ढालने के लिए तुम पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दबाव डाल सकती है। साथी-सहपाठियों का भी दबाव रह सकता है। पर इस सबके बीच तुम्हें ये हमेशा ध्यान रखना होगा कि तुम्हारे हर कार्य-व्यवहार पर अन्तिम निर्णय तुम्हारा ही होगा। अपने हर कर्म और उसके परिणाम के उत्तरदायी भी तुम ही रहोगे। इसलिए तुम अपने आहार-विहार काे शुद्ध रखना। हर निर्णय से पहले ठीक से सोचना कि कहीं थोड़ी मेहनत या संघर्ष से बचने के लिए तुम कोई समझौता या ऐसा छोटा रास्ता (शॉर्टकट) तो नहीं अपना रहे, जिससे बाद में तुम्हारे अन्तर्मन में पश्चाताप हो।
मेरा मानना है, सांस्कृतिक स्तर पर यूरोप अभी बहुत युवा और अपरिपक्व है। तुम वहाँ ऐसे लोगों से मिलोगे जिनका ज़िन्दगी के प्रति नजरिया बिन्दास होगा। वे आत्मविश्वास से लबरेज होंगे। वहाँ के नागरिकों का सामाजिक आचरण उस आचार-व्यवहार से बिलकुल भिन्न होगा, जिसके तुम आदी हो और जिसे तुम सहज और नैसर्गिक मानते आए हो। ऐसे में हर छोटी-बड़ी जगह तुम्हारी समझदारी की परीक्षा होगी। इसमें तुम्हें याद रखना होगा कि तुम्हारी सफलता उनके अनुरूप ढल जाने में नहीं है। क्योंकि समझाैते तो गुलाम भी करते हैं। निश्चित रूप से उन्हें इसमें अपना फायदा और चतुराई दिखती है लेकिन वास्तव में वे मूढ़ ही सिद्ध होते हैं। सच्ची समझदारी स्वयं की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से धार्मिक और नैतिक मूल्यों के अनुसार सबके साथ बराबरी का व्यवहार करने में होगी।
ध्यान रखना, यदि तुम अपनी सभ्यता और संस्कृति का अभिमान नहीं रखोगे तो दूसरी संस्कृति के लाेग भी तुम्हारा सम्मान नहीं करेंगे। अपनी जड़ों से जुड़ाव ही तुम्हारी वास्तविक पहचान और ताकत है। वही तुम्हारा मान और सम्मान का आधार है। चाहे अपनी हो या किसी और की, बड़ी से बड़ी उपलब्धि, चमत्कार या आपदा को देख कर चमत्कृत मत होना। विवेक न छोड़ना। अपने मन की शान्ति को मत खोना। अपने अन्तस् में अन्तर्यामी के रूप में विराजमान सत्, चित् और आनन्द रूप परमात्मा पर अटल विश्वास रखना। वही तुम्हारा सच्चा मार्गदर्शन करेंगे। करते रहेंगे।
अनन्त शुभकामनाओं के साथ।
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(लेखक #अपनीडिजिटलडायरी के नियमित पाठक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में रहते हैं। उन्होंने कुछ निजी पारिवारिक कारणों से नाम प्रकाशित न करने का आग्रह किया है।)
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