सांकेतिक तस्वीर
समीर शिवाजी राव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश
अविवाह्य हो जाना अर्थात् विवाह के योग्य न रह जाना आज के समाज में एक आम प्रचलित बात हो गई है। कैसे? दरअसल, इस घटना को हम जैसा है वैसा, देखते या मानते नहीं। अंग्रेजी शब्द ‘अनमैरिजिबल’ हमें इस स्थिति से बेहतर रूप में रू-ब-रू कराता है। ‘अनमैरिजिबल’ अर्थात् विवाह योग्य समय में ही कतिपय कारणों से लड़के या लड़की का विवाह के अयोग्य हो जाना। अब यह विरोधाभास लगता है, लेकिन आज अविवाह्य हो जाना समाज में कई स्तरों पर हो रहे बदलावों का लेखा-जोखा समेटे हुए है।
यह एक ऐसी कहानी है जिसमें पात्र अक्सर युवापन से प्रौढ़ता की ओर अग्रसर हो रहे हैं। ऐसा नहीं कि वे विवाह संस्था में विश्वास नहीं रखते या कि उन्हें शारीरिक-भावनात्मक या पारिवारिक सम्बन्धों से कोई परहेज है। लेकिन बदले समय और परिवेश में विवाह को लेकर आजकल के युवा अपने संस्कार, परवरिश, महत्वाकांक्षाएँ, कामनाएँ, अपेक्षाएँ और पेशेवर जीवन की पाबन्दियों को लेकर दोलायमान रहते हैं। इसी बीच कहीं समय की घड़ी उनसे हाथ से आगे खिसक गई होती है। आपके हमारे आस-पड़ोस और निकट सम्बन्धियों में ऐसे दर्जनों लड़के-लड़कियाँ हैं, जो एक जीवनसाथी की तलाश में हैं। यद्यपि युवा इस स्थिति से ज्यादा मायूस या परेशान नजर नहीं आते लेकिन ऐसा भी नहीं कि उनके जीवन में अकेलापन, अवसाद या अपूर्णता का बोध नहीं। बात यह है कि आधुनिकता ने जहाँ व्यक्ति को आत्मनिर्भरता, पेशेवर उपलब्धि और सफलता, यौन स्वच्छन्दता और एक बौद्धिक तुष्टि प्रदान की है। वहीं उसने मनुष्य के व्यक्तित्व को आध्यात्मिक और समग्र अस्तित्व से विलग कर संकीर्ण बना दिया है। इसने समाज में परिवार और व्यक्तित्व में एक अप्रत्याशित विघटन घटित हो गया है। सामाजिक, पारिवारिक और निजी स्तर पर युवा जिन तनावों के झंझावत से गुजर रहे हैं, वह भयावह है।
भारतीय पारिवारिक सम्बन्ध व्यक्ति के कर्तव्य आधारित मूल्यों से परिचालित होते रहे हैं। सहस्राब्दियों से हमारे यहाँ माता-पिता, दादी-दादा, ताई-ताऊ, काकी-काका, भाभी-भैया, नानी-नाना, मामी-मामा, बुआ-फूफा जैसे हर सम्बन्ध एक दूसरे के प्रति व्यवहारिक और भावनात्मक स्तर पर घनिष्ठ कर्तव्यबोध से बँधे रहे हैं। हमारा यह कर्तव्यबोध अनुवांशिकी या सामाजिक मनोविज्ञान से कहीं अधिक गहरे में उतर कर धर्म और आध्यात्मिक अस्तित्व को स्पर्श करता है। कृतज्ञता को धर्म का मूल माना गया है। उदाहरण देखें, माता-पिता या गुरु की अवज्ञा हमारे यहाँ अपराध से भी कहीं आगे जाकर पाप हो जाता है। अवज्ञा में जो कृतघ्नता है वह पारिवारिक-सामाजिक दृष्टि से ही निन्दनीय नहीं है। समग्रता में यह परम तत्व के उस कर्मविधान का प्रतिरोध होने से जीव के परम लक्ष्य प्राप्ति में रूकावट है। यह वृहद् संकल्पना बेशकीमती है। अब देखें कि भारतीय परिवार में बच्चे का संगोपन इन मूल्यों के परिवेश में होता है तो वह भारतीय बच्चों को इन मूल्यों के प्रति विशेष संवेदनशील बनाता है। इस कारण भारतीय सांस्कृतिक मानस और संवेदनाओं की तुलना या समता दूसरों से नहीं की जा सकती। और न उनकी तुलना हमसे की जा सकती है। भारतीय बच्चों काे माता पिता, दादा-दादी आदि परिजनों की कर्तव्यनिष्ठ मनोवृत्ति से पारिवारिक परवरिश में भावनात्मक निर्भरता, पारस्परिक सुरक्षा सहज उपलब्ध हो जाती है। उनके व्यक्तित्व और चरित्र पर इसका असर गहरा होता है।
