…पर क्या इससे उकताकर जीना छोड़ देंगे?

संदीप नाईक, देवास, मध्य प्रदेश से 25/12/2021

जीने की सम्भावनाओं के बीच हम जीने के बजाय अमर होने की चाह लिए रहते हैं। अपने हर कर्म, विचार को इस कसौटी पर तौलते हैं कि मेरे बाद मेरे साथ यह संलग्न न रहे, या मुझे यश देकर अमर कर दे। इस सबमें जीने का मज़ा भूलते हैं। याद रखना चाहिए कि मरने के बाद तो हम कम से कम हजार वर्ष ज़िन्दा रहेंगे ही। जब तक कि हमारी स्मृतियाँ किसी न किसी में क्षणांश भर के लिए भी बनी हैं। पर आज जो अपने ज़ेहन में सुखद स्मृतियों के बजाय अवसाद, तनाव और कटुता एकत्रित कर रहे हैं, उससे तो जीने का मज़ा ही खत्म हो जाएगा। सब भूलकर बस आनन्द से जी लो, कोई किसी को न सुधार सकता है, न बिगाड़ सकता है। और न ही आप-हम पर किसी का प्रभाव होने वाला है। 

सीखना, कौशल, दक्षता, अधिगम, अनुभव और अर्जित ज्ञान सब थोथा है और मिथ्या का बड़ा जाल। हम वही सीखते-समझते हैं, जो हमारी आवश्यकताओं की क्षणिक पूर्ति कर दे और अचानक सामने खड़ी हुई समस्या से निजात दिलवा दे। बाकी पारंगत और निपुण सबसे बड़े धोखेबाज़ी में रखने वाले शब्द हैं, जिनके लिए हम अपनी जान तक गँवा देते हैं। जब आप धू-धू कर विलोपित हो रहे होते हैं, वहीं खड़े लोग आपको एक झटके में कच्चा खिलाड़ी, अनगढ़ या अपरिपक्व कहकर तिरोहित कर देते हैं।

मैं श्राद्धपक्ष की इस कड़ी धूप में गुलमोहर को देखता हूँ, जो अब भी हरा बना हुआ है। सम्भवतः उसे याद भी नहीं होगा कि अभी लाल फूलों से वह गुलज़ार था, जो एक-एक कर बिखर गए। मेरी स्मृतियों में उन फूलों की छटा हमेशा रहेगी पर गुलमोहर को याद न होगा। वाटर लिली के फूलों को पूरी बरसात निहारा और सँजोया है और अब अगली बारिश तक इन्हें जतन से सम्हालकर रखना है पर उस पौधे को यह सब याद नहीं हो शायद। और अगर सूख भी गया खाद पानी के अभाव में, तो क्या उसके ज़ेहन में उन कुम्हला गए फूलों का दंश होगा? नहीं पता, पर आज वो अपनी नई हरी कोंपलों के साथ लहलहा रहा है। 

उन पक्षियों से पूछा दर्जनों बार कि क्या उन्हें वो पेड़, वो खेत, वो जंगल या वो आसमान याद हैं, जहाँ से वे उभरे थे? दाना चुगकर लाए थे और अपने पंखों को ऊँची उड़ान देने के लिए किसी धरती के कोने से आगाज़ किया था? शायद नहीं पर वे आज उन्मुक्त हैं और हर बार लहूलुहान होकर भी उड़ान भर रहे हैं बगैर बन्धन के। कोई सीमा बन्ध नहीं, कोई पूर्वाग्रह नहीं।

सब कुछ स्वीकार्य है। शर्तें, स्थितियाँ, माहौल और असंख्य बातें जो आपके सामने और पीठ पीछे कहीं जाएँ। पर क्या इससे उकताकर जीना छोड़ देंगे? नहीं, क़तई नहीं। 

मरने के बाद हम जिएँगे असंख्य निर्वैयक्तिक स्मृतियों में। बशर्ते, आज हमने अपने आज और अभी को जी लिया हो। मैं डरता नहीं मरने से वरन् हर क्षण मौत का दिलेरी से आव्हान करता हूँ कि आए और गले लगा ले। उद्देश्य खत्म हो गए हैं जीने के, निर्लिप्त हूँ, निस्पृह हो गया हूँ और संसार को लेकर विशुद्ध तटस्थ। अब किसी बात का फर्क नहीं पड़ता मुझे। 

बस, जीने का अभ्यास शुरू कर दिया है। यह जानते हुए कि मौत दबे पाँव अब दबोच लेगी, मैं मौत को साक्षात अपने भीतर महसूसता हूँ। 

