जय हो गणेश…“पत्रकार हैं हम, हमारे लिए भी ‘गणपति की कीमत’ कम नहीं करोगे?”

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

“पत्रकार हैं हम, हमारे लिए भी ‘गणपति की कीमत’ कम नहीं करोगे?”

हाँ, यही शब्द सुनाई दिए थे उनके। अभी कल की ही बात थी, मंगलवार, 26 अगस्त की। रात का वक्त था। अगले कुछ घन्टों में ही गणेशोत्सव शुरू होने जा रहा था। तमाम श्रद्धालुओं की तरह मैं भी एक ठिकाने पर खड़ा था। भीड़ उतनी नहीं थी, लेकिन सबको अपनी बारी का थोड़ा इंतजार जरूर करना पड़ रहा था। किसी को कोई आपत्ति भी नजर नहीं आती थी। ईश्वर की सेवा का भाव हो तो धैर्य, संयम, सरलता, सहजता, जैसी चीजें व्यक्ति के व्यक्तित्त्व में  अपने आप ही घर बनाने लगती हैं। बाहर व्यवहार में झलकने भी लगती हैं। 

यद्यपि हर किसी के मामले में ऐसा निश्चित रूप से नहीं हो पाता। कुछ लोग होते हैं, जो भगवान के मन्दिरों में भी उनके सेवक या दास के भाव से नहीं, बल्कि वीआईपी (बहुत विशिष्ट व्यक्ति) या वीवीआईपी (बहुत-बहुत विशिष्ट व्यक्ति) होने का दम्भ लिए जाते हैं। भीड़ में पंक्तिबद्ध खड़े लोगों को हेय दृष्टि से देखते जाते हैं। पुजारी के सामने अपने पद, पैसे और प्रतिष्ठा का रुतबा दिखाते हैं। सामान्य से कुछ अधिक ही देर तक बैठकर ईश्वर को यूँ निहारते रहते हैं, मानो भगवान तो उन्हीं के लिए खास तौर पर वहाँ उस मन्दिर में विराजे हुए हैं।

सोचिए, जब मन्दिरों में यह हाल रहता है तो उन स्थलों पर कैसा होता होगा जहाँ कोई सामान्य, अतिसामान्य सा व्यक्ति भगवान की मूर्तियाँ आदि रखकर बैठा होगा? ताकि उनके माध्यम से उसकी आजीविका कुछ बन्दोबस्त हो सके? मगर वीआईपी और वीवीआईपी की भाव का क्या ही कीजै? वह जनाब भी वही भाव लिए आए थे। ‘भगवान को खरीदने, उनकी कीमत चुकाकर’!! भोपाल में एक व्यस्त व्यावसायिक क्षेत्र है एमपी नगर (महाराणा प्रताप नगर)। वहीं गायत्री मन्दिर के पास का वाकिआ है ये। देश-प्रदेश के कई छोटे-बड़े खबरिया संस्थानों के ठिकाने भी इस क्षेत्र में पाए जाते हैं। उन्हीं में किसी संस्थान में चाकरी करने वाले एक वह भी होंगे। 

लेकिन दफ्तर के बाहर तो वह वीआईपी, वीवीआईपी थे? वहाँ किसी के चाकर थोड़े ही थे? भगवान के भी नहीं!! सो, वह साथ में गायत्री मन्दिर से एक सिफारिशी सहयोगी भी लेकर आए। उसने दुकानदार से उन जनाब के लिए सिफारिश भी लगाई, “भैया, इन्हें गायत्री मन्दिर वाले पण्डित जी ने भेजा है। जरा देख लेना, जो बन पड़े लगा देना।” फिर उन जनाब ने सामने रखे श्री गणपति के विग्रहों में से एक पसन्द किया। उसका मूल्य पूछा तो जवाब सुनकर ठिठक गए, “यह तो बहुत ज्यादा है। कम नहीं करोगे?”  “साहब, कम कर के ही बताया है। वैसे भी, आज का ही काम बचा है”, दुकानदार बोला। लेकिन उन्हें तसल्ली नहीं हुई। थोड़ा और जोर लगाया। खुद बताया, “अरे, हमें पण्डित जी ने भेजा है।”, “हाँ, हाँ, बताया न भैया ने। आप निश्चिन्त रहिए। मैंने घर जैसा मूल्य बताया है।” 

अब यहाँ उनके भीतर का दम्भ जाग गया, “पत्रकार हैं हम। हमारे लिए भी ‘गणपति की कीमत’ कम नहीं करोगे?” इतना सुनते ही दुकानदार और वहाँ मौजूद लोग, जिनमें मैं भी था, कुछ देर के लिए अवाक् रह गए। फिर एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराए और अपने काम में लग गए। गणपति को लोगों के घर पहुँचाने का माध्यम बने दुकानदार ने भगवान से बड़ा किसी को नहीं माना। उन जनाब को भी नहीं, तो वह अगले ठिकाने की ओर चल दिए। मगर उनकी बात अटकी रही..मेरे जैसे शायद कई लोगों के दिमाग़ में, देर तक!! 

जय हो गणेश…! 

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