कृषि मंत्री खेती का उत्पादन बढ़ाने की बात करते हैं, मगर पशु चिकित्सा की क्यो नहीं करते?

प्रियंका पवन जैन ‘घुवारा’, टीकमगढ़, मध्य प्रदेश

भारत में पशुपालन केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही नहीं है बल्कि यह करोड़ों परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार भी है। देश में 20 करोड़ से अधिक गौवंश और करोड़ों अन्य पशु हैं। उसे देखते हुए पशु चिकित्सकों की कमी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्योंकि यह केवल किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की समस्या नहीं है, खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षमता से भी जुड़ा सवाल है। 

कमाल की बात है कि देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने लगभग हर कार्यक्रम में खेतों-किसानों और खेती-किसानी के कल्याण की बात करते हैं। खेती का उत्पादन बढ़ाकर दोगुना, चार गुना करने की बात करते हैं। लेकिन वह पशु चिकित्सा की स्थिति सुधारने की बात कर नहीं करते। जबकि यह किसानों से सीधे जुड़ने वाला मुद्दा है। यह तथ्य है कि देश में पशु चिकित्सकों की स्थिति बेहद चिन्ताजनक है। पूरे देश में 38,916 स्वीकृत पदों में से 10,839 पद खाली पड़े हैं। लगभग 28 प्रतिशत की रिक्तता है। इसका अर्थ है कि लगभग हर चौथे पशु चिकित्सक का पद रिक्त है। इसे सीधे शब्दों में कहें तो इस स्थिति का असर ग्रामीण पशुपालन पर संकट की सूरत में पड़ रहा है। साथ ही, किसानों की आय बढ़ाए जाने की सम्भावना पर भी विपरीत असर हो रहा है।

जबकि यह क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने और रोजगार सृजन का एक सशक्त साधन हो सकता है। लेकिन विडम्बना यह है कि इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र को संवारने वाले पशु चिकित्सकों की भारी कमी से देश जूझ रहा है। ध्यान रखिए कि पशु चिकित्सक केवल पशुओं का इलाज नहीं करते, बल्कि वे पशुधन से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम, टीकाकरण, कृत्रिम गर्भाधान, प्रजनन सम्बन्धी परामर्श और वैज्ञानिक तकनीकों के प्रसार में भी अहम भूमिका निभाते हैं। उनके अभाव में किसानों-पशुपालकों को बड़ी कठिनाइयाँ होती है। खासकर छोटे और सीमान्त किसानों को इसका अधिक खमियाजा भुगतना पड़ता है, क्योंकि उनकी आजीविका पूरी तरह से पशुओं पर ही निर्भर है। आपात स्थिति में बीमार या घायल पशु के लिए समय पर डॉक्टर न मिलना उनके लिए गम्भीर संकट बन जाता है। यही नहीं, पर्याप्त पशु चिकित्सक न होने से पशुओं के टीकाकरण कार्यक्रमों की गति भी धीमी होती है।

वैसे तो किसानों के लिए 1962 नम्बर की टोल-फ्री हेल्पलाइन शुरू की गई है। पशुओं के स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत चलित पशु चिकित्सा इकाईयाँ भी संचालित हैं। वे गाँव-गाँव जाकर पशुपालकों को पशुओं के स्वास्थ्य सम्बन्धी सेवाएँ देती हैं। अब तक 29 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों में 8,191 ऐसी इकाइयाँ संचालित हैं। ये प्रयास निश्चित रूप से उपयोगी हैं, लेकिन इनसे स्थायी समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि ऐसी चलित इकाइयाँ नियमित पशु चिकित्सक का विकल्प नहीं बन सकतीं। पशु चिकित्सा के मामले में समस्याएँ और भी हैं। जैसे- पशुपालन की बढ़ती दर के बावजूद पशु चिकित्सकों के नए पदों का सृजन नहीं हो रहा है। इसी तरह, ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा के प्रति पशु चिकित्सकों की अनिच्छा और शैक्षणिक संस्थानों की सीमित संख्या का भी मसला है। साथ ही, वेतन और सुविधाओं का स्तर भी इस पेशे के प्रति युवाओं को आकषित नहीं करता। 

तो फिर आखिर समाधान क्या है? तो इस बाबत सुझाव ये हैं कि पशु चिकित्सा शिक्षा का विस्तार करना होगा। इस विषय के नए शिक्षण संस्थान खोलने होंगे। मौजूदा संस्थानों की सीटें बढ़ानी होंगी। पशु चिकित्सकों को अतिआधुनिक प्रशिक्षण मुहैया कराना होगा। गाँवों में सेवा देने के लिए पशु चिकित्सकों को प्रोत्साहित करना होगा। उन्हें बेहतर वेतन, अतिरिक्त भत्ता, आवास, परिवहन सुविधा और पदोन्नति में प्राथमिकता जैसी सुविधाएँ देनी होंगी। केंद्र और राज्य सरकारें संयुक्त कोष भी बना सकती हैं, ताकि वित्तीय संसाधनों की कमी न रहे। 

ऐसे कुछ कदमों से हम ‘आत्मनिर्भर भारत’ की यात्रा में नए आयाम जोड़ सकते हैं। यह बात हर स्तर पर याद रखी जानी चाहिए कि भारत जैसे देश के विकास का इंजन गाँवों, खेतों से होकर गुजरता है। और इस इंजन को ईधन देने का काम किसानों के पशु करते हैं। यानि अगर देश के विकास को रफ्तार देनी है, तो गाँवों का अर्थतंत्र मजबूत करना होगा। खेतों से होने वाली आय बढ़ानी होगी, जिसकी बातें भी लगातार की जा रही हैं। और इन बातों को फलीभूत करने हेतु पशुओं की देखभाल, उनकी चिकित्सा के क्षेत्र को मजबूत करना ही होगा। 

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(पवन जैन मूल रूप से बुन्देलखण्ड के टीकमगढ़ जिले के सक्रिय सामाजिक तथा राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। जनसामान्य से जुड़े मसलों पर वह लगातार आवाज बुलन्द करते हैं। उनकी पत्नी प्रियंका भी उन्हीं की तरह सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। लेख के रूप में वे अपने विचार #अपनीडिजिटलडायरी को व्हाट्स एप के जरिए भेजते हैं।) 

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