चाल-कुचालों के बीच क्या जातियों-समाजों का आपसी अनुबंध सनातन को बचा सकता है?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों को लेकर सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री मोदी की सरकार जो तीखी आलोचना हुई, वैसी कभी देखने-सुनने को नहीं मिली है। यह स्वाभाविक भी है। यूजीसी के नए नियम विविधता समानता और समावेशन का ही भारतीय संस्करण है। जहााँ अमेरिका और यूराेप इससे तेजी से बाहर आ रहे हैं, भारत में इससे लाभ उठाने वालों की एक लम्बी जमात खड़ी हो गई है।  अब इस कतार में ‘हिन्दुत्ववादी सरकार’ भी दिख रही है जो अब तक हिन्दू मतों के एकीकरण में ही अपना लाभ देखती थी।

इससे एक बड़े वर्ग का मोहभंग हुआ है। यह वर्ग सोच रहा है, कि अन्य पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति-जनजाति के साथ मिलाकर उन्हें ‘अल्पसंख्यक सवर्ण समाज’ से भिड़ाने की ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी थी? इस कदम का लाभ भी दूर-दूर तक कहीं दिखता नहीं। हाँ, हिन्दू एकता को तोड़ने वाले जहरीले बीज सर्वत्र बिखरे दिखते हैं। सर्वोच्च अदालत ने इसके अमल पर स्थगन आदेश दिया। सरकार से तीखे सवाल किए। लेकिन जी-हजूरी करने वालों ने  ने इसका श्रेय भी मोदी सरकार को देकर रही-सही छीछालेदर की कमी भी पूरी कर दी। इस सब से सनातनियों के विश्वास को गहरे तक आघात पहुँचा है। विशेष कर वे जो कि संविधान और गणराज्य की न्यायशीलता में भावनात्मक और अव्यवहारिक विश्वास करते चल आए हैं। वे सब आज किंकर्तव्यविमूढ़ है। किन्तु मेरा विनम्र और प्रामाणिक मत है कि लिए यह मौका मोदी सरकार के प्रति हृदय से कृतज्ञ होने का है। और प्रस्तुत विश्लेषण की सफलता यही मानूँगा कि इसे पढ़ने के बाद सनातनी आंशिक रूप से ही सही मेरे द्वारा दिए गए कारणों पर आत्मचिन्तन-मनन करेंगे।

यूजीसी के नए नियमों ने हमारे धार्मिक समाज और सभ्यता के हितों की रक्षा के अंधविश्वास को यदि जबरदस्त धक्का दिया है, तो संवैधानिक लोकतंत्र में न्यायबोध की कमजोर नब्ज भी सामने ला दी। हम इतिहास को मूल स्रोतों से न पढ़ने वाले और आयातित विचारों पर अपना करियर बनाने वाले भारतीयों की सातवीं-आठवीं पीढ़ी हैं। हम यदि औपनिवेशिक संविधान, गणतंत्र की तमाम प्रतिबद्धताओं को नजरअंदाज कर उसी के ताने बाने में अपने हितों के संवर्धन की अपेक्षा करते हैं, तो यकीनन हम मूढ़विश्वासी हैं।

यदि आज माेदी सरकार द्वारा यूजीसी के नए नियमों में प्रस्तावित सुधार अतार्किक होते हुए भी अन्य पिछड़े वर्गों को अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के अधिकार दे देते हैं, तो हमें पृष्ठभूमि भी ध्यान रखनी होगी। यह कि सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के लिए जो न्यायसंगत मार्ग बताया उसे एक ‘हिंसक भारत बंद’ के आगे समर्पण करते हुए मोदी सरकार ने विपक्ष के साथ मिलकर सर्वसम्मतिपूर्वक ही ढहा दिया था। इसके पीछे की सरकारों के बारें में जितना लिखे वह कम है। यानि मतलब साफ है कि संवैधानिक लोकतंत्र में संकीर्ण, नस्लवादी और एकांतिकतावादी कौमें अपने हितों को जितना सुरक्षित रख सकती है उतनी विविधतावादी, उदार धार्मिक सभ्यता नहीं। हमने लोकतंत्र के इतिहास में ग्रीस और भारत के लिच्छवी, आदि जनपदों के बारे में कसीदे पढ़े हैं। लेकिन हमने अपने इतिहास के इस सच को कभी गंभीरता से नहीं समझा कि ये प्राचीन भारतीय गणतंत्र एक संकीर्ण क्षेत्र, एक जाति-गोत्र वाले परिवेश में कुछ समय के लिए उपजे बुलबुले भर थे। राष्ट्र में सार्वदेशिक और सार्वभौमिक हितों वाला शासन तो धर्मतंत्र आधारित व्यवस्था ही दे सकी। तो संविधान और लोकतंत्रीय व्यवस्था में सत्ता और राजनीति के चरित्र को लेकर जो संदेह था वह अंतत: सही साबित हुआ है।

इससे अगर धक्का लगा, तो ठीक है। लेकिन अगर यह मोहभंग है, तो यह फिर यही साबित करता है कि हम सच्चाई से रूबरू होना ही नहीं चाहते। हम बिना यह समझे कि वोट और जीत का व्यूह राजनीतिक दलों को दीर्घकालीन धार्मिक हितों के अनुरूप काम नहीं करने देता, राजनीतिक दलों से अपेक्षा करते हैं कि वो सभ्यता और संस्कृति के स्तर के गहन सवालों का हल निकाले। समस्या यह है कि आम सनातनी का संघर्ष दीर्घकालीन, नीति मूल्यों के स्तर का है और राजनीतिक दलों की लड़ाई तो अगले नगर-निगम, विधानसभा और संसद में चुनाव जीतकर अस्तित्व रक्षा की है। एक तो वे खुद औपनिवेशिक और तमाम वैश्विक प्रभावों की जद में हैं और दूसरे उनके पास इतने दूर के सोच सुविधा ही नहीं है। इसलिए मोदी, भाजपा या संघ से सवाल करना वाजिब हक है, किन्तु उनसे मोहभंग की स्थिति प्रमाद है।

