नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश
श्री भक्तमाल जैसे सुन्दर, महान् ग्रंथ की रचना करने वाले गोस्वामी श्री नाभादास जी का असली नाम यह नहीं था। उनके माता-पिता ने उनका क्या नाम रखा था, इस बारे में भी कोई जानकारी नहीं है। हाँ, श्री रामानंद सम्प्रदाय की जिस संत परम्परा में वह शामिल किए गए, उसमें जरूर उन्हें नाम मिला और वह था नारायणदास। तो फिर वह नाभादास कैसे हो गए? और इसका अर्थ क्या है? ऐसे सवाल स्वाभाविक हैं।
इनके जवाब के लिए उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों का एक किस्सा और…। तो, श्री हनुमान जी की कृपा से श्री रामदास जी और श्रीमती जानकीदेवी जी के घर पुत्र तो हो गया, लेकिन जन्म के बाद उसकी आँखें नहीं खुलीं। इससे पिता बहुत दुखी हुए। उन्होंने ज्योतिषियों, वैद्यों, आदि को दिखाया। तब ज्योतिषियों ने बताया कि यह अद्भुत बालक है। कुछ वर्षों बाद संतों की कृपा से इसकी आँखों की रोशनी वापस आ जाएगी। यही नहीं, यह लाखों के उद्धार का रास्ता भी सुगम करेगा। इससे श्री रामदास जी बहुत संतुष्ट हुए और खुश भी। हालाँकि, उनकी संतुष्टि और खुशी उनके साथ ही चली गई। उनका पुत्र जब महज दो साल का हुआ, तो श्री रामदास जी का निधन हो गया। माता जानकीदेवी के ऊपर पुत्र के पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी आ गई। मगर कुछ ही सालों बाद उनके सामने भी दैवीय चुनौती आ खड़ी हुई। पूरे इलाके में अकाल पड़ गया। तमाम लोग भोजन-पानी, आजीविका की तलाश में यहाँ-वहाँ पलायन करने लगे। ऐसे में जानकीदेवी के सामने भी घर छोड़कर किसी सुरक्षित जगह चले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। सो, वह भी निकल पड़ीं। श्री नाभादास जी की उम्र इस वक्त करीब पाँच साल ही थी।
चलते-चलते जानकीदेवी राजपुताने (राजस्थान पहले इसी नाम से जाना जाता था) तक आ गईं। अलबत्ता, उनकी हिम्मत अब जवाब देने लगी। भूख-प्यास से वह बेहाल थीं। बालक भी बिलख रहा था। लिहाजा, रास्ते में एक पेड़ के नीचे अपने बच्चे को बिठाकर वह कुछ भोजन-पानी की तलाश में आगे चलीं। बच्चे को कहकर गईं कि “भगवान श्री नारायण के नाम का जपते रहना। वह सब ठीक करेंगे।” बालक पेड़ के नीचे बैठे-बैठे नाम जप करता रहा और उधर, माँ गई तो वह फिर लौट नहीं पाई। भूख-प्यास ने उनके प्राण ले लिए। कहते हैं, उसी समय भगवान श्री नारायण की कृपा से दो साधु-महात्मा उस रास्ते से गुजरे, जहाँ वह बालक अकेले बैठकर नाम जप रहा था। उन्होंने उस बालक में एक तरह की दिव्यता का अनुभव किया। उन्होंने उससे पूछा, “बेटा तुम कौन हो? कहाँ से आए हो? तुम्हारे साथ कौन है? तुम्हारे माता-पिता कहाँ हैं?” तब वह बालक जो बता सकता था, वह उसने बताया।
दोनों महात्मा लोग हरिद्वार कुम्भ से लौटकर गलता जी (जयपुर) जा रहे थे। उन्होंने तय किया कि इस असहाय बालक को ऐसी सूनसान जगह पर अकेला छोड़ना ठीक नहीं। लिहाजा, उन्होंने उसे अपने साथ ले लिया। गलता जी पहुँच कर उन्होंने उसे अपनी संत परम्परा में दीक्षित किया और उसका नामकरण कर दिया, ‘नारायणदास’, क्योंकि वह उन्हें श्री नारायण का नाम जपते हुए मिला था। वे दोनो संत थे, श्री रामानंद सम्प्रदाय के श्री कील्हदेव जी और उनके छोटे गुरु भाई श्री अग्रदेव (अग्रदास) जी। बालक नारायणदास की दीक्षा इनमें श्री अग्रदेव जी से हुई थी। आगे फिर इन्हीं संतों की कृपा से नारायणदास की आँखों की रोशनी भी वापस आ गई और वह उन्हीं के साथ उनकी सेवा में लग गया। हालाँकि, बाद में नारायणदास के बजाय उनका नाम नाभादास अधिक लोकप्रिय हुआ। और इसका कारण यह था कि वह अपने गुरु जी की ‘नाभि के रहस्य’ यानि ‘अतिगोपनीय मन की बातें’ भी जान लेने की स्थिति में पहुँच गए थे। कैसे? इसका उत्तर इसी श्रृंखला की छठवीं कड़ी में विस्तार से उपलब्ध है।
अभी के लिए बस इतना ही… आगे की कहानी अगली कड़ी में।
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नोट : यह श्रृंखला गीता प्रेस की आधिकारिक पुस्तक ‘श्री भक्तमाल’ में उल्लिखित कथा-प्रसंगों पर आधारित है। इसके प्रकाशन-प्रसारण के पीछे हमारा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि गीता प्रेस के ऐसे उच्च स्तर के ऐतिहासिक, पौराणिक महत्त्व के ग्रंथ के प्रचार-प्रसार में #अपनीडिजिटलडायरी की ओर से थोड़ा योगदान हो सके। साथ ही #डायरी से जुड़े पाठकों को इसका लाभ हो। बहुत जल्द हम इसी श्रृंखला को #अपनीडिजिटलडायरी के यूट्यूब चैनल पर भी शुरू करने का इरादा रखते हैं।)
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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
7 – ‘सरल भक्तमाल’-7…: हनुमान जी हैं बाल-ब्रह्मचारी, तो नाभादास जी ‘हनुमानवंश’ के कैसे?
6 – ‘सरल भक्तमाल’-6…: श्री नाभादास जी के हाथों ‘भक्तदाम’ ग्रंथ प्रकट कैसे हुआ?
5 – ‘सरल भक्तमाल’-5…: तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ जैसा नाभादास का ‘भक्तमाल’
4 – ‘सरल भक्तमाल’-4…: असाधारण ग्रंथ, जिसकी कहानियाँ भगवान भी मन लगाकर सुनते हैं!
3 – ‘सरल भक्तमाल’-3…ठाकुर जी ने ‘अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन’ दिलाया श्रीराजेन्द्रदास जी महाराज से!
2 – ‘सरल भक्तमाल’-2…ठाकुर जी ने भक्तमाल की सेवा में मुझे कैसे लगाया?
1- सरल भक्तमाल’-1…आखिर इसकी जरूरत क्यों?
