ऋचा लखेड़ा की पुस्तक ‘मायावी अंबा और शैतान’
ऋचा लखेड़ा, वरिष्ठ लेखक, दिल्ली
अंबा के लिए बैकाल जेल से दूर निकल जाना बहुत जरूरी था। कोई और रास्ता नहीं था, सिवाय इसके कि वह सामने दिख रहे अँधेरे, अनजान रास्ते में ही आगे बढ़ जाए। लिहाजा, अंबा ने अपने भीतर की बची-खुची ताकत बटोरी, खुद को सीधा किया और उस ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर डगमगाते हुए चल पड़ी। जर्जर पुल की कुछ लकड़ियाँ गिर चुकी थीं। बाकी जो थीं, वे हर कदम रखते ही कँपकँपा रही थीं। मानो अभी बस, गिरने ही वाली हों। इसी बीच, एक बार तो वह गंदगी से भरे दलदल को बड़ी छलाँग लगाकर लाँघते वक्त लकड़ी के कामचलाऊ ढाँचे से गिरते-गिरते ही बची।
‘आजादी की उस सुरंग’ में जेल जैसी गंध आ रही थी – अमोनिया जैसी। युद्धक जहाज की दीवारों की तरह पेंट था। आवाज को दबा देने वाले पैनल लगे थे। सुरक्षा के लिए लगाई गई बाड़ में करंट दौड़ रहा था। माँस, जली हुई खाद्य सामग्री, बरतन, पानी और सड़न की गंदी बदबू थी। सूखी झाड़ियों पर कचरे की थैलियाँ बिखरी थीं। उसके पैरों तले कुचले जाने से प्लास्टिक की टूटी बोतलें चरमरा रही थीं। उसकी कमर पर बँधी कारतूसों की मैगजीनें आपस में टकराकर आवाजें कर रही थीं। दुरगंध इतनी तेज थी कि अंबा की आँखें फटी रह गईं। नाक और मुँह को जैसे उसी बदबू ने बंद सा कर दिया था। पर उसके पास कोई और रास्ता नहीं था। सो, उसने एक बार फिर पूरी ताकत बटोरी और उस भूमिगत सुरंग में घुस गई। सुंरग में कई जगह पर खनन के लिए छेद किए गए थे। लेकिन उनका अब वे बेकार थे।
इस सुरंग के बारे में जब जिसको भी जानकारी लगी, उसने इसका भागने के लिए ही इस्तेमाल किया था। पुराने समय में सैनिकों ने, फिर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने। इसके बाद विद्रोहियों और आतंकियों ने। अब सभी प्रकार के गुंडों, बदमाशों ने भी। अंबा को वह सुरंग अंतहीन लग रही थी। अंदर हवा में भारी नमी और ठंडक थी। वह धीरे-धीरे अंदाजे से ही नजदीकी दीवार की ओर बढ़ी। सुरंग के चिकने सिरों पर उसने हाथ फेरकर देखा। गाढ़ी काली मिट्टी में जीवन के किसी तरह के संकेत नहीं थे। काफी दिनों से वहाँ जमा कचरे से सब ढँका हुआ था। हवा में अजीब सी ध्वनियाँ गूँज रही थीं, जो सुरंग के दूसरे छोर पर पहुँचने से ठीक पहले तेज आवाज के साथ ही थमीं। सुरंग का यह छोर ऐसे इलाके में खुला था, जो शायद किसी नक्शे में अंकित नहीं था। वहाँ के रास्ते ऐसा भ्रम पैदा कर रहे थे कि अंबा कई बार उनमें भटक गई। उसके पैरों के नीचे कँटीली झाड़ियाँ थीं। दलदली मिट्टी और काई भी। मगर उन सबको अनदेखा कर उसने दौड़ लगा दी और तब तक दौड़ती रही, जब तक उसका सिर ठंड से जम नहीं गया। आँखों के आगे आने वाली तमाम चीजों के दो-दो प्रतिबिंब नहीं बनने लगे। सुबह की धुंध में उसकी परछाई इतनी लंबी नहीं हो गई कि वह दूर पर्वतों के दूसरे सिरे को छूकर लुप्त होने लगे।
