भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पहले दोस्त होते थे, अब आमने-सामने हैं।
टीम डायरी
दुनिया में इन दिनों काफी-कुछ चल रहा है। जो पहले पक्के दोस्त नजर आया करते थे, वे एक-दूसरे को शह और मात देने में लगे हैं, प्रतिद्वंद्वियों की तरह। जैसे- भारत और अमेरिका। वहीं, जो प्रतिद्वंद्वी माने जाते रहे हैं, वे मौके की नजाकत को देखते हुए एक-दूसरे के साथ कामकाजी रिश्ते बनाने में लगे हैं। मसलन- भारत और चीन। हालाँकि, यहाँ भारत और अमेरिका की बात करनी है अभी। क्योकि सुर्खियाँ बताती हैं कि भारत-अमेरिका के बीच बीते कुछ समय से चल रहे शह और मात के खेल के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मुलाकात हुई है। फ्रांस में जी-7 (दुनिया के सात ताकतवर देशों का समूह, इसमें भारत विशेष आमंत्रित सदस्य है) के शीर्ष नेताओं की बैठक से अलग हटकर बुधवार, 17 जून को मोदी-ट्रम्प ने मुलाकात की है।
इस मुलाकात में क्या होगा, इस पर दुनिया की नजर थी क्योंकि ट्रम्प और मोदी एक-दूसरे के साथ ‘गहरी दोस्ती’ के लिए जाने जाते थे। अलबत्ता, मोदी ने इस मुलाकात से पहले सार्वजनिक रूप से बयान देकर अपने अलग रुख का संकेत दे दिया। उन्होंने मंगलवार, 16 जून को जी-7 के ही एक अन्य कार्यक्रम में मंच से कहा, “दुनिया में इस वक्त संसाधनों की कमी नहीं है। भरोसे की कमी है। इसलिए भविष्य में हमारी (भारत और विभिन्न देशों की) साझेदारी इस बात पर निर्भर करेगी कि हम आपसी भरोसे को कितना मजबूत करते हैं।” स्पष्ट रूप से मोदी का यह बयान ट्रम्प के लिए ही संदेश माना गया क्योंकि पाकिस्तान और वहाँ मौजूद आतंकी ठिकानो के खिलाफ भारतीय सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के बाद से अमेरिका लगातार भारत विरोधी कार्रवाई कर रहा है। वह पाकिस्तान को सीधी मदद दे रहा है। भारत के खिलाफ बयानबाजी कर रहा है। भारत पर सख्त और बढ़े हुए सीमा-शुल्क लगा रहा है। यहाँ तक कि ईरान के साथ संघर्ष के बीच अमेरिकी सेना द्वारा एक जहाज पर हमला किए जाने से जो भारतीय नाविक मारे गए, उसका अमेरिका ने खेद तक नहीं जताया। ऐसा काफी कुछ हो रहा है।
यह सब क्यों? चार प्रमुख कारण हैं। पहला- ट्रम्प के लगातार दावों के बावजूद भारत ने पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम का श्रेय अमेरिका को नहीं दिया। दूसरा- ट्रम्प इसी संघर्ष विराम के आधार पर अपने लिए नोबेल शांति पुरस्कार माँग रहे थे। पाकिस्तान ने उनका समर्थन किया, भारत ने न कह दिया। तीसरा- अमेरिका लगातार यह दबाव बना रहा है कि भारत अपने बाजार के कृषि और दुग्ध क्षेत्र को अमेरिकी कम्पनियों के लिए खोले। भारत इसके लिए तैयार नहीं हो रहा है। इस चक्कर में दोनों देशों के बीच ‘मुक्त व्यापार समझौता’ भी नहीं हो पा रहा है। और चौथा- भारत सरकार ‘विदेशी अंशदान विनियमन कानून’ (एफसीआरए) में संशोधन कर रही है। अमेरिका के तमाम प्रभावशाली तबकों की इससे नींद उड़ी है। एफसीआरए संशोधन विधेयक- 2026 इसी मार्च में लोकसभा में पेश हुआ है। इसके मानसून सत्र में पारित होने की उम्मीद है। इसके बाद भारत के स्वयंसेवी संगठनों या ऐसी अन्य संस्थाओं के लिए विदेश से माली मदद लेना मुश्किल हो जाएगा। उन्हे एक-एक पाई के खर्च का हिसाब सरकार को देना होगा। कहा जा रहा है कि इससे अमेरिका का वह तबका, जो लगातार भारतीय स्वयंसेवी संगठनों, आदि को पैसे देकर भारत में अस्थिरता पैदा करना चाहता है, सरकार पर दबाव बनाना चाहता है, वह ऐसा नहीं कर पाएगा। इसीलिए, अमेरिका के ताकतवर लोगों ने ट्रम्प पर दबाव बनाया हुआ है कि भारत को किसी भी तरह से रोकें।
इस तरह की पृष्ठभूमि में मोदी और ट्रम्प की मुजाकात हुई, फ्रांस में। बीते 15-16 महीने में पहली बार दोनों साथ आए, हाथ मिलाए, गले नहीं लगे। मोदी ने ट्रम्प के सामने भारत की चिंताओं से जुड़े सभी मुद्दे उठाए। ट्रम्प ने भरोसा देने की कोशिश की, इनका निदान किया जाएगा। यहाँ तक कहा, “इस व्यक्ति (मोदी) के खिलाफ अगर किसी ने भी हमला करने (चीन-पाकिस्तान का संदेश) की कोशिश की तो रास्ते में अमेरिका खड़ा होगा।” यह भी कहा कि वह जल्द भारत की यात्रा करेंगे। साथ ही, मोदी के साथ अपनी ‘पक्की वाली दोस्ती’ के संकेत भी देते रहे। हालाँकि अमेरिका में ट्रम्प के प्रशासन ने ठीक इसी दौरान फिर से बता दिया, कि वह विश्वास लायक तो बिल्कुल नहीं है। अमेरिका के युद्ध विभाग ने बुधवार को ही अपनी एक कमान का नाम बदला। उसने ‘भारत-प्रशांत क्षेत्र कमान’ से ‘भारत’ का नाम हटा दिया। अब यह सिर्फ ‘प्रशांत क्षेत्र कमान’ कहलाएगी। यही नहीं, इस विभाग ने भारत का गलत नक्शा भी लगाया। इसमें कश्मीर को भारत के बजाय पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया।
मतलब, अंतत: ट्रम्प और उनके अमेरिकी प्रशासन ने साबित कर दिया कि वे जो कहते हैं, वह करते नहीं और जो करते हैं, वह कहते नहीं। इसीलिए अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
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