अहमदाबाद में 10वीं कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची ने हाल ही में स्कूल की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या की है।
पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश
अहमदाबाद में महज 15 साल की एक बच्ची ने स्कूल की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। वह 10वीं कक्षा में पढ़ती थी। ऐसी घटनाएँ अब अक्सर सुनने में आने लगी हैं। कभी कोटा के कोचिंग संस्थानों से किसी छात्र या छात्रा की आत्महत्या की खबर आती है। तो कभी देश के शीर्ष प्रतिष्ठित आईआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) जैसे संस्थानों में कोई छात्र-छात्रा अपनी जान दे बैठता है। ज्यादा पुरानी बात क्यों करें? इसी साल जनवरी से अब तक के आँकड़े ले लेते हैं। कोटा में 2025 में अब तक सात विद्यार्थी अपनी जान दे चुके हैं। जबकि 2024 में 17 विद्यार्थियों ने वहाँ आत्महत्या की थी। आईआईटी परिसरों में भी इस साल अब तक विद्यार्थियों की आत्महत्याओं के तीन मामले प्रकाश में आ चुके हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, आईआईटी परिसरों में विद्यार्थियों की आत्महत्याओं के मामलों में 150 प्रतिशत की बढ़त हुई है, बीते 10 सालों में। आखिर क्या कारण है, जो समस्या इतनी गम्भीर हो रही है?
इसमें मेरा मानना है कि बच्चों के लिए सम्भावनाएँ और संवेदनाएँ, दोनों दम तोड़ रही हैं। शिक्षा में संवाद, मानसिक परामर्श और मानवीयता की जगह खाली हाे रही है। शिक्षा संस्थान अब केवल डिग्रियों की फैक्ट्री बनते जा रहे हैं। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो छात्र-छात्राओं की आत्महत्यों के आँकड़े लगातार भयावह नहीं होते जाते। ये आँकड़े हमें बताते हैं कि समस्या गहरी है और इसका समाधान केवल ‘शोक प्रकट करने’ या ‘नियम बनाने’ से नहीं होगा। समितियाँ गठित करने और उनके द्वारा सिफारिशें जारी करने से भी कुछ नहीं होगा।
सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम बनाया। इसमें बच्चों के भले के लिए तमाम प्रावधान किए। बताया गया कि इस अधिनियम का उद्देश्य समाज में समानता और समावेशिता को बढ़ावा देना है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी है कि हर बच्चा बिना भेदभाव के, दबावमुक्त वातावरण में शिक्षा प्राप्त करे। लेकिन सही मायने में इस कानून के उद्देश्य पूरे हो रहे हैं क्या? विचारणीय प्रश्न है। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में आत्मविश्वास भरना, उन्हें जीवन की समझ देना, हर प्रकार से उन्हें सक्षम बनाना, और हर परिस्थिति में सन्तुलन बनाए रखने के लिए उनको तैयार करने का होना चाहिए। मगर ऐसा भी हो पा रहा है क्या? निश्चित रूप से नहीं हो रहा। वरना हम ये बाते ही क्यों करते?
असल में दिक्कत यह है कि शिक्षा से और शिक्षा में लोककल्याण का वादा अब केवल कागजों पर बचा है। इसकी जगह बेरहम व्यावसायिकता ने ले ली है। इसीलिए जैसा मैंने पहले ही कहा- बच्चों के लिए सम्भावनाएँ और संवेदनाएँ, दोनों दम तोड़ रही हैं। इस दुर्दशा से बचने का मुझे सिर्फ एक ही रास्ता नजर आता है कि हम शिक्षा को जीवन से जोड़ें। शिक्षा को फिर जीवनमूल्यों पर आधारित बनाएँ। ऐसे जीवनमूल्य, जहाँ विद्यार्थी केवल डिग्री नहीं, उद्देश्य पाए। केवल नौकरी नहीं, पहचान पाए। और केवल पढ़ाई न करे, बल्कि जीने का विश्वास हासिल करे। अगर हम यह कर सके, तब तो ठीक नहीं अन्यथा हर वर्ष भविष्य की हजारों रोशनियाँ यूँ ही बुझती रहेंगी, और हम मोमबत्तियाँ जलाकर अफसोस जताते रहेंगे।
—–
(पवन जैन ‘घुवारा’, मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते रहते हैं। उन्होंने उक्त विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजे हैं।)
—–
पवन जैन के पिछले लेख
1- रोज होने वाली ‘वित्तीय मानसिक हिंसा’ से आम आदमी को कब मुक्ति मिलेगी?
मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More
लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More
देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More
अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More
एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More
खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More