इसके बरक्स सामाजिक राजनीतिक विचारधारा और कानूनों ने इन पारम्परिक नैतिक-धार्मिक जीवन मूल्यों का अवमूल्यन किया है। औपनिवेशिक विचार से संकरित नीति मूल्य, कानून, शिक्षा, मनोरंजन और लोक-संस्कृति के नए आयाम सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनकर फिर परिवार, व्यक्तित्व और संस्कारों में घुसपैठ कर चुके हैं। आजीविका के नए माध्यम, प्रव्रजन, शहरीकरण, स्त्रियों की पेशेवर जीवन में भागीदारी, आर्थिक स्वतंत्रता, औपनिवेशिक देशों के मूल्यों के प्रभाव के चलते से पारिवारिक चरित्र और संस्कारों में आमूलचूल बदलाव आया है। हमारे परिवार पारम्परिक मूल्य- संस्कार और आधुनिक मूल्य और संस्कारों के बीच रस्साकशी का मैदान बने हुए हैं।
उपन्यास कथा साहित्य से लेकर तमाम सिनेमा, वेब सीरिज आदि विकृति और वर्जनाओं में रसाभास की निर्मिति करते दिखा रहे हैं। इसमें चाहे आधुनिक विचारधारा जीते या पारम्परिक मूल्य, हार परिवार की ही होती है। ऐसे में परिवार में पारम्परिक मूल्य परम्पराओं और उनके संवाहक बड़े-बूढ़ों की स्थिति बदतर हो रही है। ऐसी विकृतियों की स्थापना को संवैधानिक कानून तंत्र का और लोकमत का पर्याय माने जाने वाले मीडिया का अंधा समर्थन है।
इस अफलातूनी फंतासी से न परिवार सुखी है न व्यक्ति। आधुनिकता से चकाचौंध युवक-युवतियाँ आभासी भोग-विलास से परे गहरे में देखने को तैयार ही नहीं। वहीं जाति और क्षेत्रीयता का अभिमान लादकर चल रही पुरानी पीढ़ी को बदले हुए समय का कोई इल्म ही नहीं। चक्रव्यूह में सभी भारतवंशी फँसे हुए हैं और युवा तो अभिमन्यु की तरह उसके केन्द्र में शत्रुओं से घिरा हुआ है। वह असंख्य विरोधाभासों से दो-दो हाथ कर रहा है। भोगवाद, स्वच्छन्दता, व्याभिचारी चित्त जैसी तमाम क्षणिकताओं से वह अनंत को नापना चाहता है। वह पारस्परिक निर्भरताएँ और सुरक्षा चाहता है, किन्तु स्वयं के स्तर पर कर्तव्य और जिम्मेदारी निभाना नहीं चाहता।
कन्या पक्ष वाले चाहते हैं कि उसे विवाहोपरांत नौकरी-करियर के लिए अवसर मिलता रहे। किन्तु सास-ससुर या अन्य परिजनों की जवाबदारी नहीं चाहते। कोई कन्या अमेरिकादेशस्थ वर चाहती हैं, तो काेई अपने शहर का ही। गाँव के किसान को कोई लड़की पसन्द नहीं करती। लड़के नौकरीशुदा लड़की चाहते हैं, जो घर को कुशल गृहिणी की तरह भी संभाल सके। उन्हें वधु द्वारा अर्जित धन प्रिय होता है, किन्तु उस धन से पैदा होने वाला मान-अहंकार नागवार होता है। ऐसे में आज हमारे लिए विवाह जैसा संस्कार भी एक सौदेबाजी और अनुबन्ध हो गया है, जिसमें सबसे ऊपर पैसा-कौड़ी, सौन्दर्य-आकर्षण, सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रभाव जैसी बातें होती हैं। कर्तव्य-बोध और पारस्परिक निष्ठा, शुचिता का मोल काफी नीचे रहता है। किसी भी सम्बन्ध के लिए सबसे आधारभूत बात जीवनसाथी से भावनात्मक एकात्मता और निष्ठा की अपेक्षा को अन्य बातों के साथ गृहीत मान लिया जाता है। ऐसे में विवाह हो जाना या विवाह न होना फिर ज्यादा मायने नहीं रखता। आज हम अपने युवाओं में यही भाव देख सकते हैं।
आधुनिकता से पश्चिम में व्यक्तित्व का जो विखण्डन हुआ है, भारत में उसका दुष्प्रभाव सीधे दोगुना हुआ है। एक- पारम्परिक मूल्यों को ह्रास और दूसरा- संकीर्ण भोगवाद का परिणाम। पश्चिमी युवा जिस अलगाव और विखण्डन से रू-ब-रू हो रहे हैं, समग्र और गहन दार्शनिक विचार के अभाव में उसका यथार्थ प्रलेखीकरण पश्चिम में नहीं हो रहा है। पूँजीवाद से प्रेरित पश्चिमी मनोरंजन और पॉप कल्चर के साथ वास्तविक जीवन के आख्यान भी यहाँ उपलब्ध हो सके, तो भारतीय युवाओं में कई उन्हीं गलतियों के पुनरावर्तन से बच जाएँ।
सार संक्षेप यह है कि यदि भारत के युवक और युवतियाँ चमचमाती आभासी भोगों की छवियों का विश्लेषण कर लें और उपलब्ध नैतिक दृष्टि को अपनाएँ तो वो एक स्वस्थ रचनात्मकता पूर्ण जीवन जी सकते हैं।
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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।)
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