सांकेतिक तस्वीर
नीलिमा समीर पाटिल, भोपाम मध्य प्रदेश
महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के एक गाँव की सच्ची कहानी है यह। इस गाँव में जहाँ से खेत शुरू होते हैं और उनसे लगकर आसमान ठहरा-सा महसूस होता है, वहाँ कभी रामभाऊ पाटिल का घर होता था। मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत, आँगन में एक नीम का पेड़, और उसकी छाँव तले बँधे दो बैल- धवल्या और पवल्या। रामभाऊ किसान थे। यों तो किसान इस धरती पर लाखों हैं, लेकिन रामभाऊ में कुछ और ही बात थी। वह बड़े संवेदनशील इंसान थे और उनकी दुनिया उसी संवेदना से प्रेरित सरल दृष्टि से चलती थी। और उनकी दुनिया में उन बैलों की भी खास जगह थी।
खेती-किसानी की वजह से रामभाऊ का अधिकांश समय उन दो बैलों के साथ ही गुजरता था। धवल्या सफेद था- दूध जैसा, चाँद जैसा और पवल्या हल्का पीला-सा था, मुँगाई जैसे रंग का। दोनों खिल्लारी नस्ल के ऊँचे-तगड़े बैल थे, लेकिन स्वभाव से सीधे और बेहद वफादार। जैसे भगवान ने उन्हें रामभाऊ के लिए ही बनाया हो। रामभाऊ का एक नियम था- अटल और अटूट कि चाहे व्यस्तता कितनी भी हो, वक्त चाहे रात का ही क्यों न हो, थकान से हड्डियाँ चरमरा ही क्यों न रही हों, मगर जब तक ढवल्या-पवल्या को वे अपने हाथ से रोटी नहीं खिला देते, खुद भी कुछ नहीं खाते थे।
इस पर उनकी पत्नी कभी-कभी उन्हें टोक देतीं, “पहले खुद खा लो, फिर चले जाना।” तब रामभाऊ हँसकर ‘हाँ’ तो कहते लेकिन खाने से पहले बैलों के पास जाना नहीं छोड़ते। और उधर बाड़े का दरवाजा अभी खुलता भी नहीं कि भीतर से एक हुंकार आ जाया करती थी। जैसे कोई बच्चा माँ की आहट सुनकर पुकार उठता है, वैसे। दोनों बैल खड़े हो जाते। कान सीधे और आँखें दरवाजे पर। भीतर पहुँचकर रामभाऊ रोटी का पहला टुकड़ा धवल्या को देते। वह थोड़ा जल्दबाज था, झटपट ले लेता। फिर पवळ्या की बारी। मगर वह रोटी लेने से पहले एक पल रुकता। रामभाऊ की हथेली को अपने गरम होठों से छूता। मानो कोई दुआ माँग रहा हो, या दे रहा हो। रामभाऊ भी उस पल हाथ नहीं हटाते थे।
खेत में भी यही आलम था। धूप जब सिर पर चढ़ आती, तो रामभाऊ पहले दोनों बैलों को हल से खोलते, उन्हें आराम से एक जगह बाँधकर पानी पिलाते, उसके बाद खुद पीते। गाँव के लोग उन्हें ऐसा करते देखते तो अक्सर छेड़ देते। कोई कहता, “रामभाऊ, तू इंसान है कि बैल?” जवाब में रामभाऊ सहज भाव से कहते, “भाई ये बैल नहीं, धरम है मेरा। तुमने श्रीमद् भागवत की सप्ताह कथा में नहीं सुना है क्या। मैं तो बस अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करता हूँ।”
