बिहार चुनाव : मुफ्त की रेवड़ियाँ क्या अब वोट बटोरने का ‘प्रभावी’ साधन बन गई हैं?

अभिलाष खांडेकर, भोपाल मध्य प्रदेश

बिहार में ‘एनडीए’ की प्रचण्ड जीत लगभग पूर्वनिर्धारित नतीजा थी, क्योंकि राज्य ने बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं को प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के लिए सरकारी खजाने की डोर पहले ही ढीली कर दी थी। यह दाँव आखिरी क्षण का एक ‘गेम चेंजर’ साबित हुआ। गेम चेंजर इस मायने में कि खेल का गोल-पोस्ट ही आखिरी समय में बदल दिया गया, जिससे मुकाबला असमान हो गया। वहीं, भारत के चुनाव आयोग ने हमें विश्वास दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि 75 लाख से ज्यादा महिलाओं को 10,000 रुपए देना एक ‘नीतिगत निर्णय’ था। जबकि यह चुनाव की घोषणा के बाद शुरू हुआ और कभी भयावह लगती रही ‘आदर्श आचार संहिता’ लागू होने के बाद तक चलता रहा। ऐसे में, आज शेषन साहब (देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त) की याद आना स्वाभाविक है।

खैर, कुछ साल पहले तक ऐसी ही ‘मुफ्त की मिठाई’ बाँटने पर भाजपा की कड़ी नाराजगी रहती थी, क्योंकि तब इनकी शुरुआत दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने की थी। यद्यपि जेल की सजा के बाद केजरीवाल इन दिनों कभी-कभार ही दिखाई और सुनाई देते हैं। मगर उनकी घोषणाओं को एक वक्त पर किसी और ने नहीं, खुद प्रधानमंत्री मोदी ने ‘रेवड़ी’ कहा था। उनकी आलोचना जायज भी थी।

लोगों द्वारा मुफ्त की कही जाने वाली ‘रेवड़ियों’ और सरकारों द्वारा दी जाने वाली सहायता (सब्सिडी) ने नेताओं को कुशासन के दुष्परिणामों से सुरक्षित कर दिया है। कभी आंध्र प्रदेश/तेलंगाना द्वारा गरीबों को सस्ता वाला चावल देने से शुरू हुआ यह वोट-लुभाने का धारदार हथियार अब लोगों की कल्पना से परे चला गया है। नीति निर्माता और नौकरशाह आधिकारिक योजनाओं के लिए नए, आकर्षक नाम सुझाते रहते हैं, जो खूबसूरती से मुफ्त चीजों को लपेटते हैं और उपहारों की एक विस्तृत श्रृंखला को तैयार करते हैं, खासकर, महिलाओं के लिए।

जैसे- असम में जन्मी ‘लाड़ली बहना’ ने तेजी से मध्य प्रदेश की यात्रा की और शिवराज सिंह चौहान को हीरो बना दिया। हालाँकि फिर से शिवराज मुख्यमंत्री नहीं बन सके, लेकिन इस योजना ने फिर एक और जीत हासिल करने के लिए महाराष्ट्र का रुख किया। इसके बाद से यह सिलसिला जारी है। ऐसी वोट-बटोरने वाली योजनाओं की ‘चुनावी सफलता’ को देखते हुए ही शायद अब इनको प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) का नाम दिया गया है। खाद्य वितरण तो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 के अंतर्गत आता है, तो कोई शिकायत करे कैसे?

नीतिगत थिंक टैंक, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने राज्यों के वित्त पर अपनी 2025 की हालिया रिपोर्ट में दिखाया है कि अनेक राज्य अपने धन का इस्तेमाल मतदाताओं को मुफ्त सुविधाएँ देने पर कर रहे हैं। इससे वास्तविक और व्यापक विकास योजनाओं के लिए बहुत कम राशि बचती है। धन की कमी के कारण आम नागरिकों के लिए विद्यालय, अच्छी सड़क और पुल तथा अस्पताल जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण पर पूँजीगत व्यय को कम प्राथमिकता मिल रही है। ‘पीआरएस’ के अनुसार, महाराष्ट्र और पंजाब इस मामले में सबसे आगे हैं। मध्य प्रदेश पहले से ही विभिन्न ‘रेवड़ियों’ के लिए जाना जाता है। ‘लाड़ली बहना’ पर मासिक खर्च बहुत ज्यादा है, जो राज्यों के खजाने पर अभूतपूर्व दबाव डाल रहा है, लेकिन राजनेता खुश हैं क्योंकि उन्हें अब और मेहनत नहीं करनी पड़ती। बस, ‘पैसा बाँटो, वोट कमाओ’। 

