ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत को 100 साल तक गुलाम बनाकर रखा था।
टीम डायरी
ऐसी सूचना है कि अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर दिवालिया हो गई और उसका कामकाज बंद कर दिया गया है। दिसंबर-31, सन् 1600 में स्थापित हुई इस कम्पनी के इतिहास में दूसरी बार ऐसी स्थिति बनी है। भारत को करीब 100 वर्षों तक गुलाम बनाकर रखने वाली इस कम्पनी का 1873 में पहली बार ‘कफन-दफन’ हुआ था, यानि उसे बंद किया गया था। तब भी उसका कारण भारतीय बने थे। उस समय करीब 17 साल पहले 1857 की जो क्रांति भारत में हुई, उसे ठीक से न सँभाल पाने के कारण ब्रिटिश सरकार ने यह कार्रवाई की थी।
इत्तिफाक देखिए कि अब जबकि 2026 में कम्पनी फिर दिवालिया होकर बंद होने की कगार पर है, तो तब भी किसी न किसी रूप में इसके पीछे भारतीय ही हैं। दरअसल, भारतीय मूल के एक बड़े ब्रिटिश कारोबारी हैं संजीव मेहता। उन्होंने साल 2005 में इस कम्पनी को खरीद लिया था। इससे जुड़े अधिकार, संपत्ति, आदि सब। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2010 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के झण्डे तले नया कारोबार शुरू किया। इसके नाम से चाय, चॉकलेट, एशियाई भोजन, वगैरा बेचना शुरू किया। तब संजीव मेहता ने कहा था, “भारत पर जुल्म ढाने वाली कम्पनी को भारतीयों के लिए खरीदा है। अब यह दुनिया के सामने अत्याचार का नहीं, दया भाव का प्रतीक होगी।”
हालाँकि, ब्रिटिश और अब भारत के मीडिया में भी, आई सूचनाओं के मुताबिक, कम्पनी को दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया में आगे बढ़ा दिया गया है। वैसे, संजीव मेहता ने तुरंत ऐसी सूचनाओं पर स्पष्टीकरण भी दिया है। उनका कहना है, “कम्पनी खत्म नहीं हुई है। वह अब भी जिन्दा है। उसे दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया, वास्तव में, कम्पनी के वित्तीय और राजस्व ढाँचे को पुनर्गठित करने के लिए चलाई जा रही है।”
तो यह हुई सूचना, लेकिन इससे आगे का मसला यूँ है कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी चालू रहे या बंद हो जाए, इससे भारतीयों के जीवन में क्या फर्क आने वाला है? निश्चित रूप से कुछ नहीं। दूसरी बात, मीडिया के लिए अगर यह खबर है, तो वह भी सीधी सी न? तो फिर यह समाचार देते समय ‘सूरज फिर डूब गया’ जैसे विशेषण देने का क्या मतलब है? इसका जवाब जानते हैं क्या है? ‘गुलाम सोच’। कोई माने या न माने, भारत का एक बड़ा तबका आज भी अंग्रेजों की मानसिक गुलामी से आजाद नहीं हुआ है। इसीलिए उसे सैकड़ों साल पुराना जुमला अब तक याद है कि ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी के दौर में दुनिया में सूरज नहीं डूबता था।” इतना था उसका अधिकार क्षेत्र।
और उतनी ही दुखद बात यह कि इस ‘गुलाम सोच’ को भारतीय ज्ञान परम्परा का यह सूत्र पता ही नहीं कि हमारे यहाँ सूरज डूबता नहीं है, ‘अस्त’ होता है। यद्यपि ‘अस्त’ के विभिन्न अर्थों में एक अर्थ डूबना भी बताया जाता है। मगर सूर्यास्त के संदर्भ में ‘अस्त’ का अर्थ है, अदृश्य होना, आँखों से ओझल होना। क्योंकि घूमती हुई पृथ्वी का तय समय अंतराल में सूर्य के सामने वाला ध्रुव (कभी दक्षिणी, कभी उत्तरी) बदल जाता है। इसलिए जिस ध्रुव के सामने सूरज है, वहाँ लोगों को दिखता है, और दूसरे ध्रुव के लोगों की आँखों से ओझल रहता है, बस।
अलबत्ता, ऐसी बातें समझने के लिए आँखें, नजर और चश्मा, सब भारतीय होना चाहिए! है कि नहीं?
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