पीढ़ियाँ बदलना स्वाभाविक है, लेकिन हर पीढ़ी की ताकत और सीख को समझना जरूरी है

प्रियंका पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

भारत में गाँव और शहर में अनुभव अलग हैं। पीढ़ियों का असर और भी विविध है। गाँव के बच्चे आज भी पारम्परिक खेलों और सामाजिक आयोजनों से जुड़े रहते हैं। जबकि शहरों के बच्चे मोबाइल और लैपटॉप की दुनिया में खोए रहते हैं। समाज में समय-समय पर होने वाले परिवर्तन केवल राजनीति या तकनीक तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इंसान की सोच, जीवनशैली और संस्कृति पर गहरा असर डालते हैं। यही कारण है कि अलग-अलग वर्षों में जन्म लेने वाले लोगों को अलग-अलग ‘जेनरेशन’ के रूप में पहचाना जाता है।

‘जेनरेशन’ यानि पीढ़ी वह समूह है, जो लगभग समान समयावधि में जन्म लेता है और अपने बचपन तथा युवावस्था में समान सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों का अनुभव करता है। मसलन- स्वतंत्रता संग्राम के दौर में जन्मे बच्चे और आज के डिजिटल युग में जन्मे बच्चे। ये दो भिन्न पीढ़ियाँ हैं, जिनकी सोच और जीवनशैली में जमीन-आसमान का फर्क है। यही फर्क हर पीढ़ी की पहचान होता है। ऐसे ही आधार पर अमेरिका, यूरोप में 20वीं सदी से पीढ़ियों को वर्गीकृत करने का चलन शुरू हुआ। अब भारत सहित दुनिया इसे अपना रही है।

इस वर्गीकरण के तहत 1901 से 1927 के बीच जन्म लेने वाली पीढ़ी ‘ग्रेटेस्ट जेनरेशन’ कही जाती है। उसने प्रथम विश्व युद्ध और महामन्दी की कठिन परिस्थितियों का सामना किया। इनकी जिन्दगी अनुशासन और त्याग से भरी रही। इसी तरह, इसके बाद 1928 से 1945 तक जन्मे लोग ‘साइलेंट जेनरेशन’ कहलाए। यह वह पीढ़ी थी, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध, गरीबी और विस्थापन के बीच अपना बचपन गुजारा। भारत में यही पीढ़ी स्वतंत्रता और विभाजन दोनों की गवाह बनी। सन् 1946 से 1964 के बीच जन्म लेने वाली पीढ़ी ‘बेबी बूमर्स’ के नाम से जानी गई। युद्ध के बाद जन्म दर में तेजी से वृद्धि हुई और दुनिया पुनर्निर्माण की ओर बढ़ी। भारत में यही लोग थे, जिन्होंने पहली बार स्वतंत्र नागरिक का दर्जा पाया और औद्योगिकीकरण तथा हरित क्रान्ति के दौर देखे।

वर्ष 1965 से 1980 के बीच जन्म लेने वाली ‘जेन एक्स’ तकनीकी क्रान्ति की आहट के साथ बड़ी हुई। टीवी और रेडियो इनके जीवन का हिस्सा बने। भारत में इस पीढ़ी ने आपातकाल और आर्थिक संकट का समय देखा, इसलिए यह व्यावहारिक और आत्मनिर्भर मानी जाती है। इसके बाद 1981 से 1996 तक जन्म लेने वाली पीढ़ी ‘मिलेनियल्स¹ या ‘जेन-वाई’ कहलाई। इसने इन्टरनेट और वैश्वीकरण का दौर देखा। नई महत्वाकांक्षाओं और सपनों से भरे इन युवाओं ने सूचना प्रौद्योगिकी क्रान्ति और मोबाइल तकनीक का लाभ उठाया।