पीआरएस के निष्कर्षों के अनुसार, भारत में कई राज्य असीमित ऋण ले रहे हैं और उसके एवज में भारी मात्रा में ब्याज चुका रहे हैं। इसने सब्सिडी को युक्तिसंगत बनाने की सिफारिश की है। गैरउत्पादक और मुफ्त सब्सिडी योजनाएँ उत्पादक पूँजीगत व्यय के लिए कोई राजकोषीय गुंजाइश छोड़ ही नहीं रही हैं। पर नेताओं इससे क्या फर्क पड़ता है? उन्हें तो सिर्फ वोटों से मतलब है! पीआरएस ने बताया कि राज्यों का बकाया ऋण स्तर सकल घरेलू उत्पाद का 28.5% आँका गया है, जो एफआरबीएम (राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबन्धन) के 20% के लक्ष्य से अधिक है। 

जाहिर है, सत्ताधारी दल राज्य के कामकाज को चलाने के लिए विवेकपूर्ण वित्तीय उपायों के बजाय तिकड़मों पर निर्भर हैं। झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों या किसानों को मुफ्त बिजली, चुनाव से पहले महिलाओं को सीधे नकद हस्तांतरण, खाद्य सब्सिडी, बस यात्रा, साइकिल, स्कूटी वगैरह राज्यों के वित्त पर अंतहीन बोझ डाल रहे हैं। ये कदम भेदभावपूर्ण भी हैं। इस नए ‘कल्याणकारी राज्य’ में मजदूरों और नौकरीपेशा लोगों का एक समूह भारी कर चुकाता है। लेकिन उसे बहुत कम फायदा मिलता है। वहीं, जो लोग जनसंख्या और अनुत्पादक कार्यों में लगातार वृद्धि कर रहे हैं, वे सरकारों के प्रिय हैं। हालाँकि, लाभार्थियों और गैर-लाभार्थियों, सबके पास एक-एक वोट ही होता है।

विद्वान राजनेता और पूर्व राजनयिक व सांसद पवन वर्मा ने आरोप लगाया है कि मोदी सरकार ने बिहार के मतदाताओं को बाँटने के लिए विश्व बैंक के 14,000 करोड़ रुपयों का दुरुपयोग किया है। वर्मा, प्रशांत किशोर की नवगठित जन-सुराज पार्टी के मुख्य रणनीतिकार हैं। अगर उनका आरोप सच है तो यह बेहद निन्दनीय है। इसका सीधा मतलब यह भी है कि असीमित धन और कमजोर चुनाव आयोग के समर्थन के साथ सरकारें कभी चुनाव हारेंगी ही नहीं।

इस गम्भीर समस्या का समाजशास्त्रीय पहलू यह है कि सारे राजनेता एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जिसे काम करने की बिल्कुल जरूरत नहीं होगी। बल्कि उसका तरह-तरह की सरकारी सहयता पर ही गुजारा हो जाएगा। कुशल श्रमिकों की पहले से ही कमी है, जो अब बढ़ती जा रही है। वहीं अब एक आलसी पीढ़ी भी तैयार की जा रही है। परन्तु इसे रोकना होगा। सही सोच रखने वाले साहसी लोगों और अदालतों को मुफ्तखोरी पर लगाम लगाने के लिए आगे आना होगा। कल काफी देर हो जाएगी। 

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(नोट : अभिलाष जी मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर जैसे देश के शीर्ष अखबारों में सम्पादक रह चुके हैं। उनका यह लेख मेल के जरिए #अपनीडिजिटलडायरी तक पहुँचा है और उनकी सहमति से ही प्रकाशित किया गया है।) 

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