साल गुजरते गए। जैसे नदी बहती है- कभी तेज, कभी धीमी, पर रुकती नहीं। धवल्या और पवल्या की चाल धीमी पड़ गई। पीठ की चमड़ी ढीली हो गई। आँखों की चमक वही थी, पर उसमें अब थकान घुल चुकी थी। फिर तभी एक बरस अकाल पड़ गया। खेत सूख गए। गरमी में सूखी नदी पावस में फली-फूली ही नहीं। घर में दाने कम हो गए। खेतों में घास नहीं के बराबर उगी। गाँव के कई किसानों ने अपने मवेशी बेच दिए। बाजार में बैलों के दाम गिर गए, पर बिकते तो थे। इससे लोगों को कुछ सहारा मिल जाता था। रामभाऊ के घर भी तंगी बढ़ रही थी। पर उन्होंने अब तक अपने बैल नहीं बेच। ऐसे में एक रात पत्नी ने धीरे से कहा, “सुनते हो, जमींदार के यहाँ से कुछ कर्ज ले लो, या बैल बेच दो।” रामभाऊ बड़ी देर तक चुप रहे, फिर उठे, बाड़े में गए और अँधेरे में ही दोनों बैलों के पास बैठ गए, चुपचाप। धवल्या ने उनके कंधे सूँघे और पवल्या ने अपना सिर उनके घुटने पर रख दिया। अगले दिन रामभाऊ ने कर्ज लिया, बैल नहीं बेचे।
इसी दौरान एक दिन जमींदार के कारिंदे ने कहा, “रामभाऊ, अब ये बैल किस काम के? बूढ़े हो गए। बेच दो, दो पैसे मिलेंगे।” रामभाऊ ने उस कारिंदे की तरफ देखा, फिर बैलों की तरफ। इसके बाद दोबारा उस कारिंदे की तरफ देखकर बोले, “जिसने उम्र भर मेरा खेत सींचा, उसे मैं बाजार में तौलूँ? नहीं भाई, यह मुझसे न होगा।” कारिंदा चला गया और अगले दिन कर्ज चुकाने का तकादा रामभाऊ के दरवाजे पर आ पहुँचा। रामभाऊ ने अपनी बेटी के विवाह के लिए रखे जेवर बेचकर जमींदार को रकम लौटाई, लेकिन बैल नहीं बेचे। उस रात किसान दंपति सुख से सोए।
हालाँकि एक दिन ऐसा भी आया जिसका डर हर किसी को होता है, लेकिन उसके लिए तैयार कोई नहीं होता। धवल्या बीमार पड़ गया। अब वह उठ भी नहीं पाता था। रामभाऊ ने वैद्य बुलाया, दवा दी, रातों को जागकर उसकी सेवा-टहल की। पवल्या भी लगातार धवल्या के पास खड़ा रहता, चुप और बेचैन-सा। जैसे वह भी जानता हो कि कुछ टूटने वाला है। इस सबके बीच एक दिन रामभाऊ खुद भी बुखार से पीड़ित हो गए। उठने की ताकत भी नहीं बची कि तभी एक शाम उनका बरसों का वफादार नौकर भागता हुआ आया और बोला, “मालिक, धवल्या की आँखों से पानी बह रहा है। बहुत बेचैन है।” इतना सुनते ही रामभाऊ अपनी तबीयत भूल गए। तुरंत उठे और नौकर के कंधे का सहारा लेकर दोनों बाड़े तक जा पहुँचे। धवल्या जमीन पर पड़ा था। साँसें ऐसी चल रही थीं, जैसे कोई थकी हुई धौंकनी चल रही हो। आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। रामभाऊ को देखते ही उसके कान थोड़े खड़े हुए। एक धीमी, टूटी हुई हुंकार उसके गले से निकली। वही पुरानी हुंकार, मानो कहा हो, “आ गए।” रामभाऊ घुटनों के बल वहीं उसके पास बैठ गए।