जोतसोमा के जंगल अपने आप में अथाह गहराई वाले थे। बेहद घना और अंधकार से भरा था वह जंगल। वहीं, अब वह चुपचाप पेड़ों को देखने लगी। पूरे शरीर पर वहाँ की मिट्टी को मलते हुए गहरी साँसें लेकर उसकी खुशबू को अपने भीतर भर लेने की कोशिश करने लगी। कुछ लोगों के लिए जोतसोमा एक अजीब सी डरावनी जगह थी। उसमें घुसना भी उनके लिए किसी दु:स्वप्न जैसा था। बहुत से लोग उसे अभेद्य और दुर्गम मानते थे। लेकिन अंबा को जोतसोमा का जंगल छुपे हुए रहस्यों और आश्चर्यों का स्वागत करने वाला आमंत्रण प्रतीत होता था। हालाँकि अभी अँधेरे में वह देख नहीं पाई लेकिन निश्चित ही वह इतने समय तक जंगल के दलदली हिस्से में ही दौड़ती रही थी। वह अपनी साँसों के उतार-चढ़ाव से इसे अब महसूस कर रही थी। उसके फेफड़ों में समाई तीखी, बासी सी हवा से वह ये जान रही थी। इस वक्त वह कितनी जोर से हाँफ रही थी, इसका अंदाजा उसे छाती पर टँगी भारी राइफल के उछलने से हो रहा था।
धुंध अब तक दूध की तरह गाढ़ी हो चुकी थी। कुछ नजर नहीं आ रहा था। अब वह नहीं दौड़ रही थी। बल्कि ऐसा लगता था, जैसे सभी चीजें उसके ऊपर दौड़ी आ रही हों। पेड़ों पर से धुंध के गुच्छे से गिर रहे थे। किसी परिंदे के पंख की तरह हलके। चाँदी की तरह सफेद। वे उसके बालों में उलझकर यूँ लगने लगे, जैसे चंद्रमा की किरणें। इससे उसके बाल किसी रहस्यमयी रोशनी से चमकते हुए नजर आने लगे। उसकी काया पीली पड़ चुकी थी। लेकिन उस पर भी वे धुंध के गुच्छे सितारों की तरह चमक रहे थे। तभी उसे लगा कि जैसे किसी भी पल उसका दिल तेज ठंड के कारण धड़कना बंद कर देगा। लिहाजा, वह उस तरफ से अपना ध्यान हटाने की कोशिश करने लगी। फिर भी आलम ये था कि उसे लगा, जैसे उसके कान झड़कर गिर चुके हों। वे हों ही न। तभी उसे महसूस हुआ कि हवा से अब सल्फर और बारूद की गंध आना कम हो चुकी है। उसकी जगह देवदार के वृक्षों की महक हवा में घुली है। इससे वह समझ गई कि वह जंगल के अनछुए और खतरनाक हिस्से में प्रवेश कर चुकी है।
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(नोट : यह श्रृंखला एनडीटीवी की पत्रकार और लेखक ऋचा लखेड़ा की ‘प्रभात प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्तक ‘मायावी अंबा और शैतान’ पर आधारित है। इस पुस्तक में ऋचा ने हिन्दुस्तान के कई अन्दरूनी इलाक़ों में आज भी व्याप्त कुरीति ‘डायन’ प्रथा को प्रभावी तरीक़े से उकेरा है। ऐसे सामाजिक मसलों से #अपनीडिजिटलडायरी का सरोकार है। इसीलिए प्रकाशक से पूर्व अनुमति लेकर #‘डायरी’ पर यह श्रृंखला चलाई जा रही है। पुस्तक पर पूरा कॉपीराइट लेखक और प्रकाशक का है। इसे किसी भी रूप में इस्तेमाल करना कानूनी कार्यवाही को बुलावा दे सकता है।)
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पुस्तक की पिछली 10 कड़ियाँ
27- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : “तू…. ! तू बाहर कैसे आई चुड़ैल-” उसने इतना कहा और…
26 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : कोई उन्माद बिना बुलाए, बिना इजाजत नहीं आता
25- ‘मायाबी अम्बा और शैतान’ : स्मृतियों के पुरातत्त्व का कोई क्रम नहीं होता!
24- वह पैर; काश! वह उस पैर को काटकर अलग कर पाती
23- ‘मायावी अंबा और शैतान’ : सुना है कि तू मौत से भी नहीं डरती डायन?
22- ‘मायावी अंबा और शैतान’ : अच्छा हो, अगर ये मरी न हो!
21- ‘मायावी अंबा और शैतान’ : वह घंटों से टखने तक बर्फीले पानी में खड़ी थी, निर्वस्त्र!
20- ‘मायावी अंबा और शैतान’ : उसे अब यातना दी जाएगी और हमें उसकी तकलीफ महसूस होगी
19- ‘मायावी अंबा और शैतान’ : फिर उसने गला फाड़कर विलाप शुरू कर दिया!
18- ‘मायावी अंबा और शैतान’ : ऐसे बागी संगठन का नेतृत्त्व करना महिलाओं के लिए सही नहीं है
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