सन् 1997 से 2012 तक जन्म लेने वाली ‘जेनरेशन-ज़ेड’ या ‘जेन-ज़ी’ डिजिटल नेटिव कहलाती है। इन बच्चों ने बचपन से ही इन्टरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को जीवन का हिस्सा बना लिया। इनकी पहचान आत्मविश्वास, रचनात्मकता और तेज सोच है। लेकिन अधीरता और प्रतिस्पर्धा भी इनमें साफ दिखाई देती है। इसके बाद 2013 से 2025 के बीच जन्म लेने वाले बच्चे ‘जेनरेशन अल्फा’ के नाम से पहचाने जाते हैं। ये बच्चे ऐसे माहौल में पल-बढ़ रहे हैं, जहाँ आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंस, वर्चुअल रियलिटी और रोबोटिक्स रोजमर्रा की जिन्दगी का हिस्सा हैं। इनके खिलौने भी स्मार्ट हैंं और शिक्षा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर टिकती जा रही है।

इस तरह हर पीढ़ी पिछली से अलग रही है। ‘बेबी बूमर्स’ नौकरी और स्थिरता को महत्त्व दिया। ‘जेन-एक्स’ ने सन्तुलन साधा। ‘मिलेनियल्स’ ने उद्यमिता और सपनों पर ध्यान दिया। वहीं, ‘जेन-ज़ी’ और ‘अल्फा’ तेजी, सुविधा और त्वरित सन्तुष्टि को महत्त्व दे रही है। हालाँकि ‘जेन-ज़ी’ और ‘अल्फा’ के सामने कई चुनौतियाँ भी खड़ी हैं। इनमें सबसे पहली चुनौती मानसिक स्वास्थ्य की है। लगातार स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया के दबाव ने चिन्ता और अवसाद जैसी समस्याओं को जन्म दिया है। दूसरी चुनौती सामाजिक जुड़ाव की है। वर्चुअल यानि आभासी दुनिया में रिश्ते तो बनते हैं, लेकिन असली सम्बन्ध कमजोर पड़ जाते हैं। इसी तरह, तीसरी चुनौती रोजगार की अनिश्चितता की है। आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंस और ऑटोमेशन पारम्परिक नौकरियाँ खत्म कर रहे हैं। 

इस सन्दर्भ के साथ हमें समझना होगा कि पीढ़ियाँ बदलना स्वाभाविक है। लेकिन अगर हर पीढ़ी की ताकत और सीख को समझ लें तो हम हम आने वाली पीढ़ियों को एक अच्छा भविष्य दे सकते हैं, जो आज की महती आवश्यकता भी है। खास तौर पर ‘जेनरेशन-ज़ी’ और ‘अल्फा’ के लिहाज से, जो केवल नाम नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र का भविष्य हैं। इनके लिए हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम इनकी ऊर्जा के साथ अपने अनुभव का मेल बिठाएँ। तकनीकी रूप से दक्ष इस पीढ़ी के साथ मानवीय दृष्टि का सन्तुलन बनाएँ। इन्हें भविष्य के लिए संवेदनशील और प्रगतिशील बनाएँ। तभी समाज और राष्ट्र का सही मायने में हित सम्भव हो सकेगा।

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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।) 

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पवन और प्रियंका जैन के पिछले लेख 

7 – हिन्दी दिवस याद दिलाता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि…!
6 – अपशब्दों के प्रयाेग से लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुँचती है, राजनेता इसे क्यों नहीं समझते? 
5 – कृषि मंत्री खेती का उत्पादन बढ़ाने की बात करते हैं, मगर पशु चिकित्सा की क्यो नहीं करते?
4 – धर्म-परम्परा में हाथियों के इस्तेमाल से ‘पेटा’ के पेट में दर्द, रोज कटते पशुओं पर चुप्पी क्यों?
3 – ऑस्ट्रेलिया ने ताे बच्चों के लिए यूट्यूब भी प्रतिबन्धित कर दिया, भारत में यह कब होगा?
2 – बच्चों की आत्महत्या का मसला सिर्फ ‘शोक जताने’ या ‘नियम बनाने” से नहीं सुलझेगा! 
1 – रोज होने वाली ‘वित्तीय मानसिक हिंसा’ से आम आदमी को कब मुक्ति मिलेगी?

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