पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों का अपना संगीत होता है, समय निकालकर सुनिएगा ज़रूर!

टीम डायरी

संगीत इस सृष्टि की प्राचीनतम भाषा है। जानकार बताते हैं और सनातन ग्रन्थों में भी ऐसा उल्लेख है कि सृष्टि के विकास-क्रम में सबसे पहले एक ब्रह्मनाद हुआ था। वह ब्रह्मनाद संगीत के तीन सुरों- ‘सा’, ‘ग’, ‘प’ में निबद्ध था। यही ब्रह्मनाद ‘ओंकार’ कहलाया। इस ओंकार के प्रभाव से ही सृष्टि में लय आई और फिर उस लय के साथ प्रकृति ने गति पकड़ी। जीवन के विकास का क्रम चला। हालाँकि तर्क-वितर्क और तथ्यों की कसौटी पर हर बात को कसने वाले इस तथ्य को ख़ारिज कर सकते हैं। इस पर सवाल खड़े कर सकते हैं। अलबत्ता कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों के निष्कर्ष भी हैं। उनसे शायद इस क़िस्म के लोगों के सवाल शान्त हो सकें।

मसलन अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ता हैं जेफरी जिंग। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले एक ख़ास पक्षी ‘बुचरबर्ड’ की आवाज़ में संगीत के सुर ढूँढ निकाले। उन्होंने वॉयलिन बजाने वाली संगीतकार हॉलिस टेलर को अपने साथ लिया और ऑस्ट्रेलिया के रेगिस्तानी इलाक़ों में जाकर इस पक्षी पर अध्ययन किया। अध्ययन के दौरान हॉलिस टेलर ने अलग-अलग मौक़ों पर निकाली गई इस पक्षी की विभिन्न ध्वनियों का संगीत के सुरों के साथ सटीक साम्य स्थापित किया। इसी तरह न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में एक शोधकर्ता हैं टीना रोस्की। वे पक्षियों के गीत-संगीत की विशेषज्ञ हैं। वह पश्चिमी संगीत की एक चर्चित धुन ‘इन द हॉल ऑफ माउंटेन किंग’ का उदाहरण देती हैं। यह धुन उसी तरह धीमे से तेज होती है, जैसे बुलबुल गाती है।

इन उदाहरणों को और अच्छे से समझना चाहें तो यूट्यूब की मदद ली जा सकती है। ‘बर्ड सॉन्ग’, ‘बर्ड सॉन्ग सिम्फनी’, ‘बर्ड सॉन्ग ऑर्केस्ट्रा’ आदि की-वर्ड से ढूँढ़ने पर वहाँ हजारों वीडियो मिलेंगे। और करोड़ों लोग इन वीडियो को पसन्द और साझा करने वाले भी। इनके जरिए पक्षियों के कलरव, उनकी चहचहाहट में संगीत के सुकून को ख़ुद महसूस किया जा सकता है। 

ऐसे ही, पशुओं की विभिन्न ध्वनियों पर ग़ौर करें तो उनमें भी संगीत की अनुभूति मिलती है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में बड़े ख्यात गायक हुए हैं, पंडित ओंकरनाथ ठाकुर जी। उन्होंने अपने संगीत में ‘काकु प्रयोग’ नामक सौन्दर्य-शिल्प के माध्यम से यह सिद्ध किया है। उनकी शिष्या वरिष्ठ वॉयलिन वादक एन राजम आज भी ‘काकु प्रयोग’ के इस सौन्दर्य-शिल्प की झलक अपने संगीत में श्रोताओं को दिखाया करती हैं।

इसी तरह, अमेरिका के लॉस एंजिलिस के एक कारोबारी हैं जो पैटिटुसी। वह ख़ुद संगीतकार भी हैं। इन्होंने बीते दिनों एक छोटा सा उपकरण बनाया, जो बहुत बारीक़ सी ध्वनि तरंगों को भी पकड़ लेता है। इस उपकरण में दो तार होते हैं और एक छोटा सा स्पीकरनुमा यंत्र। इस उपकरण के माध्यम से पैटिटुसी ने छोटे-बड़े कई पौधों की ध्वनियों को सुना और दुनिया को सुनवाया भी। उन्होंने बाक़ायदा इसका एक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर ज़ारी किया। इसे दुनियाभर के करोड़ों लोगों ने देखा। इस तरह उन्होंने साबित किया कि विभिन्न परिस्थितियों में छोटे-बड़े सभी तरह के पौधे भी ध्वनियाँ निकालते हैं, जो सांगीतिक होती हैं। इस वीडियो को भी नीचे देख सकते हैं। 

इन तमाम उदाहरणों से सिद्ध है कि संगीत इस सृष्टि की प्राचीनतम भाषा है। क्योंकि पेड-पौधे, पशु-पक्षी जैसी प्रकृति की आदि-कृतियों की ध्वनियाँ मूल रूप से सांगीतिक हैं। हमारे आस-पास चौतरफ़ा यह संगीत बिखरा है। हमें नि:शुल्क शान्ति बाँटने को तत्पर है। फिर भी हम उसे सुन नहीं पाते। क्यों? क्योंकि प्रकृति के साथ हमारा तादात्म्य टूट रहा है। टूट चुका है। और इसीलिए हम भी तिनका-तिनका बिखर रहे हैं। हालाँकि वक़्त है अब भी। हम ख़ुद को फिर समेट सकते हैं। लेकिन उसके लिए हमें प्रकृति के साथ तादात्म्य बिठाना होगा। उसका संगीत सुनना होगा।

सोशल मीडिया पर शेयर करें
Neelesh Dwivedi

Share
Published by
Neelesh Dwivedi

Recent Posts

56 साल के ‘युवा’ सत्ता के लिए आग भड़का रहे और 28 साल के देश को नई ऊँचाई दे रहे!

अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More

2 hours ago

वंदेमातरम

जय जय श्री राधे Read More

1 day ago

‘सरल भक्तमाल’- 11..: तर्क कोई कितने भी दे, वैष्णव भक्ति के मूल सम्प्रदाय तो चार ही हैं!

कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More

3 days ago

फिल्म ‘थ्री इडियट’ के फुनसुक वाँगड़ू नहीं हैं सोनम वाँगचुक, फिर भी ऐसा प्रचार क्यों?

शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More

4 days ago

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल ने अंग्रेजी को ‘विदेशी भाषा’ कह दिया, तो हाय-तौबा क्यों?

भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More

5 days ago

जिन्हें सच्ची खुशी की तलाश, वे आईआईटी प्रवेश परीक्षा में जानबूझकर फेल भी हो जाते हैं!

जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More

6 days ago