हम अपने राज्य में अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं, तो दूसरे राज्य में इसी का विरोध क्यों?

टीम डायरी

लगता है दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में भाषा विवाद संकुचितता की हद तक पहुँचता जा रहा है। मामला केरल का है। वहाँ राज्य सरकार मलयालम भाषा विधेयक के नाम से एक कानून अमल में लाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत केरल में मलयालम पहली भाषा के रूप में इस्तेमाल किए जाने का प्रावधान है। यानि सरकारी कामकाज में ही नहीं, शिक्षण संस्थानों में भी मलयालम पहली भाषा के रूप में पढ़ानी जानी है। फिर वे संस्थान चाहे निजी हों, सरकारी। कक्षा-एक से दसवीं तक यह प्रावधान अनिवार्य रूप से लागू होना है। 

इसमें किसी को भी ऐतिराज नहीं होना चाहिए। खास तौर पर दक्षिण भारत के राज्यों में तो बिल्कुल नहीं। क्योंकि वहाँ हर राज्य अपनी भाषायी और क्षेत्रीय विशिष्टता को प्राथमिकता देने में लगा है। वह भी इस हद तक कि यदि राष्ट्रवाद की भावना इससे आहत होती हो तो भी काेई बात नहीं! हालाँकि ऐसा होना नहीं चाहिए। भाषा, क्षेत्र, जाति जैसे मुद्दों पर निष्ठा वहीं तक सही मानी जा सकती है, जब तक कि वे राष्ट्रवाद के आड़े न आएँ। लेकिन दक्षिण भारत पर यह तर्क लागू नहीं होता शायद। विशेष रूप से तमिलनाडु, आदि में। 

कर्नाटक में भी कुछ हद कन्नड़ भाषा को लेकर स्थानीय लोगों की सोच उसी स्तर पर पहुँच रही है, जैसी तमिलनाडु में दिखाई देती है। इसीलिए अक्सर कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों से कन्नड़ बनाम हिन्दी भाषियों के झगडृों की सूचनाएँ भी आती रहती हैं। वहाँ अपनी भाषा की प्राथमिकता के पक्ष में उनके अपने तर्क होते हैं। अलबत्ता, दिलचस्प बात यह है कि यही कन्नड़ भाषी समुदाय केरल में ‘मलयालम भाषा विधेयक’ के विरोध पर उतारू है। इस बाबत वह केरल के राज्यपाल से मिलकर अपना विरोध दर्ज भी करा चुका है। 

दरअसल, केरल के कासरगोड़ जिले में ठीक-ठाक संख्या में कन्नड़ भाषी लोग रहते हैं। उन्ही का एक प्रतिनिधिमण्डल राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर से मिला है। उसने माँग की है कि ‘मलयालम भाषा विधेयक’ को राज्यपाल अपनी मंजूरी न दें। क्यों? इसलिए कि इससे केरल में रह रहे अल्पसंख्यक कन्नड़ भाषी समुदाय को असुविधा हो जाएगी। एक तरह से उनके साथ ‘अन्याय’ हो जाएगा।

विचित्र बात है न? यह विचित्र इसलिए भी है कि जब हम भाषायी प्राथमिकता की वकालत अपने राज्य में करते हैं, भाषा के नाम पर मारपीट, आदि भी करते हैं, अन्य भाषा बोलने वालों को असुरक्षित महसूस कराते हैं, तो फिर वैसी ही स्थिति अपने साथ बनने पर तकलीफ कैसी? अपने राज्य में भाषायी उपद्रव करने पर यह ध्यान रखना चाहिए न कि यही स्थिति अन्य राज्यों में आपके साथ भी बन सकती है!! 

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Neelesh Dwivedi

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