प्रतीकात्मक तस्वीर
अनुज राज पाठक, दिल्ली
पूर्व में हमने देखा कि वर्ण उत्पत्ति की समस्त प्रक्रिया में बुद्धि क्रमश: विकसित होती हुई वाणी के रूप में परिणत होती है। इससे वक्ता और श्रोता देख तो नहीं पाता, बस, शब्दों/ध्वनियों को सुन कर उनके अर्थ को समझ कर अपनी प्रक्रिया देता है। इस तरह से उत्पन्न वर्णों को शिक्षा के आचार्य प्राय: पाँच भागों में बाँटते हैं। अपने बचपन में जिन्हें हमने स्वर, स्थान, प्रयत्न आदि के नाम से पढ़ा था। हम तब पढ़ते समय प्राय: सोचते थे कि यह ‘स्थान‘, ‘आभ्यन्तर प्रयत्न’, ‘बाह्य प्रयत्न’ आदि क्या चीजें हैं? इनका यह भेद किस कारण है? अब जब इन शिक्षा ग्रन्थों को पढ़ा और समझा तो ज्ञात हुआ कि वर्ण के विविध उच्चारण के समय उच्चारण के दौरान मुखविवर के भागों पर वायु के पड़ने वाले दबाव के आधार पर इनका विभाजन हुआ है। वास्तव में इस तरह का विभाजन प्रत्येक वर्ण का होता है।
याद कीजिए भाषा के शिक्षक हमें कैसे ‘स’, ‘श’ और ‘ष’ के अलग अलग स्थान से उच्चारण का अभ्यास कराते थे। और इसे न कर पाने के कारण हम ‘छोटा स’,‘शान्ति वाला श’ और ‘पेट फटा ष’ कहकर बचते थे। वस्तुत: यह स्थान आदि के भेद को प्राचीन आचार्यों ने बहुत सूक्ष्म प्रक्रिया से जाना और समझा तथा अपने ग्रन्थों में उद्धृत किया है। वर्ण उच्चारण के इसी भेद में उदात्त, अनुदात्त, स्वरित ‘स्वर’ नामक भाग भी है। इन्हें मात्रा पढ़ाते समय शिक्षक ‘ह्रस्व’, ‘दीर्घ’ और ‘प्लुत’ नाम से बताने का प्रयास करते थे। जबकि यह स्वर से भिन्न वर्ण उच्चारण में लगने वाले समय (काल) को सूचित करते हैं। उदात्तादि तीन स्वरों से ही गायन के सात स्वरों की उत्पत्ति होती है, ऐसा कहते हैं। वैसे, गायन से एक बात याद आई कि हमारे आस-पास कुछ व्यक्ति बड़े अच्छे से शब्दों, वाक्यों को पढ़ लेते हैं। कुछ नहीं पढ़ पाते। आचार्यों ने इस किस्म के अच्छे पढ़ने वाले को ‘अच्छा पाठक’ और खराब पढ़ने वाले को ‘अधम (खराब) पाठक’ कहा है।
अच्छे पढ़ने वाले की कुशलता कैसी हो इसका एक सुन्दर उदाहरण भी है। यह कि जैसे शेरनी अपने बच्चे को दाँतों से उठाते समय उतना ही दबाव बनाती है कि बच्चे पर पकड़ न कमजोर हो और उसे दाँत भी न लगें। इसी तरह, एक उच्चारणकर्ता को वर्णोच्चारण उतनी ही कुशलता से करना चाहिए कि वर्णोच्चारण एकदम शुद्ध हो। आचार्य शब्द को ब्रह्म मानते हैं, इसलिए शुद्ध उच्चारण उच्चारणकर्ता को पुण्य प्रदान करने वाला होता है, ऐसा कहते हैं। वैसे भी अच्छा ही बोलना चाहिए, सभी प्राणी खुश हो जाते हैं। फिर अच्छा बोलने में दारिद्रय कैसा?
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(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)
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इस श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
5- संस्कृत की संस्कृति : वर्ण यानी अक्षर आखिर पैदा कैसे होते हैं, कभी सोचा है? ज़वाब पढ़िए!
4- दूषित वाणी वक्ता का विनाश कर देती है….., समझिए कैसे!
3- ‘शिक्षा’ वेदांग की नाक होती है, और नाक न हो तो?
2- संस्कृत एक तकनीक है, एक पद्धति है, एक प्रक्रिया है…!
1. श्रावणी पूर्णिमा को ही ‘विश्व संस्कृत दिवस’ क्यों?
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