प्रतीकात्मक चित्र में ग्रामीण जीवन।
समीर पाटिल, भोपाल मध्य प्रदेश से
भारत की आत्मा जहाँ बसती है, वह गाँव हैं। ये सुन्दर, सुरम्य स्थल हर भारतीय के मन में हमेशा से बसा रहा है। यहाँ प्रत्येक जीव पारस्परिक कर्त्तव्य और तदनुरूप उत्पन्न होने वाले अधिकार के साथ आपस में जुड़े रहते हैं।
आधुनिक विज्ञान के संकीर्ण भौतिकतावादी नजरिए को छोड़ दें तो मानव इतिहास में धर्म, दर्शन, भाषा, कला और विज्ञान के उत्तुंग शिखर में हमें जो दैवीय या पराचेतना की अनुभूति होती है, उसकी मूल ईकाई तो जीव, जगत और प्रकृति का सम्बन्ध ऋत् है। और वन तथा कृषि-पशुपालन आधारित समाज-संस्कृति का केन्द्र हमेशा गाँव ही रहा है। यह मानव और निसर्ग के व्यापार का स्थान है। यहाँ जीव-जन्तु और वनस्पति के साथ सीमित जरूरतों वाले पारस्परिक आदान-प्रदान वाले सहजीवन की धारणा विकसित हुई है। वहीं दूसरी तरफ, आधुनिक सभ्यता की देन शहर नैतिकता, पर्यावरण और समग्र चेतना के मापदंड पर कितने लायक हैं, यह कोई छिपी बात नहीं है।
ग्राम्य जीवन स्थानीय जलवायु, भौगोलिकता और पर्यावरण पर आश्रित होता है। रेतीले धाेरों से लेकर हिमालय की घाटियों तक, समुद्र के किनारों से लेकर समतल मैदानों तक, हर क्षेत्र अपनी जमीन, अपनी आबो-हवा के अनुरूप गाँव की रचना करते हैं। प्रकृति के साथ यह सहजीवन का भाव ही अनुपम मानवीय भावों का प्रेरक होता है। भगवद् प्राप्ति का चरम बिन्दु का दर्शन जो रसरूपा भक्ति में होता है, प्रेम की उत्कृष्टतम भावना ‘तत्सुख सुखित्वं’, वह ब्रज के गाँव में ही अवतरित होती है। ब्रज-वनिताओं का कान्त-भाव, गोप सखाओं का सख्य, यशोदा, नन्द आदि गोपों का वात्सल्य, ऋषि-मुनियों का शान्त और भक्तों का दास्य भाव जिस चरम अनुभूति को स्पर्श करता है, उसका आधार सदाचार नीति-सम्पन्न ग्राम्य-परिवेश है। गहन वन का ब्रह्म बोध चिन्तन या नगरों में होने वाले विशाल सोम, राजसूय और वाजपेयादि श्रौत याग सर्वसामान्य को इस सहजता से परम सत्य का, समग्रता का अनुभव कराने में अक्षम रहे हैं।
वास्तव में भक्ति का राजमार्ग इसी सहजता से होकर गुजरता है। ब्रज के ग्राम सुलभ आकर्षण में राधा-माधव ऐसे बँधे रहते हैं कि ब्रज छोड़कर कहीं जा ही नहीं पाते। इसीलिए मथुरा, द्वारका, इन्द्रप्रस्थादि नगरों में रहते भी चतुरशिरोमणि नागर ब्रज के ग्राम्यजीवन से विरह के अनुताप में आँसू बहाते हैं। उस प्रेममय जीवन की स्मृति से उनके श्रीअंग विगलित हो जाते हैं, तो वह पतितपावन स्वरूप जगन्नाथ के रूप में फिर वहाँ प्रकट हो जाते हैं। अब भले ही पंडित तर्कों से लाख सिद्ध करते रहें कि श्रीकृष्ण ब्रज से जाने के बाद कभी लौटे नहीं। या फिर श्रीमद्भागवत की श्रीकृष्ण लीला में उनकी आह्लादिनी शक्ति राधा की रहस्यमय अनुपस्थिति उन्हें अनिद्राग्रस्त कर दे। पर इसके बाद भी धर्म नीति एक पूर्णता की सृष्टि करती जाती है। परवर्ती काल की सम्पूर्ण परम्परा कई तथाकथित मिथकों के असत् को एकमात्र सत् पदार्थ प्रेम से भरकर चित्र पूरा कर देती है।
सो, गाँवों के मूल स्वरूप और समग्र मूल्यों की रक्षा में ही हमारे सनातन धर्म और संस्कृति का अस्तित्त्व है। गौ-पालन, कृषि-वाणिज्य आदि कर्म के पीछे की नैतिकता हमारी विशिष्टता है, जो विश्व की सभी परम्पराओं में अद्वितीय है। और शास्त्रीय दृष्टि से भी देखें तो क्षेत्र का अधिशेष ही नगर के रूप में विकसित होता है। वन, ग्राम, कस्बों के उत्पादों के विनिमय से उत्पन्न होने वाला अधिशेष जिस संरचना को जन्म देता है वह नगर होता है। ग्राम्य लोक के विशेष गुणों का संश्लेषण नागरी संस्कृति में होता है। यह जो अभिजात्यता है, उसे यदि धर्म की मर्यादा न रहे तो नागरी संस्कृति शारीरिक, चारित्रिक अशक्तता का कारण बनती है। गाँवों के सामासिक अभिवृद्धि नगर बनते हैं। उत्पाद और सेवाओं के विविध अधिशेषों का जो अपना चक्र गतिमान होता है, वह नगर को विशिष्ट बल और प्रभाव देता है।
चूँकि नगर का आकर्षण प्रबल होता है। उसका स्फुर्लिंग एक स्वच्छंदता की ओर प्रवाहमान होता है। इसीलिए उसे मर्यादा देना प्रधान राजधर्म होता है। पुरुषोत्तम श्रीराम जिस धर्मशास्त्र वर्णित वर्णाश्रम की स्थापना अपने जीवन में दिखाते हैं, वह वस्तुत: समग्र चेतन-अचेतन पदार्थों में कृतज्ञता आप्लावित आदान-प्रदान की दृष्टि से उपजा विधान है, जिसका दर्शन आरण्यक चिन्तन में मिलता है, जो तत्कालीन ग्राम्य जीवन में संस्कृति के रूप में दिखता है और राष्ट्र और धर्म की मर्यादाओं के रूप में स्थापित हो जाता है। गाँव और नगर के इस स्वरूप में ही मानव सभ्यता का भविष्य है।
तो गाँवों की ओर वापस लौटने की अभिलाषा कोई पलायन नहीं है। यह मानव क्रम-विकास के एक विक्षिप्त विकास से हटकर उसके सही मार्ग पर लगने की कामना है।
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(समीर पाटिल #अपनीडिजिटलडायरी के सुधी-सदस्यों में से हैं। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। मध्य प्रदेश के ही रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि रखते हैं। और डायरी के पन्नों पर लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराया करते हैं।)
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