क्या हम आज जो ‘धर्माचरण’ कर रहे हैं, उससे अधर्म की अभिवृद्धि हो रही है?

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश

नव-हिन्दुत्व के आगमन के साथ तीर्थ – धाम, मन्दिरों में दर्शनार्थियों की और कथा-प्रवचनों के आयोजनों की बाढ़ सी आई है। वैष्णवदेवी, काशी, अयोध्या, पुरी, द्वारका, उज्जैन, कांची, रामेश्वरम, बद्री-केदार या वृन्दावन, कहीं भी इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है। जिस तरह राम कथा में विविध कल्पों की रामायण मिलती हैं। उद्वस्त प्राचीन तीर्थ स्थानों पर नए-नए लोकों के दर्शन होते हैं। और अमूमन हर जगह नित प्रतिदिन अफलातून हुजूम का जमावड़ा मिलता है। सरकारें इसकी प्रभावोत्पादकता की उपयोगिता को समझते हुए पूरे मनोयोग और उत्साह से सहयोग करती हैं। ऐसी ऊर्जा का दर्शन सरकारों में सर्वथा दुर्लभ होता है।

इसका परिणामस्वरूप तीर्थ धामों में शुचिता और पवित्रता, आध्यात्मिकता और ज्ञान परम्परा और विधि-आचार रीति, प्रकृति-पर्यावरण का संरक्षण जैसे तमाम बातों को नजरअंदाज कर उन्हें पर्यटन स्थलों में तब्दील किया जा रहा है। तीर्थ को तीर्थत्व प्रदान करने वाले सब पारम्परिक तत्त्व उद्धवस्त किए जा रहे हैं। भारत में प्राय: हर नदी, पर्वत, जंगल, तीर्थ है और सभी औद्योगिक और इंसानी प्रदूषण से गंदगी की जद में हैं। हर जगह एक नई अर्थव्यवस्था पैदा हो चुकी है, जहाँ स्थान के देवता और परिसर उपकरण बन गए हैं और येनकेनप्रकारेन धनार्जन देवता बन गया है। इससे लाभान्वित होने वाला वर्ग पैदा हो गया है, जो काफी मुखर और दृश्यमान है और धर्म-नैतिकता-सदाचार के तमाम नियमों को तिलांजलि देकर अपने हित साधने में लगा हुआ है। धर्म का केन्द्र माने जाने वाले सम्प्रदाय, मत, मठ-मन्दिर और धर्माचार्यों में भी अब सदाचार और नीति-शास्त्र के मार्गदर्शन की जगह चकाचौंध, दंभ-पाखंड, अशुचिता और भ्रष्टाचार का प्रवेश हो चुका है। कई लोगों से तीर्थ धाम में भ्रष्ट आचरण, अनुचित व्यवहार, लूट-खसोट और ठगे जाने या बच जाने के अनुभव सुनने में आते हैं। समस्या यह है कि ऐसे तीर्थ में दोषदर्शन और दोषों को मौन स्वीकृति दोनों अपराध बताए गए हैं। इस असमंजस का मतलब है कि हमसे गहरे में कोई भूल हो रही है। लेकिन कहाँ? यह अन्वेषण का विषय है।

हमारी जीवन शैली निसर्ग की हानि करने वाली है। हम प्रात:काल का आरंभ जल में शौच कर प्रदूषण से करते हैं। शरीर और कपड़ों की सफाई के लिए प्रदूषणकारी रसायनों का उपयोग करते हैं। पहनने के कपड़ों से लेकर भोजन में कृत्रिम पदार्थों का उपयोग करते हैं। हमारे निवास, यातायात साधन सब हानिकारक हैं। हमारे भाव, कला-मनोरंजन भी कृत्रिम हैं। आजीविका के लिए हम जो काम करते हैं, धन-संपदा, संसाधनों का संग्रह करते हैं, वह प्रदूषक और विनाशकारक हैं। उस पर भी तुर्रा यह कि इन सब गतिविधियों में कहीं कोई संयम, सीमा या सम्यकता नहीं। धन में कलियुग का वास बताया गया है। जब धर्मयुक्त धन भी दोषपूर्ण होता है तो निरपेक्ष होकर अपरिमित धनार्जन को पाप स्वरूप ही होना चाहिए। ऐसे धन से हम लोग कथा-प्रवचनादि के आयोजन करते हैं। ये आयोजन वक्ता और श्रोता का कितना कल्याण करेंगे, यह विचारणीय विषय है। हाँ, मानसिक अपराध न हो तो आश्चर्य ही कहा जाना चाहिए(

