‘एक्स-मुस्लिम्स’ : स्याह गुमनामी में क्या ये नई रोशनी है?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

साइबर दुनिया ने गुमनाम और अज्ञात रह सकने की सहूलियत दी है। इस सहूलियत ने कुछ मजहबों में निजी स्वतंत्रता के नए आयाम खोल दिए हैं। इस खुलेपन ने स्याह गुमनामी में नई रोशनी की एक झलक दी है। इसके लिए ताज़ा उदाहरण ले सकते हैं, ‘एक्स-मुस्लिम्स’ का। ‘एक्स-मुस्लिम्स’ का मतलब है पूर्व-मुस्लिम। यानी ऐसे मुसलमान, जिन्होंने इस्लाम तो छोड़ दिया है, लेकिन किसी दूसरे धर्म को अपनाया नहीं है। दूसरे शब्दों में इन्हें ‘नास्तिकतावादी’ भी कहा जा सकता है, जो किसी आस्था में यक़ीन नहीं करते। 

आम परिस्थिति में यदि किसी ‘एक्स-मुस्लिम’ की पहचान उजागर हो जाए, तो मुमकिन है कि उसका कोई परिजन ही अपने हाथों से उसका क़त्ल कर दे। इस तरह अपने ईमान का सबूत पेश करने की कोशिश करे। लेकिन साइबर युग में निजी पहचान गुप्त रख सकने के तकनीकी शाहकार ने पूरी स्थिति को उलट दिया है। इसका नतीज़ा ये हुआ है कि अब  यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, अरबी, हिन्दी, बांग्ला, मलयालम, तमिल सहित दुनिया की तमाम भाषाओं में ‘एक्स-मुस्लिम्स’ के सैकड़ों चैनल हैं।

ये लोग मज़हबी दकियानूसी और बर्बरता को चुनौती देते हुए सोच में एक तरह का खुलापन ला रहे हैं। यहाँ देखने-सुनने वाला भी अपनी पहचान गुप्त रख सकता है। परिणामत: गाँवों, शहरों में हजारों युवा, महिलाएँ और बड़े-बूढ़े छिपकर रात-रात भर इन चैनलों को देख-सुन रहे हैं। यक़ीनन यह लोगों के दिलो-दिमाग़ को खोलने का सबसे बड़ा प्रयास साबित हो रहा है। इससे एक ओर विरोधी विचारों को जानने से नया नजरिए विकसित हो रहा है। तो दूसरी ओर अन्य जाइज़ तर्क सुनने से सच्ची तार्किकता के नए पहलुओं से परिचय बढ़ रहा है। 

ऐसे चैनल देखने सुनने वालों की तादाद लाखों में है। ये लोग कमेंट्स सेक्शन में भी अपनी राय देते हैं। इनके बीच रोज घंटों तक खुली बहसें होती हैं। इनमें कोई भी खुलेआम बिना लाग-लपेट या डर के हिस्सा लेता है। यूट्यूब पर तो ‘एक्स मुस्लिम्स’ की नई पौध ही जैसे फल-फूल रही है। हालाँकि विभिन्न दबावों के चलते पारम्परिक मीडिया इस बड़े बदलाव को अनदेखा कर रहा है। मगर उससे इतर पारम्परिक और तंगख्याल समाजों में सच कहने-सुनने की यह स्वतंत्रता बेहद असरदार साबित हो रही है। तीक्ष्ण तर्कों और प्रामाणिकता के साथ नए मानस को जन्म दे रही है।

अलबत्ता कई विरोधी बीच-बीच में इन ‘एक्स-मुस्लिम्स’ का नाम, पता, चेहरा, आदि उजागर करने की कोशिश भी करते रहते हैं। मसलन-  इन्हीं में से एक मशहूर यूट्यूब चैनल था, ‘सचवाला’। उसे प्रतिबन्धित करा दिया। उनकी पहचान उजागर कर दी गई। इसके बाद उन लोगों को यूरोप में कहीं जाकर छिपना पड़ा। मगर उन्होंने वहीं से नए प्रयास शुरू कर दिया और अब ‘कुरानवाला’ के नाम से नया चैनल चलाने लगे हैं। बताते हैं कि उन्हें तकनीकी मदद भी मिली है। इससे वे अपनी जानकारियाँ छिपाए रखने में इस बार अब तक सफल हैं। 

इस एक मिसाल से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ऐसे तमाम लोग कितने इंक़लाबी क़िस्म के हैं। उनके चैनलों पर कोई भी उनकी तक़रीरें सुन सकता है। यक़ीन मानिए, एक बार सुन लेने के बाद सच के प्रति उनकी ललक, तार्किक निष्पक्षता और नैसर्गिक नैतिकता से प्रभावित हुए बिना कोई नहीं रह सकेगा। इनमें से किसी के पास ग़ज़ब का सब्र है। तो किसी के पास हाज़िरज़वाबी है। और कोई हास्य-विनोद की उम्दा समझ रखता है।

ये लोग जो सामग्री पेश करते हैं उसमें इल्म के साथ एंटरटेनमेंट का आभास भी होता है, जो उसे और प्रभावशाली बनाता है। और चूँकि ‘एक्स मुस्लिम्स’ अक्सर गहरे आन्तरिक और भावनात्मक संघर्ष से गुजरे होते हैं, तो अक्सर वे मानवीय संवेदना के स्तर पर आला दर्जे के इंसान भी लगते हैं। यही उनकी बड़ी ताक़त भी है। 

#ex-muslims
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(नोट : #अपनीडिजिटलडायरी के शुरुआती और सुधी-सदस्यों में से एक हैं समीर। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि रखते हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ, व्यंग्य आदि भी लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराया करते हैं।)

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