‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह बहुत ताकतवर है… क्या ताकतवर है?… पछतावा!

ऋचा लखेड़ा, वरिष्ठ लेखक, दिल्ली

तारा कई घंटों से नकुल के साथ प्यार की पींगें बढ़ा रही थी। लेकिन उसकी तमाम कोशिशों का नकुल पर मानो कोई असर ही नहीं हो रहा था। एक अनाम अपराधबोध था, जो उसे भीतर ही भीतर खा रहा था। उसके बोझ तले दबा बैठा था वह। तारा की प्यारभरी बातों से उसे कोई राहत नहीं मिली थी। अपराधबोध ने उसके दिल में डर और चिंता पैदा कर दी थी। वह किसी तरह दूर नहीं होती थी। इसी कारण तारा की कोशिशों पर भी उसका ध्यान नहीं गया। थक-हारकर वह भी उदास हो गई और कुछ नाराज भी।

लेकिन तभी अचानक न जाने क्या हुआ कि नकुल पर जैसे कोई जानवर सवार हो गया। अब तक वह प्यार के लिए बिलकुल तैयार नहीं था। उसका ख्याल उसे डराने से ज्यादा उदास करता था। मगर इसी बीच, उसके जेहन में तनु बाकर का चेहरा उभरा और वह गुस्से से भर गया। आपे से बाहर होकर वह तारा पर ऐसे टूट पड़ा कि उसकी चीखें निकल गईं। लेकिन उसने उसे रोका नहीं। यह सोचकर कि शायद इससे ही उसके पति को कुछ बेहतर महसूस हो। उसे कुछ और देर के लिए पति का साथ मिल जाए।

नकुल हमेशा ऐसा ही स्वार्थीपन दिखाता था। इसे वह अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता था। लेकिन चूँकि तारा उसे दिल की गहराई से प्यार करती थी, इसलिए वह कुछ नहीं कहती। बल्कि उसे एहसास दिलाती थी कि वह हमेशा उसके दुख में भी उसके साथ है। लेकिन आज तारा का मन संदेह से भर गया था। उसे एहसास हो रहा था कि बरसों से नकुल के मन में कड़वाहट के जो बीज पड़े हैं, वे अब भरी-पूरी फसल बनकर लहलहाने को तैयार हैं। किसी नए बदलाव के लिए अब बहुत देर हो चुकी थी।

नकुल का यह रूप देखना भी तारा के लिए मुश्किल था। इसलिए उसने दूसरी तरफ मुँह फेरने की कोशिश की। करवट लेनी चाही लेकिन नकुल ने उसे भला-बुरा कहते हुए उसका चेहरा पकड़कर फिर अपनी तरफ घुमा लिया। वहशियों की तरह उसके साथ कई बार जिस्म की भूख मिटाई और अंत में निढाल होकर उसी पर गिर गया।

बहुत देर तक वह उसके ऊपर यूँ ही पड़ा रहा। तारा को समझ नहीं आया कि वह रो रहा था या कराह रहा था। उसने तो उसकी तरफ देखा भी नहीं था, दिल में क्या ही उतर पाता। वह उसके बोझ तले दबी पड़ी थी। पहलू बदलना चाहती थी। लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाई। तभी उसे अपने गालों से लुढ़कते आँसुओं की गरमी महसूस हुई। हालाँकि वह पक्के तौर पर अब भी नहीं समझी थी कि ये आँसू खुद उसके हैं, या नकुल के। उसने नकुल को बाँहों में भर लिया और कुछ देर तक दोनों चुपचाप यूँ ही लेटे रहे।

“मुझे माफ कर दे तारा…, माफ कर दे मुझे। मुझे लगता है, मैं किसी दैत्याकार नाव पर सवार हूँ, जो बड़े झरने की तरफ बहती जाती है… कि तभी अचानक एक बड़ी लहर आती है, और मुझे तुझसे दूर ले जाती है।”

“नकुल तुझे पता है न कि मेरे पेट में भगवान की नेमत पल रही है, हमारा बच्चा। इसके बावजूद ऐसे तेरा दुखी होना, नशा करना, तुझे मुसीबत में डाल देगा। हमे बरबाद कर देगा। तू मुझे बता, कौन सी तकलीफ खाए जा रही है तुझे। मुझे जब तक तेरी परेशानी, तेरे पछतावे की वजह नहीं पता चलेगी, मैं कोई मदद भी कैसे कर पाऊँगी? अब तो मुझे भी डर लगने लगा है। दिन-ब-दिन किसी महामारी की तरह तुझ पर इसकी पकड़ मजबूत होती जा रही है। और मैं बिलकुल नहीं चाहती कि हमारे बच्चे पर इसका बुरा साया पड़े।”

तारा की बात सुनकर नकुल ने उसे ऐसे कष्ट से देखा कि वह बीच में ही रुक गई। उसने नकुल का हाथ अपने हाथों में ले लिया। यह एहसास दिलाने के लिए कि वह उसे कितना प्यार करती है। वह इस आशंका से डरी हुई भी थी कि कहीं नकुल अकेला न पड़ जाए। बिखर न जाए। उसने नकुल के पैर सहलाने की कोशिश की। पर उसने पैर यूँ पीछे खींच लिए जैसे किसी ने उन पर चोट की हो। तभी, हवा के तेज झोंके से उसके घुँघराले बाल गालों आ गिरे। इससे नकुल को लगा जैसे उसके मुँह पर चाबुक चला दी गई हो। उसकी आँखों से आँसुओं की धार बह निकली। मुँह हल्का सा खुला और होंठ नजाकत से काँप गए। शायद वह कुछ कहना चाहता था।

“हर कोई जानता है। मैं उनकी आँखों में देख सकता हूँ। वे जानते हैं कि मैंने क्या किया है।”

“क्या किया है तूने नकुल?” तारा ने शांति से पूछा। वह दुखी थी अलबत्ता।

खुद पर संदेह करने और अपराधबोध से ग्रस्त रहने के ऐसे दौरे नकुल को अक्सर पड़ते थे। तारा इसकी आदी भी थी। लेकिन अभी-अभी जो हुआ था, उससे वह बुरी तरह डर गई थी।

“कायर हूँ मैं, कायर, कायर, कायर हूँ मैं – पर तू बता तारा, क्या मेरा सच जानने के बाद तू मुझसे प्यार करना बंद कर देगी?”

