सांकेतिक तस्वीर
दीपक गौतम, सतना मध्ध प्रदेश
घर में जब अकेले रह जाते हैं त्यौहारों पर बुजुर्ग।
तब दादा-दादी की आँखों में उजियारा नहीं होता।
बूढ़ी आँखें तरस जाती हैं-अपनों का साथ पाने को।
जब सालभर में भी दीवाली पर बच्चे घर नहीं आते।
कोई छोटा बच्चा जब घर पर दीये नहीं जलाता।
ऐसे घरों को लाख दीये भी रोशन नहीं कर पाते।
फिर सिमट जाती हैं खुशियाँ फोन की घण्टी पर।
वो भी मुआं बस उधार-सी ही मुस्कान लाता है।
जब सालभर में भी दीवाली पर बच्चे घर नहीं आते।
फिर नहीं जल पाती है दीवाली पर चकली।
न ही छुरछुरी की जगमगाहट वहाँ दिखती।
पटाखों की आवाज को तरस जाते हैं उनके कान।
किसी भी तरह की मिठाई उन्हें मीठी नहीं लगती।
जब सालभर में भी दीवाली पर बच्चे घर नहीं आते।
नहीं बनाए जाते घर पर किसी तरह के पकवान।
अकेले खाने में पूरे नहीं होते माँ-बाप के अरमान।
फिर भी जब बजती है फोन की घण्टी।
माँ-बाप कहते हैं-बेटा मिठाई खा लेना अच्छी-अच्छी।
बच्चों को कहाँ समझ आती हैं ये बातें सच्ची-सच्ची।
अकेलेपन और ऊब से सजती है फिर दिवाली।
जब सालभर में भी दीवाली पर बच्चे घर नहीं आते।
माँ-बाप एक नजर में भाँप लेते हैं
बच्चों की हर मायूसी।
लेकिन बच्चे वीडियो कॉल पर भी नहीं देख पाते
हैं माँ-बाप की उदासी।
ऐसे अक्सर फीका रह जाता है त्यौहार।
जब सालभर में भी बच्चे दिवाली पर घर नहीं आते।
इस तरह की दीवालियों में रौनक नहीं होती।
क्योंकि पसरा रहता है-एक अलग तरह का सन्नाटा।
जो गहरे तक उतर जाता है-सूने मन के अंदर।
कलेजे में उठती है-एक टीस कि बच्चे घर नहीं आए।
वो बस मन मसोस कर रह गए बिना त्यौहार मनाए।
जब सालभर में भी दीवाली पर बच्चे घर नहीं आए।
दो टके की नौकरी में कुचल जाती हैं खुशियाँ।
सूना रह जाता है-घर का हर एक कोना।
अक्सर यूँ ही मनती है उन घरों में दिवाली।
जहाँ सालभर में भी दीवाली पर बच्चे घर नहीं आते।
दादा-दादी नहीं देख पाते पोते-पोतियों की मुस्कान।
घुट कर रह जाते हैं उनके त्यौहार मनाने के अरमान।
नहीं ले जा पाते बच्चों को गाँव के बाजार।
नहीं खरीद पाते बच्चों के साथ खुशियों के अम्बार।
जो ले आते थे उनके घर आने पर झोले में भरकर।
दुनियाभर का उजाला भी नहीं कर पाता
ऐसे वीरान घरों को रोशन।
जब सालभर में भी दीवाली पर बच्चे घर नहीं आते।
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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं से अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। कभी लेख तो कभी कविता की सूरत में। अपने लिखे हुए को #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा भी करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक पहुँचें। ये कविता भी उन्हीं प्रयासों का हिस्सा है।)
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