टीम डायरी, 7/5/2020
देश के जाने-माने चित्रकार, कहानीकार, संपादक, आकाशवाणी अधिकारी और टेलीफिल्म निर्माता प्रभु जोशी जी ने इसी चार मई को हमेशा के लिए आँखें बन्द कर लीं। वे कोरोना संक्रमित थे। लेकिन जाने से पहले से अपने इस वीडियो के जरिए भाषायी सरोकार पर हमारी आँखें खोलने का प्रयास भी कर गए। वे बता गए कि कैसे हमारी राष्ट्र भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को ख़त्म करने की मानो कोई साज़िश हो रही है। और हम उस साज़िश में जाने-अनजाने हिस्सेदार बन रहे हैं। साथ ही हमें चेता गए कि अगर हम आज सचेत नहीं हुए तो सम्भवत: कल को हमारी पहचान का संकट भी हमारे सामने उपस्थित हो सकता है।
भाषायी पहचान का संकट का तो पैदा हो ही चुका है। इसी कारण हिन्दी हिंग्लिश हो गई। तमिल तमिलिश हो रही है। ऐसा ही अन्य भाषाओं का हाल है। और हम में से कई लोग शान से इस संकट को तरक्की मान इतरा रहे हैं। उस पर नाज़ कर रहे हैं। उसके समर्थन में तर्क गढ़ रहे हैं। चिन्ता की ज़्यादा बड़ी बात ये भी है। और उतनी ही विचार की भी। चूँकि #अपनीडिजिटलडायरी के भी भाषायी सरोकार मुकम्मल हैं। इसीलिए प्रभु जोशी जी का यह वक्तव्य यहाँ डायरी पर है।
यह वीडियो ‘हिन्दी धरोहर’ नामक यू-ट्यूब चैनल से लिया गया है। आभार सहित। यह चैनल अपने नाम के अनुरूप हिन्दी भाषा के सरोकारों पर काम करता है। इस चैनल का संचालन दिनेश शाकुल जी करते हैं, जो दूरदर्शन पर बीते वर्षों में प्रसारित कालजयी धारावाहिक ‘चाणक्य’ में चन्द्रगुप्त मौर्य की भूमिका निभा चुके हैं।
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