धनतेरस : धन का उययोग विलासिता के लिए नहीं, स्वास्थ्य और जीवन-रक्षा के लिए हो

रेशू जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़ मध्य प्रदेश

धनतेरस का नाम लेते ही आँखों के सामने दीपों की उजास, सोने-चाँदी की झिलमिलाहट, बाजारों का रौनकभरा शोर और पूजा की तैयारियों में जुटे घर-घर के दृश्य उभर आते हैं। यह दिन न केवल खरीदारी का त्योहार है, बल्कि भारतीय संस्कृति के गहरे दर्शन का प्रतीक भी है। यह वह दिन है जब लोग मानते हैं कि लक्ष्मी माता घर आएँगी, समृद्धि का आशीर्वाद देंगी, और दुर्भाग्य के अंधकार को मिटा देंगी। परन्तु अगर हम इस पर्व के पीछे के दर्शन को गहराई से देखें, तो पाएंगे कि ‘धन’ शब्द संस्कृत के ‘धना’ से बना है, जिसका अर्थ केवल सम्पत्ति या पैसा नहीं बल्कि समृद्धि, सुख और सन्तोष का संगम है।

प्राचीन ग्रन्थों में धनतेरस को ‘धनत्रयोदशी’ कहा गया है। अर्थात् धन और स्वास्थ्य दोनों की कामना का दिन। इसी दिन समुद्र मंथन से धनवंतरि देवता अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, जिन्होंने मानवता को स्वास्थ्य का वरदान दिया। यही कारण है कि इस दिन को आयुर्वेद दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। जब दुनिया धन को केवल भौतिक सम्पत्ति के रूप में देखती है, तब भारतीय दर्शन इसे शरीर, मन और आत्मा की समृद्धि के रूप में देखता है। धनतेरस हमें सिखाती है कि धन का उपयोग कैसा हो। जब धन भगवान धनवंतरि से जुड़ा है, तो इसका अर्थ है कि धन का उययोग स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा के लिए हो, न कि दिखावे और विलासिता के लिए।

असली पूजा तो तब है, जब हम अपने जीवन में संतुलन और संयम को जगह दें। धनतेरस केवल प्रतीकात्मक नहीं , बल्कि वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। मिट्टी के दीप अंधकार मिटाने का प्रतीक हैं और धातु के बर्तन स्वास्थ्य व सकारात्मक ऊर्जा का। जहाँ घरों में ‘शुभ-लाभ’ लिखकर दीवारें सजी होती हैं। धनतेरस का एक और गहरा संदेश है—‘धन’ और ‘धर्म’ के संतुलन का। यदि धन अधर्म के मार्ग से अर्जित किया गया है, तो वह सुख नहीं दे सकता। महाभारत में कहा गया है, ‘धनं धर्मेण सञ्चयेत्’ यानी धन को धर्म के मार्ग से अर्जित करो।

आज जब समाज में भ्रष्टाचार, लालच और अनैतिक कमाई बढ़ रही है, तब धनतेरस हमें याद दिलाता है कि असली पूजा वह नहीं जो सोने के दीपक से हो, बल्कि वह है जो ईमानदारी और परिश्रम से कमाए धन से की जाए। इस दिन जब हम दीप जलाते हैं, तो वह केवल बाहर का अंधकार नहीं मिटाता, बल्कि भीतर के लालच, ईर्ष्या और मोह के अंधकार को भी दूर करने का संदेश देता है। इस पर्व का एक आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक पक्ष भी है। कार्तिक मास की त्रयोदशी के दिन मौसम बदलता है। सर्दी की शुरुआत होती है, और शरीर में रोगों की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे समय में भगवान धनवंतरि की पूजा करना एक प्रतीक है कि हमें अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए।

धनतेरस का अर्थ केवल धन प्राप्ति नहीं, बल्कि दीर्घायु, स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन की प्राप्ति भी है। जब शरीर स्वस्थ होगा, तभी जीवन में वास्तविक सुख और समृद्धि होगी। अगर हम अपने बुजुर्गो की जीवनशैली देखें, तो वे त्योहारों को केवल धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं मानते थे, बल्कि सामाजिक समरसता और पर्यावरण संतुलन का अवसर भी समझते थे। धनतेरस के दिन घरों की सफाई का चलन केवल देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए नहीं, बल्कि स्वच्छता के प्रतीक के रूप में भी है। दीप जलाना केवल अंधकार हटाने के लिए नहीं, बल्कि प्रदूषण कम करने और वातावरण को पवित्र करने का एक उपाय भी हैं। धनतेरस समाज में समानता का भी प्रतीक रहा है। पुराने समय में अमीर-गरीब सभी इस दिन मिट्‌टी के दीप ही अपने घरों में दीप जलाया करते थे। आज भी जलाते हैं। 

