सांसद मेधाताई कुलकर्णी, जिनके पास सच कहने का साहस है और सलीका भी!

अभिलाष खांडेकर, भोपाल, मध्य प्रदेश

राजनेताओं को मैं आमतौर पर बहुत पसन्द नहीं करता, लेकिन आज मैं यहाँ एक ‘छोटी’ राजनेता की प्रशंसा में लिख रहा हूँ। पिछले 75 वर्षों में, स्वतंत्र भारत ने राजनेताओं के हर रंग और रूप देखे हैं, और यह भी कि सत्ता में आने के बाद वे आम जनता के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। कई दशकों से राजनीति को नजदीक से देखने पर और अपने व्यक्तिगत अनुभव से मुझे लगता है कि हमारे नेताओं की समग्र गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है। गुणवत्ता से मेरा तात्पर्य मोटे तौर पर उनकी ईमानदारी, व्यक्तिगत व्यवहार, विद्वता, समाज के वास्तविक कल्याण को आगे बढ़ाने में रुचि और सार्वजनिक संस्थानों के निर्माण और उनकी संरक्षण की क्षमता से है। नेताओं के खाने के व दिखाने के दाँत अलग-अलग होते है।

जिस जटिल राजनीतिक व्यवस्था में हम रहते हैं, उसमें एक सांसद के पास सामान्यतः सीमित राजनीतिक शक्तियाँ होती हैं। संसद के दोनों सदनों में से किसी एक का सम्मानित सदस्य होने के नाते उसे ‘विधि निर्माता’ माना जाता है, लेकिन इस उद्देश्य में उसका कितना योगदान होता है, इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। सांसदों को कई सुविधाएँ मिलती हैं और वे अपने कार्यकाल के दौरान आम तौर पर एक अच्छा जीवन जीते हैं, लेकिन उनकी असली ताकत या लोकप्रियता उन लोगों (मतदाताओं) की अनगिनत समस्याओं का समाधान करने में निहित है, जो उन्हें ‘माननीय’ सांसद बनाने के लिए बहूमूल्य वोट देते हैं।

लोकसभा के सदस्य सीधे पाँच साल के लिए चुने जाते हैं, जबकि उच्च सदन (राज्यसभा) के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से – अपनी पार्टी के संख्याबल पर – छह साल के लिए चुने जाते हैं। उनका प्राथमिक कार्य कानून बनाना है, फिर भी उनसे सैकडों अन्य कार्यों को पूरा करने की अपेक्षा की जाती है – जैसे कि नालियों या सड़कों को दुरुस्त करवाना, स्थानांतरण की सिफारिश करना, विद्यालय/महाविद्यालय में प्रवेश में मदद करना और एफआईआर दर्ज करवाना (या दर्ज न करवाना), इसके अलावा स्थानीय क्षेत्र के विकास कार्य और आम आदमी के लिए दिक्कतें खड़ी करने वाली राजनैतिक रैलियाँ आयोजित करना आदि, इत्यादि।

खैर, मैं जिस राजनेता के बारे में लिख रहा हूँ, वह इस सबसे बिलकुल अलग दिखती हैं। उन्होंने गरबा उत्सव के दौरान सार्वजनिक स्थानों पर शोरगुल रोकने के लिए दमदारी से आवाज उठाई है। आप हैं पुणे की मेधाताई कुलकर्णी। पुणे के एक इलाके में लगातार बढ़ते ध्वनि प्रदूषण से जूझ रहे नागरिकों की मदद के लिए उनके सारे कानूनी-प्रशासनिक प्रयास विफल होने के बाद, उन्होंने अपनी ही पार्टी की सरकार और उसके अंग, यानी पुलिस, के खिलाफ आवाज उठाई है। मैंने सोशल मीडिया पर उनके साहसिक कदम और फिर एक मराठी समाचार चैनल पर उनके साक्षात्कार को देखा और सचमुच यह देखकर हैरान रह गया कि उन्होंने बुजुर्गों और गम्भीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए इतना अच्छा रुख अपनाया।