किसी भी अन्य संकीर्ण मजहबी व्यक्ति की तुलना में आम सनातनी अपने और राष्ट्र के दीर्घकालीन हितों के प्रति उदासीन है। ऐसे बड़े प्रश्नाें के बरक्स वह अकर्मण्यवादी और पलायनवादी ही साबित होता है। अपने पलायन को अमली जामा पहनाने के लिए उसने भोगविलास, ऐशोआराम सिनेमा, साहित्य, कला-संगीत, सोशल मीडिया, रील्स से लेकर आध्यात्म को साधन बना लिया है। उसके सामने जो संस्कृति और सभ्यता के स्तर पर बड़ी चुनौतियाँ हैं, उसे वह देखना ही नहीं चाहता। वह तो एक हिन्दुत्ववादी दल को वोट देकर अपनी जिम्मेदारी से फारिग हो जाना चाहता है। हम समझना ही नहीं चाहते कि गणतंत्र की सत्ता कैसे काम करती है और उसे ठीक करने के लिए कैसे प्रयासों की आवश्यकता है?

गाली-गलौच और अपने मतदान को महादान कह कर अपनी धार्मिक-राजनीतिक सजगता से मुँह मोड़ने से कुछ होना जाना नहीं। हमें इस सरकार का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने इस सुहावने भ्रम को तोड़कर यथार्थ के धरातल पर ला खड़ा किया। मोदी सरकार ने हमें सीख दी है कि धर्म के स्तर पर हम किसी राजनीतिक दल पर भी भरोसा नहीं कर सकते। धर्म का चिंतन और आचरण हमारी निजता है। यानि व्यक्तिगत स्तर पर धर्म के प्रति अहंता और कार्पण्यता पोषक सुविधावादी सरल-सहज बातें स्वीकार करने की आदत की जगह मूलभूत दर्शन, सच्चे त्याग और पारस्परिक कर्तव्य आधारित सामाजिकता की ओर जाना होगा।

हिन्दू समाज की जातियों को अपने धर्म, पहचान और हितों की रक्षा के लिए एक आपसी धार्मिक सामाजिक अनुबंध बनाने की आवश्यकता है। जाति-समाजों में अपने हितों के लिए राजनीतिक दलों के दरबार में जी-हजूरी करने की जगह आपस में ऐसा दूसरे जाति-समाज के स्तर पर बातचीत कर उस अनुबंध के मुताबिक वोट गिरवाने की व्यवस्था करने का समय है। ऐसे सामाजिक अनुबंध के लिए धर्म, नीति और शास्त्र में पर्याप्त अनुभव उपलब्ध है।

यदि इस आधार पर सनातनी समाज का आपसी सहकार ओर सहयोग बढ़ता है तो यही राजनीति हमारे दीर्घकालीन हितों के अनुरूप चलने को बाध्य हो जाएगी। यूजीसी नियमावली प्रकरण में अन्य पिछड़े वर्ग के लोगाें को ही आगे बढ़कर इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और सवर्ण समाज के साथ आगे बढ़ना चाहिए। हमें झूठे या काल्पनिक उत्पीड़न के कथानक को अस्वीकार करना होगा। यदि ऐसा नहीं हो पाता तो फिर अन्य पिछडे़ वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजाति में और हर प्रभावशाली और कमजोर जातियों में आपसी संघर्ष फैल जाएगा। इसका वास्तविक फायदा दूसरे बाहर वालों को होगा। ऐसे में यदि काेई जाति-समाजों को जोड़ने वाला सामाजिक अनुबंध के लिए आंदोलन खड़ा होता है तो यह धर्म के लिए नई शुरुआत हो सकती है। 

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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।) 

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समीर के पिछले 10 लेख 

23 – क्या हम आज जो ‘धर्माचरण’ कर रहे हैं, उससे अधर्म की अभिवृद्धि हो रही है?
22 -क्या नव-हिन्दुत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए अस्तित्त्व की चुनौती है? 
21 – धुरंधर : तमाम अस्वीकरण के बावजूद साफगोई से अपनी बात कहने वाली फिल्म!
20 – वैश्विक अर्थव्यवस्था के दुष्चक्र में फँसा भारत इससे बाहर कैसे निकल सकता है?
19- भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई सेवानिवृत्त हो रहे हैं, मगर सवाल छोड़ जा रहे हैं
18 – क्या डोनाल्ड ट्रम्प एक ‘विदूषक’ और अमेरिकी सत्ता ‘प्रहसन’ बन गई है?
17- भारत पर अमेरिका का 50 फीसद सीमा शुल्क भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद कैसे? 
16- विवाह के योग्य न रह जाना भारतीय समाज में आज आम प्रचलित बात कैसे हो गई? 
15- खुद के मूल्यों पर खड़ा होना ही भारत के लिए चुनौती और अवसर भी!
14- समझने की बात है कि अमेरिकी-चीनी मानदंडों वाला विकास भारत में नहीं चल सकता! 
(दूसरा भाग)

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