जीएसटी ‘भूल-सुधार उत्सव’ : श्रेय किसको, राहुल गाँधी या बिहार चुनाव?

अभिलाष खांडेकर, भोपाल, मध्य प्रदेश

केन्द्र सरकार के आर्थिक सलाहकारों को आखिरकार समझदारी का परिचय देते हुए जनता की आवाज सुनने पर मजबूर होना पड़ा है। इसी के तहत, उन्होंने जीएसटी की दरें कम कर दी हैं और स्लैब चार से घटाकर दो कर दिए हैं। आठ साल पहले हुई भयंकर गलती को सुधार लिया गया है, लेकिन इतने सालों तक लागू रहे इस सरासर गलत फैसले को राजनीतिक रूप देकर उसका ‘जश्न’ मनाना क्या सही हैं? लोग अच्छी तरह समझते हैं कि आर्थिक प्रयोग के नाम पर उनके साथ क्या किया गया था।

वर्ष 2017 में नई कर-व्यवस्था लागू होने के बाद से ही विशेषज्ञों, व्यापारिक नेताओं और विभिन्न गैर-भाजपा शासित राज्यों के वित्त मंत्रियों द्वारा अनेक आशंकाएँ व्यक्त की गई थीं। याद करें जीएसटी परिषद की बैठकों को, जिनमें कई तीखी बहसें, सकारात्मक सुझाव और राज्यों द्वारा व्यक्त की गई आशंकाएँ देखी गईं थी। इन फैसलों में मुद्रास्फीति और छोटे व्यापारियों की समस्याएँ शामिल थीं, जिनकी आय सीमित थी और इसलिए वे कर भुगतान और रिफण्ड की जटिल प्रक्रिया को समझने के लिए चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट का खर्च नहीं उठा सकते थे। उपभोक्ताओं पर अत्यधिक बोझ भी डाला गया था, जिससे बचत गायब हो गई।

फिर 2016 में अचानक और गुप्त रूप से लिए गए नोटबन्दी के फैसले के बाद, अर्थव्यवस्था के लिए जीएसटी एक और झटका था। हालाँकि सरकार लगातार दावा करती रही कि भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ रही है और कर आधार व्यापक हुआ है; और वित्त मंत्रालय इसे सही तरीके से कर रहा था। यह बताने की जरूरत नहीं है कि केन्द्र सरकार ने नोटबन्दी का कभी ‘जश्न’ नहीं मनाया क्योंकि इसका उल्टा असर हुआ था। कालाधन और आतंकवाद, दोनों पर उतना नियंत्रण नहीं पाया जा सका, जितना बड़ा दावा किया गया था। प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग द्वारा राजनेताओं, व्यापारियों और नौकरशाहों पर मारे जाने वाले छापे अब भी नियमित रूप से भारी मात्रा में कालाधन उगल रहे हैं, हालाँकि सत्ताधारी नेताओं को इससे छूट है।

संसद में जून 2017 में जब आधी रात को घंटी बजी और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बहुचर्चित आर्थिक सुधारों को अभूतपूर्व बताते हुए उनकी शुरुआत की, तो मैं सेन्ट्रल हॉल में मौजूद था। तब से भाजपा लगातार अपनी पीठ थपथपाती रही कि यह ‘ऐसा कुछ है, जो कांग्रेस सरकार नहीं कर पाई।’ लेकिन अब भाजपा सरकार के एक और ‘यू-टर्न’ के बाद सोशल मीडिया पर जमकर निशाना साधा जा रहा है। इसके बावजूद सरकार यह ठीक से नहीं बता पा रही है कि पहले आखिर इतनी ऊँची दरें क्यों प्रस्तावित की गईं थीं।

