सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
प्लास्टिक के कारण हर साल विश्व को 131 लाख करोड़ रुपए (1.50 लाख करोड़ डॉलर) से अधिक का नुकसान हो रहा है। इसके बावजूद अमेरिका ओर उसके जैसे कुछ देश चाहते हैं कि प्लास्टिक का उत्पादन न रुके। अमेरिका ने इस सम्बन्ध में बाकायदा एक पत्र भी लिखा है। इसमें प्लास्टिक के उत्पादन को प्रतिबन्धित करने या चरणबद्ध तरीके से कम करने के किसी भी वैश्विक प्रयास का विरोध करने की मंशा जताई है।
अभी हाल ही में चिकित्सा क्षेत्र की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘लैन्सेट’ में एक अध्ययन के निष्कर्ष प्रकाशित किए गए। यह अध्ययन दुनियाभर के अग्रणी चिकित्सकों और शोधकर्ताओं ने किया है। इसके अनुसार, राेजमर्रा के मानवजीवन में प्लास्टिक के दिनों-दिन बढ़ते उपयोग के कारण तमाम बीमारियों का खतरा भी बढ़ा है। क्योंकि प्लास्टिक हवा, पानी, मिट्टी, आदि में हर जगह सिर्फ प्रदूषण का कारण बन रहा है। इससे कई बीमारियाँ पैदा हो रही हैं। इन बीमारियों के इलाज पर पूरे विश्व में 131 लाख करोड़ रुपए हर साल खर्च करने पड़ रहे हैं। यानि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बोझ है, जिसे प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध के कानून और सख्त नीतियों से ही कम किया जा सकता है।
प्लास्टिक के इस खतरे से दुनिया के सभी देश चिन्तित हैं। इसीलिए स्विट्जरलैण्ड की राजधानी जेनेवा में 180 देशों के प्रतिनिधि इकट्ठा हुए हैं। वे मिलकर इस पर विचार कर रहे हैं कि प्लास्टिक के दैनिक उपयोग को किस तरह नियमित और नियंत्रित किया जाए। चरणबद्ध तरीके से इसका उत्पादन घटाकर, उत्पादन पर सीधे प्रतिबन्ध लगाकर, प्लास्टिक उत्पादों के निस्तारण की प्रभावी नीति बनाकर, या कैसे? इस बाबत जो सूचनाएँ आ रही हैं, उनकी मानें तो 180 में से 106 देश चाहते हैं कि प्लास्टिक का उत्पादन चरणबद्ध तरीके से घटाया जाए और धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म कर दिया जाए। हालाँकि, रूस, चीन, साऊदी अरब, ईरान, जैसे दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देश ऐसा नहीं चाहते। कारण कि पेट्रोकैमिकल उद्योग में प्लास्टिक का उपयोग बड़े पैमाने पर होता है।
इसमें ‘रोचक-सोचक’ बात यह कि भारत की स्थिति इस मामले में दुविधाभरी नजर आती है। भारत यह तो चाहता है कि प्लास्टिक कचरे के प्रभावी निस्तारण की व्यवस्था हो, ताकि हानिकारक जानलेवा बीमारियों से लोगों को बचाया जा सके।हवा, मिट्टी, पानी के प्रदूषण से मुक्ति मिले। लेकिन वह प्लास्टिक के उत्पादन पर चरणबद्ध तरीके से या पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं चाहता। उसने इस बाबत अपना रुख दर्ज भी करा दिया है। बावजूद इसके कि प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण में योगदान देने वाला भारत दुनिया का पाँचवाँ प्रमुख देश है। जानकार बताते हैं कि भारत की दुविधा इसलिए है क्योंकि वह पेट्रोकैमिकल क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाकर अपनी अर्थव्यवस्था को गति देना चाहता है। ऐसे में, अगर प्लास्टिक उत्पादन पर प्रतिबन्ध की कोई वैश्विक सन्धि हुई तो वह उसे मानना होगी। उसे लागू करने के लिए नीति-नियम सम्बन्धी जरूरी इंतजाम करने होंगे और इससे पेट्रोकैमिकल क्षेत्र प्रभावित होगा।
दूसरी तरफ, अमेरिका की स्थिति तो ‘सोचक’ है। उसने तो प्लास्टिक के उत्पादन पर प्रतिबन्ध लगाने के वैश्विक प्रयास का खुला विरोध ही कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन की ओर से जेनेवा सम्मेलन से ठीक पहले एक चिट्ठी कई देशों को भेजी गई है। बीती 25 जुलाई की तारीख को जारी इस चिट्ठी में लिखा है, “प्लास्टिक उत्पादन पर प्रतिबन्ध या उसे चरणबद्ध तरीके से कम करने के किसी भी अव्यावहारिक वैश्विक प्रयास का हम समर्थन नहीं करेंगे। इसलिए कि प्लास्टिक के उत्पाद हमारे दैनिक जीवन में हर जगह, लगातार इस्तेमाल हो रहे हैं और ऐसे प्रयासों से प्लास्टिक उत्पादों की लागत बढ़ जाएगी।”
सो, अब इसी सिलसिले में एक और ‘रोचक’ जानकारी जोड़ लेते हैं। यह कि प्लास्टिक का हल्के-फुल्के रूप में उपयोग तो मानवजीवन में 1600 ईसापूर्व के आस-पास से हो रहा है। मतलब आज से 4,000 साल पहले से। लेकिन शुरू में यह उपयोग सीमित था, सिर्फ गेंंदें या ऐसे कुछ उत्पाद बनाने तक। मगर बेल्जियम मूल के एक वैज्ञानिक लियो एच बैकलैण्ड ने जुलाई 1907 में प्लास्टिक का ऐसा स्वरूप तैयार कर दिया, जिससे वह घर-घर में इस्तेमाल हो सके। उन्होंने तब कहा भी था, “मेरा यह आविष्कार भविष्य में बहुत अहम साबित होने वाला है।” उनकी बात सही भी निकली। चाहे उपयोग के लिहाज से हो, या प्रदूषण फैलाने के मामले में, प्लास्टिक अपनी अहम भूमिका तो निभा रहा है! लेकिन क्या यह जानते हैं कि ये बैकलैण्ड साहब किस देश के नागरिक थे? अमेरिका के।
सो अब इन तथ्यों और जानकारियों का जो जैसा आकलन या विश्लेषण करना चाहे, कर सकता है!!
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