गरबा संगीत बजाने वाले ध्वनि विस्तारकों (लाउडस्पीकरों) ने सारी हदें पार कर दी थीं। इससे कॉलोनी के आसपास के वरिष्ठ नागरिकों को भारी परेशानी हो रही थी। लेकिन पुणे पुलिस ने किसी की एक न सुनी। तब सांसद महोदया को ‘गरबा’ रोकने के लिए धमकी देना पड़ी। संस्कृति के नाम पर बढ़ते ध्वनि प्रदूषण और ‘डीजे’ द्वारा अभद्र गीतों के जरिए युवाओं को गुमराह करने की कोशिशों से राज्यसभा की यह साहसी सदस्य वाजिब तौर पर परेशान थीं। उन्होंने नवरात्रि जैसे त्यौहारों पर सार्वजनिक समारोहों की पारम्परिक मौलिकता की रक्षा के लिए एक व्यापक अभियान शुरू करने की चेतावनी दी है, जिसे मैं भी जरूरी समझता हूँ। जनहित में अपनाए गए कड़े रुख के कारण मेधाताई रातों-रात सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हो गई हैं। भाजपा शायद नाराज होगी, उनसे।

गुजराती समाज का नवरात्रि उत्सव ‘गरबा’ अब सभी राज्यों में फैल गया है, किन्तु वह अपने साथ कुछ बुराइयाँ भी लेकर आया है। गणेश उत्सव, जो कभी महाराष्ट्र से जुड़ा था और लोकमान्य तिलक द्वारा एक महान उद्देश्य से शुरू किया गया था, भी अब दूसरे राज्यों में फैल गया है। यहाँ मुद्दा जनता की असुविधा और अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण का है न कि त्योहारों को मनाने का। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश रोहिंटन नरीमन ने ध्वनि प्रदूषण के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए सभी धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकरों पर देशव्यापी प्रतिबन्ध लगाने की माँग की थी। क्या वह गलत है? प्रसिद्ध न्यायविद ने शोर को कम करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकारों का हवाला दिया था- चाहे वह मन्दिरों से हो या मस्जिदों से। क्या सरकार में किसी जिम्मेदार ने इस पर ध्यान दिया?

पुणे का मामला थोड़ा अलग है। सांसद कुलकर्णी ने पुलिस अधिकारियों को फोन किया था, जिनका काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना था। पीड़ित व्यक्तियों की बार-बार शिकायतों के बावजूद, पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने मेधाताई द्वारा की जाने वाली शिकायतों को भी नजरअंदाज कर दिया। दुर्भाग्य से, सरकारें और चुनिंदा सांस्कृतिक संगठन आज लोगों को ऐसे धार्मिक समारोहों में भीड़भाड़ में धकेल रहे हैं, जिनमें डीजे और तेज, बहुत तेज स्पीकर जैसे अनिवार्य हो। सरकारी नियम शोर के स्तर को निर्धारित करते हैं, लेकिन जिलाधीश या पुलिस अधीक्षक धार्मिक समूहों के खिलाफ कार्रवाई करने से अब डरते हैं।

गरबा के बारे में, ऐसा सन्देह है कि कुछ शक्तिशाली स्वार्थी समूह पूरे भारत में इस संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर तो मुम्बई एयरपोर्ट पर भी गरबा के दृश्य देखे गए। इसकी इजाजत किसने दी? इससे सभी को जरूर गुस्सा आना चाहिए! बढ़ते सामाजिक शोरगुल और त्योहारों को प्रदूषित करने की इस पृष्ठभूमि में, मेधाताई कुलकर्णी की खुली भूमिका वाकई सराहनीय है। भाजपा नेता ने बिलकुल ठीक काम किया है। अब सभी सही सोच रखने वाले लोगों और सामाजिक संगठनों को उनका खुला समर्थन करना चाहिए क्योंकि उन्हें बुजुर्गों और युवाओं, दोनों की चिन्ता है। संकृति को गलत रास्ते जाने से रोकने का प्रयास किया है। वे एक जिम्मदार जनप्रतिनिधि के रूप में अपना कर्तव्य निभा रही हैं। हमें भारत में मेधाताई जैसे और भी कईं नेताओं, सांसदों की सख्त जरूरत है जो सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखते हों और सलीका भी। तभी समाज सुधार सम्भव हो सकेगा। 

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(नोट : लेखक मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर जैसे देश के शीर्ष अखबारों में सम्पादक रह चुके हैं। उनका यह लेख उनकी सहमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है।) 

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