सांकेतिक तस्वीर
पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश
एक छोटी-सी समस्या के समाधान के लिए व्यक्ति फ़ाइलों के जंगल में भटकता है। फोन उठाने से लेकर जवाब देने तक हर कदम पर दीवार खड़ी है। लोकतंत्र में सरकार और जनता के बीच की इस ‘दीवार’ का नाम है- ‘संवेदनहीन नौकरशाही’। नौकरशाही का मूल उद्देश्य था- नागरिकों की सुविधा, प्रशासन की पारदर्शिता और नीतियों की समानता। लेकिन धीरे-धीरे फ़ाइलों पर फैसले अब संवेदना से नहीं, ‘किसे खुश करना है और किससे बचना है’, इस आधार पर तय होने लगे हैं। फ़ाइलें महीनों दबाई जाती हैं। नियुक्तियाँ वर्षों तक लम्बित रहती हैं, और जब जवाब माँगा जाए तो कहा जाता है, “प्रक्रिया में है।” यह ‘प्रक्रिया’ अब बहाने का दूसरा नाम बन चुकी है। जनता के सवालों का जवाब काग़ज़ों में मिलता है, लेकिन न्याय का उत्तर शून्य में खो जाता है।
जनता की पीड़ा आँकड़ों में बदल दी जाती है और आँकड़ों की भाषा में संवेदना मर जाती है। यह स्थिति लोकतंत्र के उस आत्मा को चोट पहुँचाती है जो ‘जन’ से शुरू होकर ’जन’ पर ही समाप्त होती है। संवेदनहीनता केवल प्रशासन की नहीं, समाज की भी बीमारी बन चुकी है। आज दुर्घटनाओं के वीडियो बनाए जाते हैं, पर किसी पीड़ित सहारा देने की हिम्मत कम लोगों में ही होती है। गरीब की पीड़ा पर ताली बजाना आसान है, पर मदद करना कठिन। जहाँ ऊपर बैठे लोग ‘नीतियों’ की बात करते हैं, वहीं नीचे खड़े लोग ‘रोटी’ की। बीच में है नौकरशाही, जो पुल नहीं, दीवार बन चुकी है। यही वह त्रासदी है जो लोकतंत्र को भीतर से खोखला कर रही है।
फ़ाइलों और कानूनों की दुनिया में ‘संवेदना’ को ‘अपवाद’ मान लिया गया है। यह विचलित करने वाली सच्चाई है कि जो तंत्र जनता की सेवा के लिए बना, वही तंत्र अब नागरिक को संदेह की दृष्टि से देखता है। अधिकारी जनता को सुविधा देने से अधिक उसके इरादे पर शक करने लगे हैं। यह शक लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है। यह संवेदनहीन तंत्र आम नागरिक की ज़िंदगी को उस ‘प्रतीक्षा की यातना’ में बदल देता है जो कभी समाप्त नहीं होती। लोकतंत्र तब तक जीवित रहता है जब तक उसमें संवाद और सहानुभूति बनी रहती है। कानून तभी तक उपयोगी हैं, जब वे मानवीयता की रक्षा करें। और प्रशासन तभी तक वैध है जब वह नागरिक के दुख को अपनी जिम्मेदारी माने।
आज हमारे देश में हर विभाग में योजनाएँ हैं, लेकिन क्रियान्वयन में संवेदना नहीं है। यही कारण है कि योजनाएँ ‘रिपोर्ट कार्ड’ बनकर रह गई हैं, न कि राहत का साधन। फ़ाइलें तब तक अर्थहीन हैं, जब तक उनमें इंसान की कहानी नहीं झलकती। पद का अहंकार अगर सेवा की भावना से नहीं मिला, तो हर नीति अधूरी रह जाएगी। आज आवश्यकता ‘अकुशल प्रशासनिक मशीनरी’ की नहीं, ‘मानवीय प्रशासन’ की है, जहाँ प्रत्येक निर्णय के केन्द्र में नागरिक का दुःख, उसकी गरिमा और उसका जीवन हो। कानून की कठोरता के साथ मानवता की कोमलता भी जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी करुणा में है, उसकी कठोरता में नहीं। हम आज अगर फिर से मनुष्यता को जीवित नहीं कर पाए, तो अगली पीढ़ियाँ हमारे इस कालखण्ड को ‘संवेदनहीन युग’ कहकर याद करेंगी।
न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाओं को भी परिवारों की सामाजिक पीड़ा को समझने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य केवल आर्थिक विकास का फल नहीं, बल्कि मानव गरिमा की बुनियाद है। पर्यावरण को केवल आपदा या दिवस के रूप में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की चिंता के रूप में प्रस्तुत करना होगा। यदि हम एक मजबूत, न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक भारत चाहते हैं, तो हमें उन आवाज़ों को सुनना होगा जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। सवालों से डरने के बजाय उनका सामना करना होगा। ध्यान रहे कि योजनाओं को समयबद्ध, प्रभावी और सतत तरीके से लागू किया जाए, तो विश्वास केवल टिकता ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र और समाज की मजबूती का प्रतीक बन जाता है।
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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।)
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पवन और प्रियंका जैन के पिछले 10 लेख
12 – जहाँ के पत्थर भी ‘हीरा’, वह बुन्देलखण्ड अपनी अलग पहचान कब पाएगा और कैसे?
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