दिव्यांगों पर अभद्र टिप्पणी! सच है, ऐसे बेहूदा हास्य को अभिव्यक्ति की आजादी कैसे कहें?

टीम डायरी

समय रैना। इन्हें न तो हास्य कलाकार कहा जा सकता है, और न कलाकार। हाँ, ‘कलहकार’ जरूर कह सकते हैं इन्हें, क्योंकि इनकी अमर्यादित भाषा और हरकतों से ‘कलह’ अक्सर हो जाया करती है। एक बार फिर हो गई है। इस बार भी इन्हें देश के उच्चतम न्यायालय ने फटकार लगाई है। यह मामला भी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के दुरुपयोग और हास्य के नाम पर अभद्रता, अश्लीलता परोसने का है। 

सोशल मीडिया, विशेषकर यूट्यूब पर सक्रिय समय रैना ने अपने एक कार्यक्रम में दिव्यांगों पर अभद्र टिप्पणी की। उन्होंने एक दुर्लभ बीमारी (स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी-एसएमए) से ग्रस्त दो महीने के बच्चे के इलाज के लिए 16 करोड़ रुपए (विदेश से आयातित एक इंजेक्शन की कीमत) जुटाने का मजाक उड़ाया। उन्हाेंने अपने कार्यक्रम में शामिल हुई एक महिला की तरफ मुड़ते हुए कहा, “मैम, सोचिए कि आप उस बच्चे की माँ हैं और आपके खाते में 16 करोड़ रुपए आ जाते हैं। तो क्या आपके मन में दूसरा ख्याल नहीं आएगा? कि महँगाई बहुत बढ़ रही है। और दो महीने का बच्चा बच ही जाएगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं?” रैना की इस बेहूदा टिप्पणी का वीडियो बड़ी तेजी से सोशल मीडिया पर ‘डार्क ह्यूमर’ यानि ‘भद्दा मजाक’ के नाम से फैल गया। 

यह मामला ध्यान में आते ही एसएमए के इलाज के लिए लगातार अभियान चलाने वाले एक संगठन (क्योर एसएमए फाउण्डेशन) ने उच्चतम न्यायालय में समय रैना के खिलाफ याचिका लगा दी। इस पर सुनवाई के दौरान अदालत ने समय रैना और उनके चार अन्य साथियों को सख्त फटकार लगाते हुए आदेश दिया कि वे “तुरन्त सार्वजनिक रूप से दिव्यांग जनों से माफी माँगें।” इन सभी को यह माफी अपने उसी यूट्यूब चैनल पर प्रसारित करने के लिए आदेशित किया गया है, जिस पर उन्होंने अपने कार्यक्रम में अभद्र टिप्पणी की।

हालाँकि यह पहला मौका नहीं है, जब समय रैना और उनके साथी ऐसे विवादों में आए हैं। इससे पहले भी उनके एक अन्य यूट्यूब कार्यक्रम में माता-पिता के बीच के शारीरिक सम्बन्धों का सार्वजनिक जिक्र गन्दे तरीके से किया गया था। इसके बाद ऐसा उल्लेख करने वाले समय रैना और उनके साथी रणबीर अल्लाहाबादिया के सामने गिरफ्तारी तक की नौबत आ गई थी। तब भी माफी माँगने के आदेश के साथ अन्य कड़ी शर्तों पर रणबीर को अदालत ने गिरफ्तारी से छूट मिली थी। रैना को उस कार्यक्रम के सब एपीसोड भी हटाने पड़े थे। 

अलबत्ता, इस बार शीर्ष अदालत ने मामले को पहले की तुलना में अधिक गम्भीरता से लिया है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि इस तरह की अभद्र भाषा, आदि को ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के दायरे में शामिल नहीं माना जा सकता। लिहाजा, सरकार ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ को और स्पष्ट रूप से परिभाषित करने के लिए दिशा-निर्देश तय करे। खास तौर पर सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली सामग्री को ध्यान में रखकर। सरकार के दिशा-निर्देशों में नागरिकों के अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी सन्तुलन बनाए रखने की व्यवस्था की जाए। 

सच है, ऐसे बेहूदा हास्य को अभिव्यक्ति की आजादी कैसे कहें?

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Neelesh Dwivedi

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