नकुल लगातार आगे-पीछे हिल रहा था। वह ठहरना नहीं चाहता था। मानो, उसके ठहरते ही उसका दर्द और पछतावा बेकाबू हो जाने वाला हो। उसकी निगाहें स्थिर थीं, जिनका भार तारा भी अपने ऊपर महसूस कर रही थी। वह बिना पलकें झपकाए अँधेरे में एकटक देखे जा रहा था। गुस्से से भरा और विनाशाकारी विचारों के जाल में उलझा हुआ था।

“कोई भी सच इतना बुरा नहीं हो सकता कि मैं तुझे प्यार करना बंद कर दूँ।”

“तू बहुत मासूम है। तू नहीं जानती, मैंने क्या किया है।”

“तो मुझे बता न?”

“मैंने सोचा था – मुझे भरोसा था कि जब वे अंबा को ले जाएँगे तो मैं खुश रहूँगाI हाँ, मैंने अपनी आँखों के सामने सैनिकों को उस पर हमला करते देखा था। तब मैं छिप गया था। मैंने उन सैनिकों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया। मैंने सोचा था कि आख़िर इससे छुटकारा पाकर मैं सुकून से रहूँगा।”

नकुल की आवाज भर्रा गई। हताश होकर सिसकने लगा वह। लगता था, जैसे उसका कलेजा फट जाएगा। उसकी आँखों में भयानक खालीपन था। आवाज में वैसी खोखली सी कराह थी, जैसे किसी को फाँसी पर चढ़ाने के लिए ले जाया जा रहा हो।

“कोई तुझे दोष नहीं देगा।”

तारा ने ऐसा कह तो दिया, लेकिन उसके चेहरे पर भी संताप की निशानियाँ उभर आईं। तभी नकुल ने तारा का हाथ पकड़कर अपने सीने में रखा और हल्के से दबाया। मानो, एहसास दिलाना चाहता हो कि दुख और पछतावे की आग उसकी खाली और कठोर हडिडयों के ढाँचे को कैसे जला रही है। कैसे भीतर ही भीतर खा रही है।

 

“तू उस वक्त करता भी क्या? तू तो बहुत छोटा था न तब!—”

“मैं बेटा था… मेरा काम था…. उन्हें बचाना।”

वह फूट-फूटकर रोने लगा। तारा ने उसे अपनी बाँहों में भरकर सीने से लगा लिया। दुख की तीव्रता से नकुल की पीठ अकड़ गई थी।

“शशश… तू उस वक्त कुछ नहीं कर सकता था।” तारा ने उसे दुलारते हुए फिर समझाया।

“मेरे जेहन में उनकी यादें बसी हैं… मैं उनसे बच नहीं सकता… वह बहुत ताकतवर है।”

“क्या ताकतवर है?”

“पछतावा।”

नकुल ने ऐसे कहा, जैसे उसे इस शब्द का मतलब समझ में न आया हो।

“लेकिन अब तो पछतावा करना बेकार है”, तारा ने कहा।

#MayaviAmbaAurShaitan
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(नोट :  यह श्रृंखला एनडीटीवी की पत्रकार और लेखक ऋचा लखेड़ा की ‘प्रभात प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्तक ‘मायावी अंबा और शैतान’ पर आधारित है। इस पुस्तक में ऋचा ने हिन्दुस्तान के कई अन्दरूनी इलाक़ों में आज भी व्याप्त कुरीति ‘डायन’ प्रथा को प्रभावी तरीक़े से उकेरा है। ऐसे सामाजिक मसलों से #अपनीडिजिटलडायरी का सरोकार है। इसीलिए प्रकाशक से पूर्व अनुमति लेकर #‘डायरी’ पर यह श्रृंखला चलाई जा रही है। पुस्तक पर पूरा कॉपीराइट लेखक और प्रकाशक का है। इसे किसी भी रूप में इस्तेमाल करना कानूनी कार्यवाही को बुलावा दे सकता है।) 
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पुस्तक की पिछली 10 कड़ियाँ 

61 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : रैड-हाउंड्स खून के प्यासे दरिंदे हैं!
60 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : अब जो भी होगा, बहुत भयावना होगा
59 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह समझ गई थी कि हमें नकार देने की कोशिश बेकार है!
58 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : अपने भीतर की डायन को हाथ से फिसलने मत देना!
57 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : उसे अब जिंदा बच निकलने की संभावना दिखने लगी थी!
56 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : समय खुशी मनाने का नहीं, सच का सामना करने का था
55 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : पलक झपकते ही कई संगीनें पटाला की छाती के पार हो गईं 
54 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : जिनसे तू बचकर भागी है, वे यहाँ भी पहुँच गए है
53 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : तुम कोई भगवान नहीं हो, जो…
52 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : मात्रा, ज़हर को औषधि, औषधि को ज़हर बना देती है

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