आज हम सभी चीजों, बातों और विचारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसना चाहते हैं। तब मन में प्रश्न आता है, क्या प्राचीन काल में चीजों…
View More ‘संस्कृत की संस्कृति’ : “अनर्थका: हि मंत्रा:” यानि मंत्र अनर्थक हैं, ये किसने कहा और क्यों?Category: चुनिन्दा पन्ने
होली जैसे त्यौहारों की धरोहर उसके मौलिक रूप में अगली पीढ़ी को सौंपें तो बेहतर!
पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक होते हैं। ये समाज की विविध मान्यताओं वा परम्पराओं को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। इसी क्रम में हम बचपन से होली…
View More होली जैसे त्यौहारों की धरोहर उसके मौलिक रूप में अगली पीढ़ी को सौंपें तो बेहतर!जल संकट का हल छठवीं कक्षा की किताब में, कम से कम उसे ही पढ़ लें!
ड्रोन दीदी : भारत में ‘ड्रोन क्रान्ति’ की अगली असली वाहक!
मुझे लगता है, हिन्दी में इसको उल्टा यानि कि नीचे अंग्रेजी के मूल लेख में दिए गए आख़िरी वाक्य से पढ़ना शुरू करना चाहिए। इस…
View More ड्रोन दीदी : भारत में ‘ड्रोन क्रान्ति’ की अगली असली वाहक!‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह कुछ और सोच पाता कि उसका भेजा उड़ गया
“अब तो ये दो हो गई हैं। सुना है कि वह बागी लड़की भी यहीं कहीं हैं।” “हमें उन दोनों को पकड़ना ही होगा। भले…
View More ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह कुछ और सोच पाता कि उसका भेजा उड़ गया‘एक्स-मुस्लिम्स’ : स्याह गुमनामी में क्या ये नई रोशनी है?
साइबर दुनिया ने गुमनाम और अज्ञात रह सकने की सहूलियत दी है। इस सहूलियत ने कुछ मजहबों में निजी स्वतंत्रता के नए आयाम खोल दिए…
View More ‘एक्स-मुस्लिम्स’ : स्याह गुमनामी में क्या ये नई रोशनी है?धूम्रपान निषेध दिवस : अपने लिए खुशी या अपनों के लिए आँसू, फ़ैसला हमारा!
‘धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’, ये वाक्य हमें हर गली-चौराहे और नशीली चीज़ों पर अक्सर लिखा हुआ दिखता है। हम सब जानते हैं, मानते…
View More धूम्रपान निषेध दिवस : अपने लिए खुशी या अपनों के लिए आँसू, फ़ैसला हमारा!मायावी अम्बा और शैतान : वे तो मारने ही आए थे, बात करने नहीं
गोलियों और संगीनों के साथ जब वे पहली बार उनके पीछे लगे, तभी से वह लोग भाग रहे थे। रुके नहीं थे। हालाँकि गोलियाँ उनकी…
View More मायावी अम्बा और शैतान : वे तो मारने ही आए थे, बात करने नहींअंग्रेजी से हमारा मोह : हम अब भी ग़ुलाम मानसिकता से बाहर नहीं आए हैं!
मैं जब ‘याहू’ में काम करता था, तो दक्षिण कोरिया में चार सदस्यों की मेरी टीम थी। उन चार सदस्यों में से‘ सिर्फ एक को…
View More अंग्रेजी से हमारा मोह : हम अब भी ग़ुलाम मानसिकता से बाहर नहीं आए हैं!महिला दिवस जैसे मौकों पर होने वाले स्त्री-विमर्श में भाषा को नपुंसक क्यों करना?
आजकल भाषा में स्त्री- विमर्श जोर पकड़ रहा है। ऐसा नहीं कि यह कोई नया विषय है। भाषा में लैंगिक भेद सम्भवत: प्रायोजित नहीं अपितु…
View More महिला दिवस जैसे मौकों पर होने वाले स्त्री-विमर्श में भाषा को नपुंसक क्यों करना?