सांकेतिक तस्वीर
निकेश जैन, इन्दौर मध्य प्रदेश
भारत में अस्थायी कामगारों (खास तौर पर सामान की डिलीवरी करने वाले लड़के, वाहन चालक, आदि) की संख्या कितनी हे? 1.2 करोड़! और इतने सारे लोगों को रोजगार किसने मुहैया कराया है? किसी इलॉन मस्क, बिल गेट्स या डोनाल्ड ट्रम्प ने नहीं। इन्हें जोमैटो, स्विग्गी, ओला, जेप्टो जैसी भारतीय कम्पनियों के संस्थापकों ने रोजगार दिया है। तो अब बताइए, ये संस्थापक इतने सारे लोगों को एक ठीक-ठाक जीवनशैली जीने की सुविधा (रोजगार देकर) दे रहे हैं, या उनका शोषण कर रहे हैं?
कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि इन कामगारों के लिए काम की स्थितियाँ बेहद खराब हैं, पैसे काफी कम दिए जाते हैं, मेहनत खूब कराई जाती है, छुटि्टयाँ भी नहीं मिलतीं, आदि। लेकिन जरा गौर कीजिए, यही शिकायतें तो किसी बड़ी कम्पनी में काम करने वाला सॉफ्टवेयर इंजीनियर भी करता है! तो मतलब क्या हुआ इसका? यही कि शिकायतें करने वाले शिकायत करते रहेंगे। वे नहीं रुकेंगे, न ही उनकी शिकायतें। अगर सभी अस्थायी कामगार सॉफ्टवेयर इंजीनियर बना दिए जाएँ, तब भी नहीं।
अलबत्ता, ऐसा हो नहीं सकता। हर कोई कोई तो सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन नहीं सकता न? लिहाजा, हर किसी को उसके कौशल, उसकी योग्यता के अनुसार काम दिया जाना ही उचित है। ताकि वह उसी के सहारे जीविकोपार्जन कर सके तथा सम्मानजनक ढंग से अपना और परिवार का भरण-पोषण कर सके। इसमें कोई गलत बात भी नहीं है। इसी कारण हमें आभारी होना चाहिए उन भारतीय उद्यमियों का, जो करोड़ों की तादाद में युवाओं के लिए रोजगार सृजन कर रहे हैं। उन्हें नौकरी दे रहे हैं।
एक अनुमान के मुताबिक अगले तीन-चार साल में भारत के भीतर अस्थायी कामगारों की संख्या दो से ढाई करोड़ तक हो जाएगी। अब जरा इस आँकड़े को ध्यान में रखकर सोचिए, कि अगर इतनी बड़ी तादाद में युवा बेरोजगार रहते हुए देश की सड़कों पर घूमते रहते, तो क्या होता? जवाब शायद कल्पना से भी परे होगा!! हालाँकि, कुछ लोग तब भी तर्क दे सकते हैं कि अस्थायी कामगारों के दम पर नए-नवेले भारतीय उद्यमी अपनी जेबें भर रहे हैं? अरब-खरबपति हो रहे हें। तो? क्या इसमें कुछ गलत है?
हमारे इन युवा उद्यम संस्थापकों ने व्यापार में बड़ा जोखिम लिया है, लगातार ले रहे हैं। इसका इनाम तो उन्हें मिलना ही चाहिए। नहीं क्या? इधर-उधर की दलीलें देने वालों को मैं कहता हूँ कि अगर व्यापार में जोखिम लेना, उसे करना दलील देने जितना ही आसान लगता हो, तो एक बार कर के देख लें! खुद सब समझ आ जाएगा। अर्थतंत्र का सामान्य सिद्धान्त होता है- कार्यबल शंकु (वर्कफोर्स पिरामिड)। इसमें निचले स्तर पर सर्वाधिक रोजगार होते हैं, जो ज्यादातर अस्थायी, अकुशल या कम-कुशल होते है।
कहने का मतलब साफ है, भारत में अस्थायी कामगारों की अर्थव्यवस्था आगे भी बनी रहने वाली है। हाँ, जैसे-जैसे यह परिपक्व होगी, इसमें कामगारों के कल्याण की, उनकी बेहतरी की नीतियाँ भी अपने आप लागू होती जाएँगीं। हमें तब तक इसे कुछ समय देना पड़ेगा।
मानते हैं कि नहीं?
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निकेश का मूल लेख
𝟭.𝟮 𝗰𝗿𝗼𝗿𝗲 – 𝘁𝗵𝗮𝘁’𝘀 𝗵𝗼𝘄 𝗺𝗮𝗻𝘆 𝗽𝗲𝗼𝗽𝗹𝗲 𝗮𝗿𝗲 𝗽𝗮𝗿𝘁 𝗼𝗳 𝗼𝘂𝗿 𝗴𝗶𝗴 𝘄𝗼𝗿𝗸𝗳𝗼𝗿𝗰𝗲. These are delivery boys, drivers etc. And who created these jobs? 𝗡𝗼𝘁 𝗘𝗹𝗼𝗻 𝗠𝘂𝘀𝗸, 𝗡𝗼𝘁 𝗕𝗶𝗹𝗹 𝗚𝗮𝘁𝗲𝘀 𝗮𝗻𝗱 𝗱𝗲𝗳𝗶𝗻𝗶𝘁𝗲𝗹𝘆 𝗻𝗼𝘁 𝗠𝗿. 𝗧𝗿𝘂𝗺𝗽!
These are created by local founders from likes of Zomato, Swiggy, Ola, Zepto, etc. So by creating these jobs did they exploit this workforce or created a living for them?
Some would argue working conditions, meager pay etc. Fair. But haven’t we heard similar complaints from software engineers (long working hours, no weekends, pressure, demanding boss, long commute, and finally low pay:-)
So complaints will not stop even if we all became software engineers. But unfortunately we all can’t so based on our skills some of us will have to “deliver” for living and nothing wrong in that.
As a matter of fact, we should be grateful to these founders to start these aggregation businesses which created job opportunities for 1.2 crore young Indians. This workforce is estimated to grow to 2.5 crore by the year 2030!!
Just imagine the condition of our streets if these many young people had nothing to do?
Some people argue that in this process these founders have become billionaires. So? That’s the reward for taking risk. If it was so easy then anyone could have started an aggregation business…
Every large economy has workforce in the form of a pyramid structure and the lower end of the pyramid will have most of the jobs. Even a software services company works on that principle.
The gig economy is here to stay. As it matures it will automatically create a system for the worker welfare – let’s just give it sometime.
Agree?
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(निकेश जैन, कॉरपोरेट प्रशिक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनी- एड्यूरिगो टेक्नोलॉजी के सह-संस्थापक हैं। उनकी अनुमति से उनका यह लेख अपेक्षित संशोधनों और भाषायी बदलावों के साथ #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। मूल रूप से अंग्रेजी में उन्होंने इसे लिंक्डइन पर लिखा है।)
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