बहुधा उजाले अँधेरों से खतरनाक होते हैं। 

(संदीप जी स्वतंत्र लेखक हैं। यह लेख उनकी ‘एकांत की अकुलाहट’ श्रृंखला की 41वीं कड़ी है। #अपनीडिजिटलडायरी की टीम को प्रोत्साहन देने के लिए उन्होंने इस श्रृंखला के सभी लेख अपनी स्वेच्छा से, सहर्ष उपलब्ध कराए हैं। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इस मायने में उनके निजी अनुभवों/विचारों की यह पठनीय श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी की टीम के लिए पहली कमाई की तरह है। अपने पाठकों और सहभागियों को लगातार स्वस्थ, रोचक, प्रेरक, सरोकार से भरी पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने का लक्ष्य लेकर सतत् प्रयास कर रही ‘डायरी’ टीम इसके लिए संदीप जी की आभारी है।) 
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इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ  ये रहीं : 
40. अपनी लड़ाई की हार जीत हमें ही स्वर्ण अक्षरों में लिखनी है
39. हम सब बेहद तकलीफ में है ज़रूर, पर रास्ते खुल रहे हैं
38 जीवन इसी का नाम है, ख़तरों और सुरक्षित घेरे के बीच से निकलकर पार हो जाना
37. जीवन में हमें ग़लत साबित करने वाले बहुत मिलेंगे, पर हम हमेशा ग़लत नहीं होते
36 : ऊँचाईयाँ नीचे देखने से मना करती हैं
35.: स्मृतियों के जंगल मे यादें कभी नहीं मरतीं
34 : विचित्र हैं हम.. जाना भीतर है और चलते बाहर हैं, दबे पाँव
33 : किसी के भी अतीत में जाएँगे तो कीचड़ के सिवा कुछ नहीं मिलेगा
32 : आधा-अधूरा रह जाना एक सच्चाई है, वह भी दर्शनीय हो सकती है
31 : लगातार भारहीन होते जाना ही जीवन है
30 : महामारी सिर्फ वह नहीं जो दिखाई दे रही है!
29 : देखना सहज है, उसे भीतर उतार पाना विलक्षण, जिसने यह साध लिया वह…
28 : पहचान खोना अभेद्य किले को जीतने सा है!
27 :  पूर्णता ही ख़ोख़लेपन का सर्वोच्च और अनन्तिम सत्य है!
26 : अधूरापन जीवन है और पूर्णता एक कल्पना!
25 : हम जितने वाचाल, बहिर्मुखी होते हैं, अन्दर से उतने एकाकी, दुखी भी
24 : अपने पिंजरे हमें ख़ुद ही तोड़ने होंगे
23 : बड़ा दिल होने से जीवन लम्बा हो जाएगा, यह निश्चित नहीं है
22 : जो जीवन को जितनी जल्दी समझ जाएगा, मर जाएगा 
21 : लम्बी दूरी तय करनी हो तो सिर पर कम वज़न रखकर चलो 
20 : हम सब कहीं न कही ग़लत हैं 
19 : प्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें! 
18 : जो सहज और सरल है वही यह जंग भी जीत पाएगा 
17 : विस्मृति बड़ी नेमत है और एक दिन मैं भी भुला ही दिया जाऊँगा! 
16 : बता नीलकंठ, इस गरल विष का रहस्य क्या है? 
15 : दूर कहीं पदचाप सुनाई देते हैं…‘वा घर सबसे न्यारा’ .. 
14 : बाबू , तुम्हारा खून बहुत अलग है, इंसानों का खून नहीं है… 
13 : रास्ते की धूप में ख़ुद ही चलना पड़ता है, निर्जन पथ पर अकेले ही निकलना होगा 
12 : बीती जा रही है सबकी उमर पर हम मानने को तैयार ही नहीं हैं 
11 : लगता है, हम सब एक टाइटैनिक में इस समय सवार हैं और जहाज डूब रहा है 
10 : लगता है, अपना खाने-पीने का कोटा खत्म हो गया है! 
9 : मैं थककर मौत का इन्तज़ार नहीं करना चाहता… 
8 : गुरुदेव कहते हैं, ‘एकला चलो रे’ और मैं एकला चलता रहा, चलता रहा… 
7 : स्मृतियों के धागे से वक़्त को पकड़ता हूँ, ताकि पिंजर से आत्मा के निकलने का नाद गूँजे 
6. आज मैं मुआफ़ी माँगने पलटकर पीछे आया हूँ, मुझे मुआफ़ कर दो  
5. ‘मत कर तू अभिमान’ सिर्फ गाने से या कहने से नहीं चलेगा! 
4. रातभर नदी के बहते पानी में पाँव डालकर बैठे रहना…फिर याद आता उसे अपना कमरा 
3. काश, चाँद की आभा भी नीली होती, सितारे भी और अंधेरा भी नीला हो जाता! 
2. जब कोई विमान अपने ताकतवर पंखों से चीरता हुआ इसके भीतर पहुँच जाता है तो… 
1. किसी ने पूछा कि पेड़ का रंग कैसा हो, तो मैंने बहुत सोचकर देर से जवाब दिया- नीला!

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