अफ़सर रिश्वत ले रहे, कोई बात नहीं; पर पकड़ में क्यों आ रहे?

ए. जयजीत, भोपाल, मध्य प्रदेश से, 23/9/2021

वैसे तो ऐसे नाक़ारा देशभर में मिल जाएँगे, लेकिन इन दिनों मध्य प्रदेश में ये कुछ ज़्यादा ही पाए जा रहे हैं। अख़बार आए दिन ऐसे नाक़ारा लोगों की ख़बरों से भरे पड़े हैं। जिधर देखो, उधर कोई न कोई छोटा-बड़ा अफ़सर रिश्वत लेते पकड़ में आ रहा है। खलबली मची हुई है। पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लग रहे हैं। अब जितने मुँह, उतनी बातें…

“वाक़ई बड़ी शर्म की बात है। ऐसे ही लोगों की वज़ह से हमारी पूरी बरादरी बदनाम हो जाती है।” 

“और देखिए, जो पकड़ में आ रहे हैं, उनके चेहरों पर शर्म का क़तरा तक नहीं। कल टीवी पर देख रहा था। पकड़ में आने के बाद भी मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। शर्म तो मानो बेच ही डाली।”

“सही कह रहे हैं आप। भाईसाहब, उन्हें देखकर मुझे शर्म आ रही थी। सोच रहा था, वाक़ई हम कैसे-कैसे बेशर्म और नाक़ारा लोगों के बीच काम करते हैं। ढंग से रिश्वत तक नहीं ले सकते। छी…” 

“सुना है, सरकार ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ सीआईडी जाँच बैठा रही है, जो रंगे हाथों पकड़ में आ रहे हैं!” 

“सीआईडी-वीआईडी जाँच बैठाने का मतलब नहीं। मैं तो कहता हूँ, ऐसे लोगों को सीधे लतिया देना चाहिए। काम करने लायक ही नहीं हैं स्साले।” 

“भाई साहब, जाँच तो होने दीजिए। एक बार जाँच हो जाए, फिर देखिए बड़े भी नपेंगे। आख़िर पूरा सिस्टम खराब तो बड़े लोगों की वज़ह से ही हुआ है न?” 

“हाँ, बात तो तुम्हारी भी सही है। अब कल ही बड़े साहब मुझे पार्टी से सीधे मिलने का कह रहे थे। कह रहे थे ड्राइवर को लेकर चले जाओ। अब बताओ, सरकार ने ऐसे अनाड़ी अफ़सर भर रखे हैं। पूरे सिस्टम की वाट लगाने पर तुले हुए हैं। मैंने तो साफ़ मना कर दिया।”

“इसीलिए, जाँच तो होनी ही चाहिए। बल्कि मैं तो कहता हूँ, सरकार को पूरा जाँच आयोग ही बैठा देना चाहिए। आख़िर पता तो चले कि सिस्टम में लूपहोल कहाँ हैं? ग्राउंड में लोग इतनी आसानी से पकड़ में कैसे आ रहे हैं?”

“हाँ, कल अपने मुख्यमंत्रीजी भी चिन्तित दिख रहे थे। उनका दर्द ज़बान पर ही आ गया। बोल दिया, “मंत्रालय में बैठ जाओ तो अफ़सर ऐसी रंगीन पिक्चर दिखा देते हैं कि सब जगह आनन्द ही आनन्द है। लेकिन बाहर फील्ड में उतरो तो हक़ीक़त पता चलती है।”

“अच्छा, ये सीएम साहब ने कहा? हम तो उसी दिन कह रहे रहे थे न कि ग्राउंड में उतरो तब ही ऐसे नाक़ारा लोग नज़र आते हैं। चलो, देर आयद, दुरुस्त आयद। अब सीएम साहब चिन्तित हैं, तो कुछ तो होगा ही।” 

“हाँ भाई, मामला राज्य की इज्ज़त से जुड़ गया है। ऐसे मामलों से पूरे राज्य के विकास के दावों की पोल खुल जाती है। अच्छा, करोड़ों का मामला हो और पकड़ में आ जाए, तब भी ठीक है। इज्ज़त ही बढ़ती है। लेकिन अब देखो, कोई एक लाख में ही धरा जा रहा है, कोई 20 हज़ार के लिए बिछ रहा है। टुच्चईपना की भी हद है। यह केवल हमारा नहीं, पूरे राज्य का अपमान है। विकास के इतने बड़े-बड़े दावे और ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और!”  

“वैसे जो लोग पकड़ में आ रहे हैं, उनके बारे में एक सर्वे आया है। सर्वे कहता है कि पकड़ में आने वाले 75 परसेंट लोग वे होते हैं, जो पहली कोशिश करते हैं।”

“तो स्सालो, नौकरी ज्वाइन करने से पहले जब ट्रेनिंग हो रही होती है, तब क्या ऊँघते रहते हो। यही मेन चीज नहीं सीखेंगे तो ऐसा होगा ही। हमारी नाक कटेगी और राज्य की भी।”

“चलो, ट्रेनिंग में न सीखो, कोई बात नहीं। पर जब फील्ड में आ गए तो हमारे जैसे अनुभवी लोगों से ही पूछ लो। हम क्या मना कर देंगे! एक तो कुछ आता नहीं और एटीट्यूड आसमान पर। मैंने तो ऐसे-ऐसे नए लौंडे देखे कि उन्हें पहला नियम भी नहीं मालूम कि बाएँ हाथ से लो तो दाएँ को भी पता नहीं चलना चाहिए।”

“तो आप अब भी बाएँ हाथ से लेते हैं क्या? वैसे, बाएँ हाथ से लेना ठीक नहीं है। हाथ बदल लीजिएगा। शगुन अच्छा नहीं होता। हम लेफ्टहैंडर हैं, लेकिन हमेशा दाएँ से ही लेते हैं।” 

(बरादरी और राज्य की चिन्ता से चली चर्चा अब व्यक्तिगत स्तर पर उतर आई है)

“हमारा ऐसे अन्धविश्वासों में कोई भरोसा नहीं है। प्रगतिशील विचारधारा के हैं हम। वैसे, हाथ से लेने का सिस्टम आप बदल डालिए। किसी दिन लपेटे में आ जाएँगे, बताए देते हैं। हमने तो बदल लिया है। लेफ्ट-राइट का कोई चक्कर ही नहीं रखा। मैंने तो केवल समझाने के लिए मुहावरा कहा था।” 

“अरे नहीं, हम नौसिखिया हैं क्या! अच्छे-अच्छे को सिखाया है हमने। दीवारों पर टँगे अवॉर्ड ऐसे ही मिल गए क्या!” 

“वो ठीक है, पर ऐसे मामलों में ओवर कॉन्फिडेंस अच्छा नहीं है। ज़रा सी लापरवाही में पूरे राज्य की नाक कटते देर नहीं लगती।” 
——
(ए. जयजीत देश के चर्चित ख़बरी व्यंग्यकार हैं। उन्होंने #अपनीडिजिटलडायरी के आग्रह पर ख़ास तौर पर अपने व्यंग्य लेख डायरी के पाठकों के उपलब्ध कराने पर सहमति दी है। वह भी बिना कोई पारिश्रमिक लिए। इसके लिए पूरी डायरी टीम उनकी आभारी है।)

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