अधर्मोपार्जित धन के भोज भंडारे का अन्न तो बड़े-बड़े यति, तपस्वी, त्यागी महात्माओं का भी पतन कर देता है। ऐसे कई आख्यान हमारे इतिहास में दर्ज है। वह हमें कहाँ ले जाकर छोड़ेगा, हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। फिर ऐसे धन से होने वाली तीर्थ यात्राएँ निरापद कैसे रह सकती हैं? हम-आप आम लोगों की तो बात करना ही बेकार है। अत्यंत सूक्ष्मता से और धर्माचरण करने वाले लोगों से भी तीर्थों में अपराध हो जाते हैं। इसी कारण भौतिक स्तर पर धर्म के नाम पर जितने आयोजन आज हम देखतें हैं उसका कोई प्रभाव हमारे जीवन पर नहीं दिखता। पुराने समय में कोई बिरला सुपात्र ही नियमानुसार तीर्थ-यात्राएँ करता था। श्रीमद्भागवत या रामकथाादि के सीमित आयोजन ही होते थे, तब जीवन में नीति-धर्म अधिक था।

यह बात विरोधाभासी लगती है किन्तु हम आज जो धर्माचरण कर रहे हैं, उससे अधिकतर अधर्म की अभिवृद्धि ही हो रही है। इसका कारण हमारे द्वारा आधुनिकता के नाम पर भाैतिक प्रधानता और भोगवाद को स्थान देकर यथार्थ धर्माचरण का तिरस्कार है। और जब तक यह नहीं बदलेगा, तमाम समाज सुधारक, प्रचारक कुछ नहीं कर पाएँगे। भारत में नैतिक और आध्यत्मिक स्तर पर हुआ यह पतन यकायक नहीं हुआ है। इसके लिए बड़े भारी और दीर्घकालीन प्रयास हैं। हम इससे वाकिफ़ भर नहीं है, हम इस सब में शरीक हैं। इसके प्रभाव में हमने धर्म-विच्छेदकारी दृष्टि स्वीकार कर ली। इससे तात्कालिक समस्या तो सुलझ गई किन्तु दीर्घकालिक हितों की क्षति हो गई।

आज हम जीवन तात्कालिकता में ही जी रहे हैं। और यह ह्रास आम लोगाें तक सीमित नहीं है। अत्यल्प अपवादों को छोड़ दें तो धर्माचार्य और वेद शास्त्रादि परम्परा के संवाहक विद्वानों सहित समूचा नेतृत्त्व ही किंकर्त्तव्यविमूढ़ है। इस दुरावस्था के लिए हम सभी स्वधर्म और कर्त्तव्यबोध को भूलकर दूसरे को जिम्मेदार ठहराकर मुक्त हो जाते हैं। हमे यह समझना होगा कि त्याग, तितिक्षा और निरंतर कर्म का मार्ग है धर्म, सुख, शांति और आराम का नहीं। जब तक दैनिक जीवन में जीव-जंतु, पेड-पौधों, जड़-जंगम, प्रकृति के प्रति हमारी धर्म दृष्टि आचरण में नहीं आती, धर्म हमसे दूर रहेगा। 

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(नोट : समीर #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सुधी-सदस्यों में से एक हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं। सनातन धर्म, संस्कृति, परम्परा तथा वैश्विक मसलों पर अक्सर श्रृंखलाबद्ध लेख भी लिखते हैं।) 

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