रामभाऊ ने रोटी का एक टुकड़ा धवल्याके के होठों के पास रखा। धवल्या ने बड़ी मुश्किल से उसे खाया। उसके बाद उसने सिर जमीन पर टिका दिया और आँखें बंद कर लीं। कुछ देर की शांति और फिर वह तड़पने लगा। उसे इस हाल में देखकर नौकर ने रामभाऊ का कंधा थामा और बोला, “भाऊ, बाहर चलिए।” रामभाऊ ने नौकर की तरफ देखा तो उसकी भी आँखें भरी हुई थीं। वह कह रहा था, “भाऊ, आपके सामने जाना नहीं चाहता धवल्या।” रामभाऊ के पाँव जड़ हो चुके थे। फिर भी वह उठे। लड़खड़ाते हुए बाहर आए और पीछे से बाड़े दरवाजा बंद कर दिया गया। कुछ पल। और फिर भीतर मौत का सन्नाटा पसर गया। रामभाऊ दीवार से टिककर वहीं बैठ गए, पूरी तरह निढाल से।
आसमान में तारे निकल आए थे। खेतों से ठण्डी हवा आ रही थी। वही हवा, जिसमें कभी धवल्या और पवल्या के खुरों की आवाज गूँजती थी। मगर आज उसमें खामोशी चीख रही थी। पवल्या ने भी चुप साध ली थी। उसकी चुप्पी में भी एक रुदन था, जिसे कान नहीं, सिर्फ दिल सुन सकता था। अगले दिन रामभाऊ ने धवल्या को बाड़े में ही एक कोने में दफना दिया। दफनाते वक्त धवल्या के शरीर को मिट्टी से ढँकते हुए रामभाऊ के हाथ काँप रहे थे। उस राेज जब सब चले गए, तब भी रामभाऊ देर तक वहीं बैठे रहे, चुपचाप। इतनी देर कि कब शाम ढली, उन्हें पता ही न चला।
मगर न जाने कैसे, उस शाम उनकी बरसों की आदत ने उन्हें धोखा दे दिया। वह अचानक बाड़े से उठे, घर की तरफ गए और रसोई से दो रोटियाँ उठाकर वापस बाड़े में आ पहुँचे। यह सब यंत्रवत् हुआ, किसी मशीन की तरह और इस यांत्रिक क्रिया का सिलसिला तब टूटा जब उन्होंने बाड़े के भीतर पवल्या को अकेले खड़ा देखा। वह भी इस वक्त उन्हें ही देख रहा था। दोनों की नजरें मिलीं। एक बार फिर आँसू झरे और दोनों ने एक-दूसरे से मुँह फेर लिया। मानो अपना दर्द दोनों ही एक-दूसरे से छिपाना चाहते हों। रामभाऊ वहीं फर्श पर बैठ गए, हाथ में रोटियाँ जस की तस रहीं। पवल्या ने भी रोटियों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। दोनों की भूख धवल्या के साथ चली गई थी जैसे। उस रात घर में खाना परोसा गया तो रामभाऊ भी थाली के सामने चुप साधे बैठे रहे। पत्नी ने पूछा, “खाते क्यों नहीं?” रामभाऊ ने थाली की ओर देखा, फिर बाड़े की तरफ और धीरे से बोले, “भूख नहीं है।” पत्नी समझ गईं, आगे कुछ नहीं बोलीं वह।
कुछ दर्द ऐसे ही होते हैं, जिन्हें न समझाया जा सकता है, न बाँटा जा सकता है। बस चुपचाप महसूस किया जा सकता है। जैसे रामभाऊ ने महसूस किया, जैसे पवल्या ने अनुभव किया और जैसे धवल्या ने भी, अपनी आखिरी साँस तक। धर्म का रिश्ता भी तो ऐसा ही होता है, जिसे कह-सुनकर समझाया नहीं जा सकता, बस महसूस किया जा सकता है। चुपचाप जिया जा सकता है, साँसों के आखिरी छोर तक।
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( नोट : लेखिका #अपनीडिजिटलडायरी की नियमित पाठक हैं। कभी-कभार लिखती भी हैं। गृहिणी हैं और भोपाल में रहती हैं। यह कहानी उनके अपने अनुभव पर आधारित है।)
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