प्रतिनिधि तस्वीर
टीम डायरी
अब तक कहा जाता था कि इंसानी गतिविधियों के कारण वातावरण में जहरीली गैसों (ग्रीन हाउस गैसें) की मात्रा बढ़ी है। इसी कारण धरती का तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) बढ़ा है, जिससे जलवायु परिवर्तन की स्थिति बनी है। यद्यपि इसके साथ ही दिलासा दी जाती रही कि पूरे विश्व में कई जगहें ऐसी हैं, जहाँ आज भी घने जंगल बहुतायत हैं। ये जंगल जहरीली गैसें सोख लेते हैं। इस तरह स्थिति थोड़ा सँभाल लेते हैं। ऐसे घने जंगलों में अफ्रीका के वनों को ऊपरी क्रम में रखा जाता था। जहरीली गैसों को सोख लेने की उनकी खासियत के कारण ही उन्हें ‘धरती के फेंफड़े’ कहा जाने लगा। अफ्रीकी जंगलों में कांगो के वनों को ‘अफ्रीका के फेंफड़े’ की संज्ञा दी जाने लगी। अपेक्षा की गई कि इस तरह के जंगलों को बचा लिया, तो हालात बहुत जल्दी और हद से ज्यादा बिगड़ने से बच जाएँगे।
लेकिन जैसा कि श्री रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कह गए हैं, “जाको प्रभु दारुण दुख देहीं। ता की मति पहले हर लेहीं।।” तो वैसी ही बात इंसानी जमात के साथ हो गई है। भगवान ने उसकी बुद्धि हर ली है। विवेक पूरी तरह शून्य कर दिया है। इसी कारण तो इंसानों ने जंगलों को बचाने के बजाय उन्हें ही बेतहाशा काटा और उनमें भी जहर भर दिया। या दूसरे शब्दों में कहें तो ‘धरती के फेंफड़ों’ को भी जहरीला कर दिया। सो अब इसका नतीजा भुगतने के बारी आ चुकी है। अभी कोई महीना भर पहले एक वैश्विक शोध अध्ययन की रपट सार्वजनिक हुई है। इसमें बताया गया है कि ‘धरती के फेंफड़े’ यानि अफ्रीकी जंगल अब ‘जहर’ अर्थात् जहरीली गैसों को सोखते कम और फैलाते ज्यादा हैं। क्यों? क्योंकि इंसानी बेवकूफियों ने उनकी क्षमता कम कर दी है।
इंग्लैण्ड के लीसेस्टर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक हैइको बाल्टर इस अध्ययन में शामिल रहे हैं। उनके मुताबिक, “अफ्रीकी जंगलों जैसे ऊष्णकटिबन्धीय वनों को बचाने की तत्काल जरूरत है। अन्यथा बहुत देर हो जाएगी और हम हाथ मलते रह जाएँगे।” यहीं बता दें कि ऊष्णकटिबन्धीय वन भूमध्य रेखा के पास पाए जाते हैं। ये बहुत ही घने होते हैं। गर्म तथा नमी वाली जलवायु में होते हैं। जहाँ होते हैं, वहाँ बहुत अधिक बारिश होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के कारण ये जंगल जहरीली गैसों को भी सोख लेते हैं। पर खुद को ‘धरती का सम्पूर्ण कर्ता-धर्ता’ समझने वाला इंसान इन जंगलों को बचाने के बजाय इन्हें ही काटने-छाँटने में लगा है। हालाँकि ऊपर-ऊपर से वह इन जंगलों के संरक्षण की योजनाएँ भी बनाता है। लेकिन वास्तव में संरक्षण जैसा कुछ करता नहीं है। इसका भी प्रमाण है।
जानकारी के मुताबिक, ऊष्णकटिबन्धीय वनों के संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर एक निकाय बनाया गया है। इसका नाम है, ‘ब्राजील्स ट्रॉपिकल फॉरेस्ट फॉरएवर फैसिलिटी’। इस निकाय के माध्यम से 100 अरब अमेरिकी डॉलर उन देशों को दिए जाने हैं, जिनमें ऊष्टकटिबन्धाीय वनों का दायरा अधिक पाया जाता है। इस उद्देश्य से कि ये देश अपने जंगलों का संरक्षण-संवर्धन कर सकें। लेकिन अब तक 6.5 अरब अमेरिकी डॉलर की धनराशि ही सम्बन्धित देशों को वितरित की गई है। मतलब ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ के बराबर।
इसीलिए ऊपर लिखा है…“अंत समय की करो तैयारी…”!!
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