इस जटिल व्यवस्था ने लाखों व्यापारियों की आँखों में आँसू ला दिए हैं। क्या वे भाजपा को माफ करेंगे? वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों और इस ‘ऐतिहासिक सुधार’ को लागू करने के तरीके के खिलाफ भारत भर में बैनर और पोस्टर लगाए गए थे। लेकिन सरकार ने ध्यान नहीं दिया। ऐसा ही ‘काले कृषि कानूनों’ के मामले में भी किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप कई किसानों की मौत हो गई थी। तब भी बाद में सरकार ने यू-टर्न लिया था और उत्तरी राज्यों के वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए किसानों को खुश करने की कोशिश की।

राजनीतिक पण्डितों की तब यही राय थी कि ‘नोटबन्दी’ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर ही की गई थी। बहरहाल, जीएसटी के चक्रव्यूह और विवादों के जाल के मामले में, सरकार या तो 2017 में इन सुधारों को लागू करके सही थी या फिर लाखों लोगों-बेबस उपभोक्ताओं और मतदाताओं – की अंतहीन पीड़ा के बाद, अब इन जरूरी बदलावों को लाने में सही है। भाजपा को एक साथ दो चीजें नहीं मिल सकतीं! जाहिर है, यह वापसी भाजपा के लिए ज्यादा जरूरी थी और उपभोक्ताओं के लिए कम है। 

पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ पर इसका उपहास करते हुए लिखा है, ‘यह कांग्रेस सरकार ही थी, जो 2017 में कईं गलतियों के साथ जीएसटी लेकर आई थी…गलतियों को सुधारने के लिए राष्ट्र मोदीजी का आभारी है।’ अर्थशास्त्रियों ने वर्ष 2000 से ही इस कर प्रणाली के सभी नुकसानों की ओर इशारा किया था। यहाँ तक कि नरेन्द्र मोदी ने भी, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री रहते हुए, जब मनमोहन सिंह इस पर विचार कर रहे थे, तब आपत्ति जताई थी। इसीलिए वर्ष 2004 से 2014 तक यूपीए सरकार ने उपभोक्ताओं की अंतर्निहित समस्याओं को समझते हुए इस योजना को लागू नहीं किया।

अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री उदारवादी थे और एक राष्ट्र, एक कर- आधारित विचार को लागू करने की बारीकियों से वाकिफ थे। आलोचकों ने अक्सर प्रधानमंत्री की कथित ‘राजनीतिक समझ की कमी’ का मजाक उड़ाया था, लेकिन सिंह अपनी मृत्यु के काफी बाद भी सही साबित हुए। वे इतने समझदार थे कि उद्योग और समाज, जिसमें गरीब, निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग शामिल थे, की कठिनाइयों को भली भाँति समझते थे। अब ‘नेता’ लोग जनता को जोर देकर समझा रहे है कि सरकार का कर बदलाव का कदम कितना अच्छा है। यह गहरे अफसोस की बात है कि भाजपा अपने आठ साल की राजनीतिक हाराकीरी का जश्न जीएसटी 2.0 की सफलता का प्रचार करने के लिए मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों को अलग-अलग जगहों पर भेजकर मना रही है।

जाहिर है, यह सब हद से ज्यादा हो रहा है! उपभोक्ताओं की लूट (जीएसटी 2.0 लागू होने के) 15 दिन बाद भी जारी है हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा है- उन्हें एक गलत योजना का खामियाजा क्यों भुगतना पड़ा? विशेषज्ञ माँग कर रहे हैं कि इस वर्ष वसूला गया 28% टैक्स उपभोक्ताओं को वापस किया जाना चाहिए। राहुल गांधी तो इसे पहले ही गब्बर सिंह टैक्स (जीएसटी) कह चुके हैं। तो अब प्रश्न यह है कि सरकार के इस जीएसटी सुधार-उत्सव का श्रेय किसे दिया जाना चाहिए? राहुल गाँधी को? या बिहार चुनाव को? 

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(नोट : लेखक मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर जैसे देश के शीर्ष अखबारों में सम्पादक रह चुके हैं। उनका यह लेख ‘लोकमत समाचार’ में प्रकाशित है और उनकी सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है।)

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