सांकेतिक तस्वीर
टीम डायरी
भारतीय ज्ञान परम्परा को पश्चिम का विज्ञान अपने शोध अध्ययनों से सही साबित कर रहा है। इसका उदाहरण है एक ताजा अध्ययन। इसके निष्कर्षों में बताया गया है कि गर्भावस्था के दौरान माँ के गर्भ पल रहे शिशु को लय-ताल की समझ हो जाती है। कैसे? माँ की दिल की धड़कन के चलने से, उसके कम ज्यादा होने से। इसीलिए जब बच्चा पैदा होने के बाद लय-ताल के प्रति संवेदनशील होता है। उसकी तरफ सकारात्मक प्रतिक्रिया देता है।
इसी फरवरी की दो तारीख को ‘नेचर न्यूरोसाइंस’ नाम की एक पत्रिका में यह शोध अध्ययन प्रकाशित हुआ है। एक अन्य अध्ययन पाँच फरवरी को ‘प्लॉस बायोलॉजी’ नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इन दोनों अध्ययनों के निष्कर्ष का सार-संक्षेप वही है, जो ऊपर की चंद पंक्तियों में बता दिया गया है। इटली और हंगरी में ये शोध अध्ययन हुए हैं। इनमें दुनिया के कई अग्रणी मनोविज्ञानी शामिल रहे हैं। गौर करने की बात है कि इन निष्कर्षों पर उन मनोविज्ञानियों और मनोचिकित्सकों ने भी भरोसा जताया है, जो इन दोनों अध्ययनों में शामिल नहीं रहे हैं।
तो यह हुई सिर्फ एक ताजा-तरीन सूचना। इस पर हालाँकि उन लोगों को कोई अचरज नहीं होगा, जो भारतीय ज्ञान परम्परा से वाकिफ हैं, उस पर भरोसा करते हैं। अलबत्ता, ऐसे लोगों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है, इसलिए यह भी मुमकिन है कि अधिकांश लोगों को इन अध्ययनों के निष्कर्षों पर अचरज हुआ हो। इनमें कुछ नयापन लगा हो। तो इस वर्ग के लोगों के लिए यह बताना लाजिम है कि भारतीय ज्ञान परम्म्परा में ‘गर्भ संस्कार’ नाम की एक व्यवस्था है। उसके तहत माँ के गर्भ में शिशु के आने से लेकर उसके जन्म होने तक पूरे समय उसमें विभिन्न सुसंस्कारों को रोपने के लिए आचार-व्यवहार सम्बन्धी कई तरह की क्रियाएँ की जाती हैं, खासकर माता-पिता द्वारा।
गर्भ संस्कार की क्रियाओं के तहत गर्भवती माँ के विचार और भावनाएँ हमेशा अच्छे रहें, यह सुनिश्चित किया जाता है। इसके लिए गर्भावस्था का पता चलने पर या उसकी संभावना के कुछ पहले से संतुलित आहार, ध्यान, योग आदि को जीवनशैली में शामिल किया जाता है। अच्छा और शांत संगीत, खासकर भक्ति संगीत सुनना, भजन-पूजन में अधिक समय देना, भगवान और उनके भक्तों की लीला कथाओं को कहना-सुनना, आदि माता-पिता दोनों मिलकर सुनिश्चित करते हैं। यहाँ तक कि इस संस्कार के तहत गर्भ में शिशु का बीज-आरोपण शुभ समय में ही हो, इसकी भी व्यवस्था है। इसके तमाम नियम-कायदे बताए गए हैं। प्रक्रिया निर्धारित की गई है। गर्भ-संस्कार की इस पूरी प्रक्रिया का पालन करने पर संतान ठीक वैसी ही जन्म लेती है, जैसी माता-पिता की अपेक्षा होती है।
यद्यपि सवाल करने वाले यहाँ भी पूछ सकते हैं कि ऐसी संतान कौन सी हुई, जरा एकाध उदाहरण बताएँ? तो महाभारत काल में अभिमन्यु इसका सबसे सशक्त उदाहरण हैं। भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उनकी बहन और बहनोई सुभद्रा तथा अर्जुन ने गर्भावस्था के दौरान ही अपने पुत्र अभिमन्यु को युद्ध की श्रेष्ठ विधियों के बारे में दक्ष कर दिया था। यहाँ तक कि चक्रव्यूह में प्रवेश करने और निकलने का तरीका भी अर्जुन ने सिखाया था। यह बात दीगर है कि जब वह चक्रव्यूह से बाहर निकलने का तरीका बता रहे थे, उस समय सुभद्रा जी की नींद लग गई और अभिमन्यु वह विधा नहीं सीख पाए। इसी कारण वह महाभारत के युद्ध के दौरान चक्रव्यूह में चले तो गए पर निकल नहीं पाए।
वर्तमान में भी कई ज्ञानी जनों ने इसी गर्भ-संस्कार प्रक्रिया से विद्वान और संस्कारवान् संतानें प्राप्त की हैं। इसके प्रमाण भी हैं। इसीलिए आधुनिक विज्ञान के इन निष्कर्षों पर अचरज करने जैसी कोई बात बनती नहीं।
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