ऐसे बहुत से बच्चों की टीचर उन्हें ढूँढ रहीं होगीं

ऋषु मिश्रा, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश

कल माघ मेले में इनसे मिलना हुआ l मसाला चाय बेच रहे थे और हमारे पीछे हो लिए l हमारी दुनिया तो ऐसे ही बच्चों के इर्द-गिर्द घूमती है, इसलिए नाम पूछ लिया l इनका नाम “विवेक ” है l कितना सुन्दर नाम है! हम सभी के भीतर तो होता है विवेक, बस उसका इस्तेमाल करने में कभी-कभी चूक हो जाती है l इस तरह की चूक होना भी ज़रूरी है क्योंकि जीवन के सभी पाठ पाठशाला में नहीं पढ़े जाते और न ही पुस्तकों से l

विवेक पीलीभीत जनपद से सपरिवार प्रयागराज आ गए हैं। धनार्जन में अपने माता-पिता का सहयोग कर रहे हैं l वहाँ के एक उच्च प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं l बता रहे हैं कि -” बुक ले आया हूँ l” मैं सोच रही थी कि इसकी टीचर इसे ढूँढ रहीं होगीं, जैसे मैं ढूँढती हूँ l

मैंने कहा मेरा नम्बर ले लो, दुबारा आऊँगी तो मिलूँगीl काग़ज़ नहीं था मेरे पास। तब विवेक ने तुरन्त एक चाय का कप फाड़कर मुझे पकड़ा दिया l क्या “Presence of mind” है ! ऐसे बहुत से बच्चों की टीचर उन्हें ढूँढ रहीं होगीं l डाटा (Data) की माँग होती रहती है न। हम डाटा देते भी रहते हैं l

परसों किसी ने कहा, “ऊपर भगवान है, नीचे इंसान है। बीच में डाटा है। इसी डाटा से नौकरी चल रही हैl”  
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(ऋषु मिश्रा जी उत्तर प्रदेश में प्रयागराज के एक शासकीय विद्यालय में शिक्षिका हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की सबसे पुरानी और सुधी पाठकों में से एक। वे निरन्तर डायरी के साथ हैं, उसका सम्बल बनकर। वे लगातार फेसबुक पर अपने स्कूल के अनुभवों के बारे में ऐसी पोस्ट लिखती रहती हैं। उनकी सहमति लेकर वहीं से #डायरी के लिए उनका यह लेख लिया गया है। ताकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने-पढ़ाने वालों का एक धवल पहलू भी सामने आ सके।)
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ऋषु जी के पिछले लेख 

2- अनुभवी व्यक्ति अपने आप में एक सम्पूर्ण पुस्तक होता है।
1-  “मैडम, हम तो इसे गिराकर यह समझा रहे थे कि देखो स्ट्रेट एंगल ऐसे बनता है”

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