धनतेरस का अर्थ केवल ‘धन’ नहीं बल्कि ‘ध्यान’ भी है। ध्यान उस पर, जो हमारे जीवन को सार्थक बनाता है। धनतेरस का वास्तविक संदेश यही है कि हमें धन का सही उपयोग करना सीखना चाहिए। यह दिन हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हमारा धन कितने लोगों के जीवन में रोशनी लाता है। अगर हम अपने धन से किसी गरीब की मदद करें, किसी बीमार के इलाज में सहयोग दें, किसी जरूरतमंद बच्चे की पढ़ाई में योगदान देंं, तो वही असली धनतेरस होगी। लक्ष्मी तभी स्थायी होती हैं जब उनका उपयोग दूसरों की भलाई में हो। वरना वह केवल कुछ समय की झिलमिलाहट बनकर रह जाती हैं।

इसलिए धनतेरस पर्व की आत्मा को पहचानें। यह पर्व हमें अपने घर के साथ-साथ अपने मन का भी ‘क्लीनिंग डे’ बनाने का अवसर देता है। भीतर के लोभ, ईर्ष्या, स्वार्थ और दिखावे की धूल झाड़कर अगर हम मन में करुणा, ईमानदारी और प्रेम के दीप जला सकें, तो वही सच्ची धनतेरस होगा। धनतेरस केवल एक दिन नहीं, एक दृष्टिकोण है-जीवन को संतुलित, स्वास्थ्यपूर्ण और अर्थपूर्ण बनाने का दृष्टिकोण। यह हमें सिखाता है कि धन का मूल्य उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि उसके प्रयोग में है। अगर हम धन को साधन बनाएँ, साध्य नहीं, तो वह जीवन में सौन्दर्य और संतोष दोनों लाता है। लेकिन अगर वही धन हमें दूसरों से श्रेष्ठ दिखने की दौड़ में ले जाए, तो अभिशाप बन जाता है।

आज के समय में शायद सबसे बड़ा ‘धन’ यह है कि हम अपनी मानसिक शांति को बचा पाएँ। परिवार के साथ बैठकर मुस्कुरा सकें, कुछ समय अपनों को दे सकें, बुजुर्गों के चरण छूकर आशीर्वाद ले सकें। यह भी धनतेरस का ही भाव है। क्योंकि जो घर प्रेम और सम्मान से भरा हो, वहाँ लक्ष्मी अपने आप आ जाती हैं। धनतेरस का यह पर्व हमें हर वर्ष यह याद दिलाता है कि समृद्धि केवल धनवान बनने में नहीं, बल्कि मनवान बनने में है।

जब हम अपने कर्मों से दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाते हैं, जब हम अपनी कमाई से किसी का अंधकार मिटाते हैं, तभी सच्चे अर्थों में ‘धनतेरस’ होती है। यह त्योहार हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि समृद्धि का असली अर्थ क्या है। अगर घर में प्रेम है, परिवार में एकता है, मन में शांति है, और समाज में करुणा है, तो यही सबसे बड़ा धन है। असली समृद्धि तो उस मन में है जो संतोष जानता है, उस घर में है जहाँ प्रेम की दीवारें मजबूत हैं, और उस समाज में है जहाँ सभी के पास रोटी, कपड़ा और सम्मान होता है। इसलिए दीप जलाइए, पर साथ ही किसी और के जीवन में भी उम्मीद का दीप जलाइए। यही इस पर्व का सबसे सुंदर सन्देश है। 

—–

(रेशू जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता पवन जैन ‘घुवारा’ के परिवार की सदस्य हैं। अपने विचार उन्होंने #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।) 

सोशल मीडिया पर शेयर करें
From Visitor

Share
Published by
From Visitor

Recent Posts

जनगणना हो रही है, जनसंख्या बढ़ रही है और आंध्र में आबादी बढ़ाने वालों को ‘इनाम’!

देश में जनगणना होने वाली है। मतलब जनसंख्या कितनी है और उसका स्वरूप कैसा है,… Read More

18 hours ago

एक यात्रा, दो मुस्लिम ड्राइवर और दोनों की सोच….सूरत-ए-हाल गौरतलब!

अभी एक तारीख को किसी जरूरी काम से भोपाल से पन्ना जाना हुआ। वहाँ ट्रेन… Read More

3 days ago

सेवा-तीर्थ में ‘भारतीय भाषाओं’ की सेवा नहीं हुई, आगे शायद ही हो!! वीडियो से समझिए!

भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर का उद्घाटन 13 फरवरी 2026 को हुआ। इसे… Read More

6 days ago

भ्रष्ट-आचार अब एक शिष्ट-विचार, इसे खत्म करना मुश्किल, दो उदाहरणों से समझिए कैसे?

‘भ्रष्ट’ का अर्थ है- जब कोई अपने धर्म (कर्तव्य-पथ) से दूर हट जाए और ‘आचार’… Read More

7 days ago

ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर ‘दफन’, और ‘गुलाम-सोच’ लिखती है- “सूरज डूब गया”!

ऐसी सूचना है कि अंग्रेजों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी फिर दिवालिया हो गई और उसका… Read More

1 week ago